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Showing posts from November, 2015

प्रेम का पुरुस्कार

संत जुनैद का एक विचित्र शौक था | वह जिन्दगी के अलग अलग अनुभव हासिल करने के लिए भेष बदलकर घुमा करते थे | एक बार वह भिखारी बनकर एक नाई की दूकान पर पहुच गये | वह नाई उस समय एक रईस ग्राहक की ढाढी बना रहा था | उसने जब एक भिखारी को दूकान पर आते देखा तो तुंरत उस रईस की ढाढी बनाना छोड़ जुनैद की ढाढी बनाने का निर्णय किया | उसने जुनैद से पैसे तो नही लिए बल्कि उन्हें अपनी क्षमता के मुताबिक़ भिक्षा भी दी | जुनैद नाई के व्यवहार से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने निश्चय किया कि वे उस दिन जो कुछ भी भीख के रूप में हासिल करेंगे उसे उस नाई को दे देंगे | यह एक संयोग ही था कि उस दिन अमीर तीर्थयात्री ने जुनैद को सोने के सिक्को से भरी एक थैली दी | जुनैद खुशी खुशी थैली लेकर नाई की दूकान पर पहुचे और उसव वह देने ;लगे | एक भिखारी के हाथ में सोने की भरी थैली देखकर नाई को आश्चर्य हुआ | वह यह भी नही समझ पा रहा था कि एक भिखारी उसे यह क्यों देना चाहता है | जब उसे पता चला कि जुनैद उसे वह थैली क्यों दे रहे है रो वह नाराज होकर बोला “आखिर तुम किस तरह के फकीर हो ? सारा कुछ तुम्हारा फकीरों जैसा है पर मन से तुम व्यापारी ह...