एक था जाट | उसकी दोस्ती एक पंडित से थी | पंडित महाराज का जब जी चाहता , वह उसके यहाँ आकर भोजन प्राप्त करते |
जाट अपने दोस्त को इनकार नही कर पाता था | पंडित जी पुरे पेटू थे | कई लोगो का भोजन एक बार में ही चट कर जाते थे | एक दिन तंग आकर जाट की पत्नी ने जाट से कहा “तुम भी एक बार पंडित जी के घर जाओ , देखे तुम्हारा वहां कैसा सत्कार होता है ?”
पत्नी के कहने पर जाट चला तो गया पर जाकर पछताया | पंडितानी ने तीन दिन पुराने केले सामने लाकर रख दिए | वह न तो खाते बनते न ही रखते | बेचारा जाट वहां से सर पर पाँव रखकर भागा |
जाट की पत्नी ने जब यह सुना तो नाराज होकर बोली “अब मै देखती हु कि आज के बाद पंडित जी कैसे जीमते है ?”
कुछ दिन बाद जाटनी ने खीर बनाई | वह उसमे गुड मिलाने ही वाली थी कि दूर से पंडित जी को आते देखा | जाट तुंरत भीतर की ओर आया और बोला “तू बच्चो के साथ पडोस में चली जा | मै बैल लेकर खेतो की ओर चला जाता हु | जब पंडित चला जाएगा तो मजे से खीर खायेगे ”
इतनी देर में पंडित जी आ गये | जाट ने कहा “पंडित जी मै तो अपने खेतो पर जा रहा हु | ” वह राम राम करके खेतो की ओर चला गया | जाटनी बोली “पंडित जी , आप आराम कीजिये | मै बच्चो के साथ पडोस में जा रही हु”
पंडित जी भी कम घाघ नही थे | उनके नाक में खीर की खुशबु पहुच चुकी थी |
जाट-जाटनी के घर से जाते ही उन्होंने खीर में गुड मिलाया और छककर खाया | खीर खाकर वे जान-बुझकर चारपाई के नीचे छिप गये | शाम को जाट खेत से लौटा तो पंडित को वहां ना पाकर खुशी से बोला
मै मरद बड़ा हुश्यार
तजरबेदार बड़ा कड़के का
ले बल्द ने खेत गया
मै तडके का
जाटनी भी पडोस से आकर बोली
मै नार बड़ी हुश्यार ,
तजरबेकार बड़ी कड़के की ,
ले बच्च्या ने गयी पडोस माँ
तडके की
जब वे दोनों अपनी अपनी बड़ाइयाँ करके डींगे हांक रहे थे तो उनका मेहमान चारपाई के नीचे से बोला
मै मेहमान बड़ा हुश्यार ,
तजरबेकार बड़ा कड़के का
खा के खीर और गुड
मंजी के नीचे पड्या तडके का |
उस समय जाट और जाटनी की सुरत देखने लायक थी |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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