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Showing posts from January, 2019

लोककथा - धनपाल की बुद्धिमानी

बहुत समय पहले की बात है | एक गाँव में दो भाई रहते थे | एक का नाम था धनपाल और दुसरे का नाम था सरजू | एक बार सरजू नौकरी की खोज में निकला | घूमते घूमते वह एक शहर में जा पहुचा | वहां उसकी भेंट एक सेठ से हुयी | सेठ को नौकर की आवश्यकता थी | सेठ ने कहा “नौकरी पर तो रख लूँगा , पर मेरी एक शर्त है” “कैसी शर्त , हुजुर !” सरजू ने पूछा | “यदि नौकरी छोडकर भागे तो कान कटवाने पड़ेंगे और साल भर का वेतन भी देना होगा ” सरजू ने उसकी शर्त स्वीकार कर ली | सेठ बहुत चालाक था | वह जान-बुझकर नौकरों से इतना काम लेता था कि वे नौकरी छोड़ देते और साथ में रूपये भी देते | बेचारा सरजू भी उसके जाल में फ़ंस गया | कुछ ही दिन में सेठ ने सरजू की नाक में डीएम कर दिया | सरजू ने सोचा “कान कटते तो कटे , पर जान तो बच जायेगी “| सेठ ने उससे नकद रुपया लिया | कान काटे और नौकरी से छुट्टी दे दी | सरजू लौटकर गाँव पहूचा | उसकी यह हालत देखकर धनपाल बहुत दुखी हुआ | सरजू ने रोते-रोते अपनी आपबीती सुनाई | धनपाल ने कहा “भैय्या ! मै आपके अपमान का बदला लूँगा | साथ ही सेठ को ऐसा सबक सिखाऊंगा कि आ...

Prayagraj Tour Guide in Hindi | तीर्थराज प्रयाग के प्रमुख पर्यटन स्थल

Prayagraj Tour Guide in Hindi | तीर्थराज प्रयाग के प्रमुख पर्यटन स्थल इलाहाबाद (Allahabad) यानि तीर्थराज प्रयाग (Prayagraj) भारत का प्रमुख एतेहासिक , सांस्कृतिक और धार्मिक नगर है | अनेक दृष्टियों से इस नगर का अपना विशेष महत्व है | प्रयागराज Prayagraj राजनीती एवं साहित्य का प्रमुख केंद्र रहा है | गंगा , यमुना और सरस्वती नदियों के संगम पर लगभग 15 किमी के क्षेत्रफल में स्थित इस नगर की स्थापना सन 1575 में बादशाह अकबर ने की थी | अकबर ने यमुना नदी के किनारे , संगम के निकट , एक विशाल किले का निर्माण कराया किन्तु यह मान्यता है कि इस किले का निर्माण सम्राट अशोक ने कराया था | अकबर ने इसका पुनरुद्धार किया | इस किले में अशोक स्तम्भ और अक्षय वट आज भी है | अक्षय वट के बारे में यह लोक मान्यता है कि यह वृक्ष प्रलय के बाद भी बचा रहता है | प्रयागराज (Prayagraj) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रम में राजनीति गतिविधि का प्रमुख केंद्र था | स्वाधीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु के निवास आनन्द भवन में बड़े बड़े राजनितिक नेता आते-जाते रहते थे | नेहरु जी के पिताजी मोतीलाल नेहरु ने इस भवन का निर्...

लोककथा - पंडित जी चतुर निकले

एक था जाट | उसकी दोस्ती एक पंडित से थी | पंडित महाराज का जब जी चाहता , वह उसके यहाँ आकर भोजन प्राप्त करते | जाट अपने दोस्त को इनकार नही कर पाता था | पंडित जी पुरे पेटू थे | कई लोगो का भोजन एक बार में ही चट कर जाते थे | एक दिन तंग आकर जाट की पत्नी ने जाट से कहा “तुम भी एक बार पंडित जी के घर जाओ , देखे तुम्हारा वहां कैसा सत्कार होता है ?” पत्नी के कहने पर जाट चला तो गया पर जाकर पछताया | पंडितानी ने तीन दिन पुराने केले सामने लाकर रख दिए | वह न तो खाते बनते न ही रखते | बेचारा जाट वहां से सर पर पाँव रखकर भागा | जाट की पत्नी ने जब यह सुना तो नाराज होकर बोली “अब मै देखती हु कि आज के बाद पंडित जी कैसे जीमते है ?” कुछ दिन बाद जाटनी ने खीर बनाई | वह उसमे गुड मिलाने ही वाली थी कि दूर से पंडित जी को आते देखा | जाट तुंरत भीतर की ओर आया और बोला “तू बच्चो के साथ पडोस में चली जा | मै बैल लेकर खेतो की ओर चला जाता हु | जब पंडित चला जाएगा तो मजे से खीर खायेगे ” इतनी देर में पंडित जी आ गये | जाट ने कहा “पंडित जी मै तो अपने खेतो पर जा रहा हु | ” वह राम राम करक...

