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स्वतंत्रता सेनानी राजगुरु की जीवनी | Rajguru Biography in Hindi

स्वतंत्रता सेनानी राजगुरु की जीवनी | Rajguru Biography in Hindi
स्वतंत्रता सेनानी राजगुरु की जीवनी | Rajguru Biography in Hindi

राजगुरु (Rajguru) का वास्तविक नाम शिवराम राजगुरु था पर वे क्रान्तिकारियो में राजगुरु के नाम से ही विख्यात थे | उनका जन्म कब और कहा हुआ था तथा उनके माता-पिता का क्या नाम था इस बातो का उल्लेख कही नही मिलता | उनके संबध में केवल इतना ही पता चलता है कि वे विद्यार्थी अवस्था में ही क्रांतिकारी दल में सम्मिलित हो गये थे और अपनी लगन एवं निष्ठा के कारण प्रमुख क्रांतिकारी माने जाने लगे थे |
राजगुरु (Rajguru) दृढ़ चरित्र के व्यक्ति थे | धुन के बड़े पक्के थे | उन्हें जो कार्य सुपुर्द कर दिया जाता था | उसे वे बड़ी निष्ठा के साथ करते थे | क्रांतिकारी दल में वे सबसे अधिक विश्वसनीय समझे जाते थे | राजगुरु योग्य एवं अनुभवी संघठनकर्ता थे | उन्होंने उत्तर प्रदेश , दिल्ली एवं पंजाब आदि राज्यों में क्रांतिकारी दल का संघठन बड़ी बुद्धिमता के साथ किया था | वे दल में स्वयं भूखे रह जाते थे स्वयं कष्ट उठा लेते थे पर अपने साथियों को कभी भूखा नही रहने देते थे |
राजगुरु (Rajguru) सरदार भगतसिंह के सर्वाधिक विश्वासपात्र थे | दोनों में मित्रता कब और कैसे स्थापित हुयी थी इसका ठीक-ठाक पता नही चलता | कुछ लोगो का कहना है कि जिन दिनों भगतसिंह कानपुर में रहते थे उन्ही दिनों राजगुरु की उनसे भेंट हुयी थी | धीरे धीरे उनकी मित्रता प्रगाढ़ हो गयी थी जिसके कारण भगतसिंह हर योजना में उन्हें अपने साथ रखते थे |
यद्यपि राजगुरु (Rajguru) का नाम उत्तर प्रदेश के क्रान्तिकारियो में लिया जाता था पर पहले उन्हें अधिक ख्याति प्राप्त नही हुयी थी | जिस घटना के कारण उनका नाम जन जन के होंठो पर छा गया वह घटना थी लाहौर में सैंडर्स की हत्या | 1928 ई. में साइमन कमीशन का भारत आगमन हुआ | कमीशन में सभी अंग्रेज सदस्य थे अत: कांग्रेस की ओर से कमीशन के बहिस्कार की घोषणा की गयी फलस्वरूप कमीशन जिस जिस नगर में गया जुलुस और सभाओं द्वारा उसका बहिस्कार किया गया |
कमीशन जब लाहौर में गया तो वहा भी उसके बहिष्कार के लिए एक बहुत बड़ा जुलुस निकाला गया | जुलुस का नेतृत्व लाला लाजपतराय ही कर रहे थे | जुलुस जब स्टेशन पर पहुचा तो घुड़सवारो ने उसका मार्ग रोक लिया | केवल इतना ही नही , जुलुस पर लाठी वर्षा भी की गयी | सैंडर्स के संकेत पर दो गोर सिपाहियों ने लालाजी पर भी वार किया | लालाजी की छाती में चोट आ गयी | उसी चोट के परिणामस्वरूप 8 नवम्बर के दिन अस्पताल में उनका स्वर्गवास हो गया |
लालाजी के स्वर्गगमन ने क्रांतिकारियों के रक्त में उष्णता पैदा कर दी | लाहौर में दल की बैठक हुयी | बैठक में भगतसिंह , राजगुरु , आजाद एवं सुखदेव आदि सभी उपस्थित थे | विचार-विमर्श के पश्चात सैंडर्स की हत्या करके लालाजी की मृत्यु का बदला लेने का निश्चय किया गया | सैंडर्स की हत्या का कार्य भगतसिंह , राजगुरु एवं आजाद को सुपुर्द किया गया |
सैंडर्स की हत्या की योजना बड़ी बुद्धिमानी के साथ बनाई गयी थी | 15 दिसम्बर 1928 का दिन था | शाम के चार बज रहे थे | सैंडर्स अपने ऑफिस से निकला और मोटर साइकल पर सवार होकर चल पड़ा | कुछ ही कदम आगे गया था कि उस पर गोलियों की बौछार की गयी | निशाना ठीक बैठा , वह मोटर साइकिल से लुढ़ककर धरती पर गिर पड़ा और प्राणशून्य हो गया | कहा जाता है कि गोलियां स्वयं भगतसिंह एवं राजगुरु ने चलाई थी | सैंडर्स के गिरते ही भगतसिंह , राजगुरु एवं आजाद भाग खड़े हुए थे | सिपाही चाननसिंह ने उनका पीछा किया पर गोलिया चलाकर उसे भी ढेर बना दिया गया |
