
आपने भगवान बुद्ध की अनेक मुर्तिया देखी होगे लेकिन आपने कई बार गौर किया होगा कि उनके हाथ के संकेत कई मूर्तियों में अलग अलग है | कई लोग इन संकेतो को समझ नही पाते है | भगवान बुद्ध के हाथो के इन संकेत को बुद्ध मुद्रा कहते है | भगवान बुद्ध की 10 मुद्राए बताई गयी है आइये आपको इनके बारे में विस्तार से बताते है |
भूमिस्पर्श मुद्रा
- बुद्ध की मूर्तियों में पायी जाने वाली एक सर्वाधिक आम मुद्रा
- इसमें बुद्ध को उनका बांये हाथ के साथ ध्यानमुद्रा में बैठे हुए दर्शाया गया | हथेली उनकी गोद में सीधी है और दाहिना हाथ पृथ्वी को स्पर्श कर रहा है |
- इस मुद्रा को सामान्यत: अक्षोब्य के रूप में ज्ञात नीलवर्ण बुद्ध से संबध किया जाता है |
ध्यान मुद्रा
- इस मुद्रा को समाधि या योग मुद्रा भी कहते है |
- इसमें बुद्ध को गोद में दोनों हाथो के साथ दर्शाया गया है | फ़ैली हुयी उंगलियों के साथ दांये हाथ की पीठ बांये हाथ की हथेली पर रखी हुयी है |
- कई मूर्तियों में दोनों हाथो के अंगूठे पर स्पर्श करते हुए दिखाए गये है | इस प्रकार यह रहस्यमय त्रिकोण बनाते है |
- यह आध्यात्मिक पूर्णता की प्राप्ति का द्योतक है |
- बोधि वृक्ष के नीचे अंतिम ध्यान के दौरान बुद्धा द्वारा इस मुद्रा का प्रयोग किया गया था |
वितर्क मुद्रा
- यह मुद्रा शिक्षण और चर्चा या बौद्धिक बहस को इंगित करती है |
- अंगूठे और तर्जनी का पोर वृत बनाते हुए एक दुसरे को स्पर्श करता है | दाया हाथ कंधे के स्तर पर और बाँया हाथ श्रोणी स्तर पर रखा है गोद हथेली उपर की ओर है
- यह बौद्ध धर्म में उपदेश के शिक्षण चरण का द्योतक है | अंगूठे और तर्जनी द्वारा निर्मित वृत उर्जा का निरंतर प्रवाह बनाये रखता है क्योंकि कोई आरम्भ या अंत नही है केवल पूर्णता है |
अभय मुद्रा
- यह मुद्रा निर्भयता को दर्शाती है |
- मुड़ी हुयी भुजा के साथ दाहिना हाथ उपर की ओर कंधे की ऊँचाई तक उठा है | दाहिने हाथ की हथेली बाहर की ओर है और उंगलिया सीधी और जुडी हुयी है | बांया हाथ शरीर के बगल में नीचे की ओर लटका हुआ है |
- यह मुद्रा बुद्ध द्वारा ज्ञान प्राप्ति के तुरंत बाद दर्शाई गयी थी |
- यह मुद्रा शक्ति और आंतरिक सुरक्षा का प्रतीक है | यह वह मुद्रा है जो दुसरे लोगो में भी निर्भयता की भावना पैदा करती है |
धर्मचक्र मुद्रा
- इसका अर्थ धर्म या नियम का चक्र घुमाना अर्थात धर्म चक्र गति में लाना है |
- इस मुद्रा में दोनों हाथ सम्मिलित है |
- बाहर की ओर हथेली के साथ दाहिना हाथ छाती के स्तर पर रखा गया है | तर्जनी ओर अंगूठे का पोर जोडकर रहस्यवादी वृत बनाया गया है | बांया हाथ अंदर की ओर मुड़ा है और इस हाथ की तर्जनी और अंगूठा दाहिने हाथ का वृत स्पर्श करने के लिए जुड़े है |
अंजलि मुद्रा
- अभिवादन , भक्ति और आराधना
- दोनों हाथ छाती पर बंद है हथेलिया और उंगलिया एक दुसरे से लम्बवत रूप से जुडी हुयी है |
- यह भारत में लोगो का अभिवादन करने के लिए उपयोग की जाने वाली सामान्य मुद्रा है | यह मुद्रा श्रेष्ट को नमस्कार का प्रतीक है और इसे गहन सम्मान के साथ आदर का संकेत माना जाता है |
- यह माना जाता है कि सच्चे बुद्ध हाथ की यह मुद्रा नही बनाते है और यह मुद्रा बुद्ध की मूर्तियों में नही दिखाई जानी चाहिए | यह मुद्रा बोधिसत्वो के लिए है जिनका उद्देश्य पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने की तैयारी करना है |
उत्तरबोधि मुद्रा
- इसका अर्थ सर्वोच्च ज्ञान है |
- तर्जनी को छोडकर सभी उंगलिया गूंथते हुए , तर्जनी को सीधे उपर बढाते और एक दुसरे को स्पर्श कराते हुए दोनों हाथो को सीने के स्तर पर रखा गया है |
- यह मुद्रा व्यकित में उर्जा का प्रवाह कराने के लिए जानी जाती है | यह मुद्रा पूर्णता का प्रतीक है |
- नागो के मुक्तिदाता शाक्यमुनि बुद्ध इस मुद्रा के लिए प्रस्तुत किये गये है |
वरदा मुद्रा
- यह मुद्रा दया-भाव , करुणा या इच्छाओ की स्वीकृति इंगित करती है |
- दर्शको की ओर बाहर की ओर खुले हाथ की हथेली के साथ ,दाहिना हाथ पुरे रस्ते नीचे की ओर प्राकृतिक स्थिति में है | यदि खड़ा हाथ हो तो हाथ थोडा सा आगे की ओर बढ़ा हुआ रखा गया है | बांये हाथ ई मुद्रा भी हो सकती है |
- पाच विस्तारित उंगलियो के माध्यम से यह मुद्रा पांच पूर्णताओ को दर्शाती है उदारता ,नैतिकता ,धैर्य ,प्रयास और ध्यान संबधी एकाग्रता |
करण मुद्रा
- यह मुद्रा बुराई से बचने का संकेत करती है |
- आगे की हथेली के साथ हाथ या तो क्षितिज रूप से यह उर्ध्वाकार रूप से फैला हुआ है | अंगूठा मध्य की दो मुड़ी हुयी उंगलियों को दबाता है लेकिन तर्जनी और छोटी अंगुली सीधे उपर की ओर उठी है |
- यह नकारात्मक उर्जा को बाहर निकालने का प्रतीक है | इस मुद्रा द्वारा सृजित बीमारी या नकारात्मक विचार जैसी बाधाये दूर करने में सहायता करती है |
वज्र मुद्रा
- यह मुद्रा ज्ञान को इंगित करती है |
- यह मुद्रा कोरिया या जापान को अधिक ज्ञात है |
- इस मुद्रा में बांये हाथ की खड़ी तर्जनी दांये हाथ की मुट्ठी में रखी जाती है | यह मुद्रा दर्पण व्युत्क्रम रूप में देखी जाती है |
- यह मुद्रा ज्ञान या सर्वोच्च ज्ञान के महत्व का प्रतीक है | ज्ञान तर्जनी द्वारा दर्शाया जाता है और दाहिने हाथ की मुट्ठी उसकी रक्षा करती है |
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