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रामप्रसाद बिस्मिल की जीवनी | Ram Prasad Bismil Biography in Hindi

रामप्रसाद बिस्मिल की जीवनी | Ram Prasad Bismil Biography in Hindi
रामप्रसाद बिस्मिल की जीवनी | Ram Prasad Bismil Biography in Hindi

रामप्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहापुर नामक नगर में हुआ था | उनके पिता ग्वालियर के निवासी थे जीवन निर्वाह के लिए शाहजहा पुर में जाकर बस गये थे | घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नही थी | अत: बाल्यावस्था में ही बिस्मिल का पालन-पोषण अभाव की स्थितियों में हुआ था |
बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) बाल्यावस्था में बड़े खिलाड़ी थे | पढने-लिखने में उनका मन बिल्कुल नही लगता था | वे खिलाड़ी लडको के साथ इधर-उधर घुमा करते थे | बीड़ी और तम्बाकू पीने की बुरी आदते उत्पन्न हो गयी थी | वे अपने पिताजी के पैसे भी उड़ाया करते थे | बिस्मिल जब बड़े हुए तो संयोगवश आर्य समाज के सुप्रसिद्ध नेता सोमदेव जी से सम्पर्क हुआ | उनमे उनकी इतनी श्रुद्धा हो गयी कि वे प्राय: उन्ही के साथ रहा करते थे | सोमदेव जी के आदर्श व्यक्तित्व ने बिस्मिल का जीवन ही बदल दिया | बुरी आदते तो छुट ही गयी , पढने-लिखने में भी रूचि पैदा हो गयी |
कहा जाता है कि देशभक्ति का गुण बिस्मिल जी में सोमदेव जी की प्रेरणा से ही उत्पन्न हुआ था | सोमदेव जी की प्रेरणा से बिस्मिल जी प्राणायम करने लगे थे | व्यायाम एवं मल्ल विद्या में भी उनकी बड़ी रूचि थी | परिणामत: उनका शरीर बड़ा स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट हो गया था | वे दौड़ने , साइकल चलाने और घुड़सवारी में भी बड़े दक्ष थे | दस-दस मील तक दौड़ते हुए चले जाते थे पर थकते बिल्कुल नही थे |
बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) ने हाई स्कुल की शिक्षा प्राप्त की हटी पर उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की थी ऐसा नही कहा जा सकता | उन्हें उच्च शिक्षा बिल्कुल नही मिली थी पर वे हिंदी-अंग्रेजी और बंगला के अच्छे ज्ञाता थे | वे अच्छे वक्ता तो थे ही अच्छे लेखक भी थे | वे हिंदी ,उर्दू में बिस्मिल के नाम से कविताये लिखा करते थे | उन्होंने हिंदी में पुस्तको की रचना भी की है | उनके द्वारा बंगला पुस्तको का अनुवाद भी हुआ है | उनकी उर्दू की कविताएं बड़ी प्रभावमयी है |
विद्याथी अवस्था में ही बिस्मिल के हृदय में देशभक्ति की भावना जाग उठी थी | जिन दिनों वे हाई स्कुल में पढ़ रहे थे उनकी आयु 19 वर्ष थी | स्वामी जी की प्रेरणा से वे पहले ही क्रांतिकारी काम करने लगे थे | उनके कानो में जब सुप्रसिद्ध गेंदालाल जी का नाम पड़ा , तो उन्होंने गेंदालाल जी से सम्पर्क स्थापित किया और उनसे प्रभावित होकर उनके दल में मिल गये |
गेंदालाल जी का कार्यक्षेत्र मैनपुरी के आस-पास था | उनके दल में बहुत से पढ़े लिखे युवक थे | वे अपने क्रांतिकारी कामो के लिए डाके डाला करते थे पर भेद खुल जाने से वे और उनके दल के सभी लोग बंदी बना लिए गये | बिस्मिल जी के नाम भी वारंट था पर वे गिरफ्तार नही किये जा सके और वे फरार हो गये |
फरारी की अवस्था में ही बिस्मिल ने 1916 ई. में लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया था | उन्होंने कांग्रेस के बड़े बड़े नेताओं के व्याख्यान बी सुने थे किन्तु उन्हें व्याख्यान पसंद नही आये थे | इसका कारण था कि उनका मार्ग विप्लव का मार्ग था | फरारी की अवस्था में ही बिस्मिल जी ने गेंदालाल जी को ग्वालियर के किले से छुडाने का प्रयत्न किया था किन्तु इस कार्य में उन्हें सफलता नही प्राप्त हुयी थी | उलटे भेद खुल जाने के कारण बहुत से लोग बंदी बनाये गये | बिस्मिल की जोरो के साथ खोज की जाने लगी |