स्वतंत्रता सेनानी राजगुरु की जीवनी | Rajguru Biography in Hindi

स्वतंत्रता सेनानी राजगुरु की जीवनी | Rajguru Biography in Hindi राजगुरु (Rajguru) का वास्तविक नाम शिवराम राजगुरु था पर वे क्रान्तिकारियो में राजगुरु के नाम से ही विख्यात थे | उनका जन्म कब और कहा हुआ था तथा उनके माता-पिता का क्या नाम था इस बातो का उल्लेख कही नही मिलता | उनके संबध में केवल इतना ही पता चलता है कि वे विद्यार्थी अवस्था में ही क्रांतिकारी दल में सम्मिलित हो गये थे और अपनी लगन एवं निष्ठा के कारण प्रमुख क्रांतिकारी माने जाने लगे थे | राजगुरु (Rajguru) दृढ़ चरित्र के व्यक्ति थे | धुन के बड़े पक्के थे | उन्हें जो कार्य सुपुर्द कर दिया जाता था | उसे वे बड़ी निष्ठा के साथ करते थे | क्रांतिकारी दल में वे सबसे अधिक विश्वसनीय समझे जाते थे | राजगुरु योग्य एवं अनुभवी संघठनकर्ता थे | उन्होंने उत्तर प्रदेश , दिल्ली एवं पंजाब आदि राज्यों में क्रांतिकारी दल का संघठन बड़ी बुद्धिमता के साथ किया था | वे दल में स्वयं भूखे रह जाते थे स्वयं कष्ट उठा लेते थे पर अपने साथियों को कभी भूखा नही रहने देते थे | राजगुरु (Rajguru) सरदार भगतसिंह के सर्वाधिक विश्वासपात्र थे | दोनों में मित्रता कब और कैसे स्थापि...

शहीद मदन लाल ढींगरा की जीवनी | Madan Lal Dhingra Biography in Hindi

शहीद मदन लाल ढींगरा की जीवनी | Madan Lal Dhingra Biography in Hindi मदनलाल ढींगरा (Madan Lal Dhingra) का जन्म 1887 ई. में एक सम्पन्न कुटुम्ब परिवार में पंजाब में हुआ था | उनकी शिक्षा दीक्षा लाहौर में सम्पन्न हुयी थी | उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि प्राप्त की थी | जीवन में प्रवेश करने पर ढींगरा ने कश्मीर में सेटलमेंट विभाग में नौकरी की पर वह काम उनकी रूचि के अनुकूल नही था अत: कुछ ही दिनों की नौकरी के बाद त्यागपत्र दे दिया | ढींगरा (Madan Lal Dhingra) नौकरी से त्यागपत्र देकर इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड चले गये | इंग्लैंड में रहते हुए वे श्याम जे कृष्ण वर्मा और वीर सावरकर जी के सम्पर्क में आये | श्याम जी कृष्ण वर्मा महान देशभक्त थे | उन्होंने इंडिया हाउस अर्थात भारत भवन नामक संस्था की स्थापना की थी | उन दिनों महान क्रांतिकारी वीर सावरकर भी इंडिया हाउस में ही निवास करते थे | श्याम जी कृष्ण वर्मा और वीर सावरकर के सम्पर्क में आ जाने पर ढींगरा इंडिया हाउस की बैठको में भाग लेने लगे | 10 मई के दिन इंडिया हाउस में बड़ी धूमधाम के साथ क्रांति दिवस मनाया गया |...