तीनो वीर क्रांतिकारी सैंडर्स की हत्या के पश्चात DAV कॉलेज के होस्टल में जा छुपे | कुछ क्षणों तक वहा रहने के पश्चात तीनो क्रांतिकारी अलग अलग दिशा में चले गये और अलग अलग स्थान पर जाकर छिप गये | सैंडर्स की हत्या की खबर सारे नगर में बिजली की भांति फ़ैल गयी चारो ओर पुलिस दौड़ पड़ी | बड़े बड़े पुलिस अधिकारी घटना-स्थल पर जा पहुचे | क्रांतिकारियों को बंदी बनाने के लिए जोरो से प्रयत्न किया जाने लगा |
सारे नगर में गुप्तचरों का जाल बिछा दिया गया | सरायो , होटलों , और धर्मशालाओं के तलाशिया ली गयी | गली-गली ,. मोड़-मोड़ पर पुलिस तैनात कर दी गयी | स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर भी कडा पहरा लगा दिया गया , पर फिर भी क्रांतिकारी न तो पकड़े गये और न उनके संबध में कुछ सुराग ही मिला | उधर भगतसिंह ,राजगुरु और चंद्रशेखर आदि क्रांतिकारी लाहौर में अपने को सुरक्षित न पाकर वहा से निकल जाने की योजना बनाने लगे | आखिर बड़ी चतुराई और बुद्धिमानी के साथ लाहौर से निकल जाने की योजना बनाई गयी |
भगतसिंह पुलिस की आँखों में धुल झोंकने के लिए अमेरिकन साहब के वेश धारण कर कलकत्ता की गाडी में बैठ गये | दुर्गा भाभी उनकी मेम बनी थी और राजगुरु बने थे चपरासी | इस तरह भगतसिंह एवं राजगूरु पुलिस की आँखों में धुल झोंककर लाहौर से बाहर निकल गये | आजाद भी साधू का वेश धारण करके लाहौर से निकल गये थे | भगतिसिंह तो कलकता चले गये पर राजगुरु बीच में कही उतर गये | बाद में उत्तर प्रदेश में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया | सुखदेव को भी गिरफ्तार करके मिन्यावाली जेल में रखा गया था |
भगतसिंह और दत्त को केन्द्रीय असेम्बली हाल में बम फेंकने के पश्चात पकड़े गये थे | पहले उन्हें दिल्ली जेल में रखा गया था फिर मियावाली जेल में भेज दिया गया था | जेल में क्रांतिकारियों के साथ अच्छा व्यवहार नही किया जाता था | अत: उन्होंने 1931 के जून मॉस में अपनी मांगो को लेकर अनशन प्रारम्भ कर दिया | अनशन 16 जून से शुरू होकर 3 सितम्बर तक चला | भगतसिह और सुखदेव आदि क्रांतिकारियों के साथ राजगूरु ने भी अनशन किया था |
राजगूरु (Rajguru) पर सैंडर्स की हत्या के अभियोग के संबध में मुकदमा चलाया गया | सुखदेव पर भी यही अभियोग था | भगतसिंह पर सैंडर्स की हत्या के अभियोग के साथ ही दिल्ली के बमकांड का भी अभियोग लगाया गया था | मुकदमे में भगतसिंह और सुखदेव के साथ ही राजगुरु को भी फाँसी का दंड दिया गया था | फांसी के लिए 23 सितम्बर के दिन निश्चित किया गया था पर अशांति उत्पन्न हो जाने के भय से 22 की रात को ही भगतसिंह और सुखदेव के साथ ही राजगुरु को भी फाँसी पर चढा दिया गया |
रात में ही तीनो वीर क्रांतिकारियों के शवो को रावी नदी के तट पर मिटटी के तेल से जला दिया गया | 23 सितम्बर को प्रात:काल जब जनता के कानो में खबर पड़ी तो हजारो स्त्री-पुरुष दौड़ दौड़ कर रावी के तट पर जा पहुचे | पर अब वहा टूटी फूटी हड्डियों और भस्म के अलावा ओर क्या रखा था | प्रतिवर्ष 22 सितम्बर के दिन अब भी हजारो स्त्री-पुरुष रावी के किनारे पहुचकर भगतसिंह ,राजगूरु एवं सुखदेव की याद में आँसू बहाते है | यह क्रम युगों तक चलता रहगा क्योंकि राजगूरु के बलिदान ने उन्हें अमर बना दिया है |

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