गिरफ्तारी से बचने के लिए बिस्मिल जी गुप्त रूप से इधर से उधर भ्रमण करने लगे | वे पहले आगरा फिर राजपुताना और फिर उसके पश्चात नेपाल गये | कुछ दिनों तक जंगलो में भी रहे | कई दिनों तक वृक्षों की पत्तिया और घासे खाकर जीवन व्यतीत करना पड़ा | आखिरी संकटों का अंत हुआ | एक दिन अखबार में पढने के लिए मिला , सरकार ने गिरफ्तारी का वारंट रदद् कर दिया है | फलत: बिस्मिल पुन: घर लौट आये और रेशम के सूत अक एक कारखाना खोलकर जीवन-निर्वाह करने लगे पर काम-काज में उनका मन नही लगता था | मन लगता भी तो कैसे लगता ? उनके मन में तो स्वतंत्रता की लगन लगी हुयी थी |
बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) का नाम क्रांतिकारी के रूप में फ़ैल चूका था | अत: उत्तर प्रदेश के बड़े बड़े क्रांतिकारी उनसे मिले | वे क्रान्तिकारियो के दल में सम्मिलित हो गये | उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई नगरो में क्रांतिकारी दल की स्थापना की | वे क्रांतिकारी दल में सम्मिलित युवको के पास अस्त्र-शस्त्र पहुचाया करते थे | अस्त्र-शस्त्र के लिए बिस्मिल जी डाके भी डाला करते थे | सर्वप्रथम उन्होंने 19 वर्ष की आयु में डाका डाला था | यद्यपि उस डाके में उन्हें सफलता प्राप्त नही हुयी थी पर इस बात से अस्वीकार नही किया जा सकता था कि उनकी वह प्रथम डकैती भी बड़ी साहस एम् बुद्धिमतापूर्ण थी |
जिस डकैती के कारण बिस्मिल का नाम चारो ओर फ़ैल गया और जिसके परिणामस्वरूप उन्हें फांसी के तख्ते पर चढना पड़ा , वह 1925 ई. में 9 अगस्त के दिन डाली गयी थी | उनकी वह डकैती काकोरी ट्रेन डकैती के नाम से प्रसिद्ध है | उन्होने वह डकैती देश की स्वतंत्रता के लिए ही की थी | उससे उनका नाम देश के कोने कोने में तो फ़ैल ही गया वे फाँसी के तख्ते पर चढकर अमर भी हो गये |
1925 ई. की 9 अगस्त का दिन था | संध्या की ट्रेन में सरकारी खजाना लखनऊ जा रहा था | रात के आठ बज रहे थे | बिस्मिल अपने साथियो के साथ हरदोई  से ट्रेन पर सवार हुए | ट्रेन जब आलम नगर और काकोरी के बीच में पहुची तो जंजीर खींचने के कारण ट्रेन रुक गयी | बिस्मिल अपने साथियों के साथ नीच उतर गये | उन्होंने गार्ड अरु ड्राईवर को पिस्तौल दिखाकर जमीन पर लेट जाने को कहा | कुछ लोग डिब्बे में जा पहुचे जिसमे खजाने की तिजोरी रखी हुयी थी | उन्होंने शीघ्र ही खजाने की तिजोरी नीचे गिरा दी | जब गाड़ी चली गयी तो उन्होंने बड़ी कठिनाई से तिजोरी तोडी | वे तिजोरी का सारा धन निकालकर चम्पत हो गये और जगह जगह छिप गये |
यद्यपि डकैती की योजना बड़ी चतुराई और बुध्दिमता के साथ बनाई गयी थी फिर भी भेद खुल गया | उन सभी लोगो के नाम मालुम हो गये जो डकैती में सम्मिलित थे | फलत: एक एक करके सभी लोग बंदी बनाये गये | बिस्मिल को भी गिरफ्तार किया गया | उन्हें गिरफ्तार करके गोरखपुर की जेल में रखा गया | मुकदमा डेढ़ वर्ष तक चला था |
मुकदमा चलने के दिनों में सरकार की ओर से बिस्मिल को प्रलोभन दिए गये | उनसे कहा गया कि वे अपने सभी साथियो के नाम बता दे तो उन्हें छोड़ दिया जाएगा उन्हें बहुत बड़ा पुरुस्कार देकर इंग्लैंड भेद दिया जाएगा पर बिस्मिल जी के हृदय पर उन प्रलोभनों का रंच-मात्र भी प्रभाव नही पड़ा | उन्होंने उत्तर में कहा “पुरुस्कार क्या , देश की स्वतंत्रता के लिए स्वर्ग के सुखो को भी ठुकरा सकता हु ” | बिस्मिल को न्यायालय ने फांसी ला दंड दिया | 19 नवम्बर 1927 को वे गोरखपुर की जेल में फाँसी पर चढ़ा दिए गये |

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