वासुदेव बलवंत फडके की जीवनी | Vasudev Balwant Phadke Biography in Hindi

वासुदेव बलवंत फडके की जीवनी | Vasudev Balwant Phadke Biography in Hindi वासुदेव बलवंत फड़के (Vasudev Balwant Phadke) जन्मजात देशभक्त थे | वे ईश्वर के घर से ही देशभक्ति लेकर धरती की गोद से उत्पन्न हुए | उन्हें न तो किसी से प्रेरणा मिली न किसी से प्रोत्साहन ही प्राप्त हुआ | समय और स्थिति ने ही उनके हृदय में देशभक्ति का सागर उंडेल दिया | वे स्वयं भी देश की स्वतंत्रता के लिए मिट गये , मिटकर अमर बन गये | वासुदेव बलवंत फड़के (Vasudev Balwant Phadke) जा जन्म महाराष्ट्र प्रदेश के कुलाबा जिले के एक गाँव में 4 नवम्बर 1845 ई. के दिन हुआ था | उनके पिता का नाम बलवंत और माँ का नाम सरस्वती बाई था | उनका एक भाई और दो बहने भी थी | फड़के का पालन-पोषण महाराष्ट्रय संस्कृति में हुआ था | वे जब बड़े हुए तो उन्हें मराठी में शिक्षा दी गयी | मराठी के साथ ही साथ वे अंग्रेजी भी पढ़ा करते थे | महाराष्ट्र के वीरो की जीवन गाथाये पढने में उनकी अधिक अभिरुचि थी | शिवाजी की वीरतापूर्ण कहानियाँ पढने में उनका मन अधिक लगा करता था | वे शिवाजी का चित्र सदा अपने पास रखते थे | फड़के जब कुछ बड़े हुए तो बम्बई चले गये | बम्बई में उन्हों...

तात्या टोपे की जीवन परिचय | Tatya Tope Biography in Hindi

तात्या टोपे की जीवन परिचय | Tatya Tope Biography in Hindi भारत की स्वतन्त्रता के प्रथम युद्ध में जिन देशभक्तों ने अपनी आहुति प्रदान की थी उनमे तात्या टोपे (Tatya Tope) का अन्यतम स्थान है | उनकी शूरता और उनके त्याग की कहानी बड़ी प्रेरणादायक है | वे देश की सेवा के लिए ही धरती की गोद में आये थे और देश की सेवा करते हुए फाँसी के तख्ते पर चढ़ गये | उन्होंने अपने हाथो से फाँसी का फंदा अपने गले में डालते हुए कहा था “मै पुराने वस्त्र छोडकर नये वस्त्र धारण करने जा रहा हु | मै अम्र हु | मैंने जो कुछ किया है अपने देश और मातृभूमि के लिए किया है” | तात्या टोपे (Tatya Tope) के शौर्य और चातुर्य की प्रशंसा स्वयं अंग्रेजो तक ने की है | तात्या टोपे का जन्म 1814 ई. में नासिक के पास जाबालि में एक ब्राह्मण वंश में हुआ था | उनके पिता का नाम पांडूरंगराव और माता का नाम रुक्मणबाई था | उनके पिता पूना में बाजीराव पेशवा के दरबार में रहते थे | बाजीराव जब पुन छोडकर बिठुर चले गये तो वे भी अपने कुटुंब को लेकर बिठुर में जाकर बस गये थे और बाजीराव की सेवा में रत रहते थे | तात्या टोपे (Tatya Tope) की बाल्यावस्था ...

रामप्रसाद बिस्मिल की जीवनी | Ram Prasad Bismil Biography in Hindi

रामप्रसाद बिस्मिल की जीवनी | Ram Prasad Bismil Biography in Hindi रामप्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहापुर नामक नगर में हुआ था | उनके पिता ग्वालियर के निवासी थे जीवन निर्वाह के लिए शाहजहा पुर में जाकर बस गये थे | घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नही थी | अत: बाल्यावस्था में ही बिस्मिल का पालन-पोषण अभाव की स्थितियों में हुआ था | बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) बाल्यावस्था में बड़े खिलाड़ी थे | पढने-लिखने में उनका मन बिल्कुल नही लगता था | वे खिलाड़ी लडको के साथ इधर-उधर घुमा करते थे | बीड़ी और तम्बाकू पीने की बुरी आदते उत्पन्न हो गयी थी | वे अपने पिताजी के पैसे भी उड़ाया करते थे | बिस्मिल जब बड़े हुए तो संयोगवश आर्य समाज के सुप्रसिद्ध नेता सोमदेव जी से सम्पर्क हुआ | उनमे उनकी इतनी श्रुद्धा हो गयी कि वे प्राय: उन्ही के साथ रहा करते थे | सोमदेव जी के आदर्श व्यक्तित्व ने बिस्मिल का जीवन ही बदल दिया | बुरी आदते तो छुट ही गयी , पढने-लिखने में भी रूचि पैदा हो गयी | कहा जाता है कि देशभक्ति का गुण बिस्मिल जी में सोमदेव जी की प्रेरणा से ही उत्पन्न हुआ था | सोमदेव जी की...

भारत के प्रमुख राजनीतिक दल एवं उनके अध्यक्ष | Indian Political Parties List in Hindi

भारत के राजनीतिक दल एवं उनके अध्यक्ष | Indian Political Parties List in Hindi भारत में राजनितिक दलों की कोई कमी नही है चाहे वो राष्ट्रीय स्तर की पार्टी हो या प्रादेशिक पार्टी | भारतीय निर्वाचन आयोग समय समय पर इन राजनितिक दलों की जांच करता है जबकि कई नये राजनितिक दलों को भारतीय निर्वाचन आयोजन में रजिस्टर करना पड़ता है | रजिस्टर पार्टिया की आगे चलकर प्रादेशिक या राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनती है | भारतीय निर्वाचन आयोग के सबसे ताजा आंकड़ो के अनुसार भारत में कुल 1841 रजिस्टर पार्टिया है जिसमे से 7 राष्ट्रीय दल , 51 प्रादेशिक दल और 1785 अयोग्य parties है | सभी पंजीकृत दलों को EC द्वारा दिए गयी लिस्ट में एक चुनाव चिन्ह चुनना पड़ता है | आइये अब आपको राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक दलों के बारे में विस्तार से बताते है | राष्ट्रीय दल | National Party राष्ट्रीय दल का दर्जा उसी दल को मिल सकता है जो नीचे दी गयी तीन शर्तो को पूरा करे | राजनीतिक दल तीन अलग अलग राज्यों से कम से कम 2 प्रतिशत सीट लोकसभा में जीती हो | लोकसभा के आम चुनावों में पार्टी चार राज्यों में 6 प्रतिशत वोट शेयर रखता हो राजनीतिक दल को चार राज्...

भगवान बुद्ध की दस मुद्राए एवं उनका अर्थ | Lord Buddha Mudras Significance in Hindi

भगवान बुद्ध की दस मुद्राए एवं उनका अर्थ | Lord Buddha Mudras Significance in Hindi आपने भगवान बुद्ध की अनेक मुर्तिया देखी होगे लेकिन आपने कई बार गौर किया होगा कि उनके हाथ के संकेत कई मूर्तियों में अलग अलग है | कई लोग इन संकेतो को समझ नही पाते है | भगवान बुद्ध के हाथो के इन संकेत को बुद्ध मुद्रा कहते है | भगवान बुद्ध की 10 मुद्राए बताई गयी है आइये आपको इनके बारे में विस्तार से बताते है | भूमिस्पर्श मुद्रा बुद्ध की मूर्तियों में पायी जाने वाली एक सर्वाधिक आम मुद्रा इसमें बुद्ध को उनका बांये हाथ के साथ ध्यानमुद्रा में बैठे हुए दर्शाया गया | हथेली उनकी गोद में सीधी है और दाहिना हाथ पृथ्वी को स्पर्श कर रहा है | इस मुद्रा को सामान्यत: अक्षोब्य के रूप में ज्ञात नीलवर्ण बुद्ध से संबध किया जाता है | ध्यान मुद्रा इस मुद्रा को समाधि या योग मुद्रा भी कहते है | इसमें बुद्ध को गोद में दोनों हाथो के साथ दर्शाया गया है | फ़ैली हुयी उंगलियों के साथ दांये हाथ की पीठ बांये हाथ  की हथेली पर रखी हुयी है | कई मूर्तियों में दोनों हाथो के अंगूठे पर स्पर्श करते हुए दिखाए गये है | इस प्रकार यह रहस्यमय त्रिकोण बन...