
चाणक्य (Chanakya) का जन्म एक ब्रामण परिवार में हुआ था | उनके जन्मस्थान के बारे में अभी भी विवाद है और उनके जन्म को लेकर कई सिद्धांत प्रचलित है | बोद्ध ग्रन्थ महावमसा के अनुसार उनके जन्मस्थान तक्षशिला है , जैन शास्त्रों जैसे अद्बिध्न चिंतामणि में उनका नाम द्रमिला बताया गया है जो दक्षिण भारत से आये है | जैन लेखक हेमचन्द्र के परिस्शिष्टपर्वंम में चाणक्य का जन्म गोल्ला क्षेत्र का बताया है और उनके पिता का नाम चाणीन और माता का नाम चन्नेश्वरी बताया गया है | कुछ तथ्य चाणक्य (Chanakya) को उत्तरी भारत का बताते है जी भगवान विष्णु के भक्त थे | जैन शास्त्रो में चाणक्य बुजुर्गावस्था में चन्द्रगुप्त मौर्य की तरह जैन धर्म अपना लेते है |
चाणक्य का प्रारम्भिक जीवन | Early Life of Chanakya in Hindi
इतिहास के महान कूटनीतिक एव राजीनीतिज्ञ चाणक्य (Chanakya) का जन्म ईसा पूर्व तीसरी या चौथी शताब्दी माना जाता है | उन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना और चन्द्रगुप्त को सम्राट बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | उनके पिता का नाम चणक था जिसके कारण उनको चाणक्य कहा जाता है | चणक को हर वक्त अपने देश की चिंता सताती रहती थी | एक ओर जहा यूनानी आक्रमण हो रहा था तो दुसरी तरफ पडौसी राज्य मालवा ,पारस ,सिन्धु और पर्वतीय देश के राजा भी मगध का शाषन हथियाना चाहते थे |
चणक ने तभी तय किया था “मै अपने पुत्र को ऐसी शिक्षा दूंगा कि राज्य और राजा उसके सामने समर्पण कर देंगे “| चणक किसी तरह महामात्य के पद तक पहुचना चाहते थे | इसके लिए उन्होंने अपने मित्र अमात्य शकटार से मन्त्रणा कर धनानन्द को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई | अमात्य शकटार महल के द्वारपालों का प्रमुख था लेकिन गुप्तचर द्वारा महामात्य राक्षस और कात्यायन को इस षड्यंत्र का पता चल गया | उसने धननंद को इस षड्यंत्र की जानकरी दी | ये सारी गुप्त सुचना शकटार के भरोसेमंद द्वारपाल देवीदत्त ने आगे पहुचाई थी जिसकी वजह से चणक को बंदी बना लेने का आदेश दिया गया |
जब चणक को बंदी बनाया गया था तब चाणक्य बहुत कम उम्र के थे | राजद्रोह के अपराध में चणक का सर कलंक कर राजधानी के चौराहे पर लटका दिया गया | पिता के कटे सर को देखकर चाणक्य की आंखो से आसू नही रुके लेकिन उस वक़्त चाणक्य केवल 14 वर्ष के थे और उस समय बदला लेने में असक्षम थे | रात के अँधेरे में उन्होंने बांस पर टंगे अपने पिता के सिर को नीचे उतारा और एक कपड़े में लपेटा | अकेले पुत्र ने अपने पिता का दाह संस्कार किया था | उसी समय से उन्होंने धनानन्द से अपने पिता की मौत का बदला लेने की शपथ खाई थी |
प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहे चणक पुत्र चाणक्य (Chanakya) जब एक जंगल में मूर्छित पड़े थे तब एक पंडित ने उनके चेहरे पर पानी के छींटे मारे तब जाकर उनकी चेतना जाग्रत हुयी | ऋषि ने पूछा “बेटा , तेरा नाम क्या है ” कौटिल्य ने सोचा कि अगर उन्होंने अपना नाम कौटिल्य या चाणक्य बताया तो धनानन्द को उसकी सच्चाई का पता चल जाएगा इसलिए कौटिल्य से उस समय अपना नाम विष्णुगुप्त बताया | विष्णुगुप्त ने बताया “मै कई दिनों से भूखा हु ,चक्कर आने से गिर गया था , आप मुझ अनाथ पर कृपा कर दे ” |
उस पंडित ने कहा “कोई बात नही , तुम मेरे साथ चलो ,मै एक गाँव में अध्यापक हु और मै भी अकेला हु “| उस विद्वान पंडित का नाम राधामोहन था | राधामोहन ने विष्णुगुप्त को सहारा दिया | कुछ दिनों तक रहने के बाद उन्होंने विष्णुगुप्त से कहा “मेरे सहपाठी पूंडरीकाक्ष आजकल तक्षशिला में आचार्य पर पदस्थ है | मै तुम्हे उनके नाम के पत्र लिखता हु इश्वर ने चाहा तो तुम्हारी प्रतिभा के आधार पर तुम्हारा चयन हो जाएगा ” | इस तरह चाणक्य ने तक्षशिला विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए अपने जीवन का पहला कदम बढ़ाया |
चाणक्य की शिक्षा दीक्षा
अब चाणक्य की शिक्षा दीक्षा तक्षशिला विश्वविद्यालय में शूरु हो गयी | तक्षशिला उस दौर का विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था जहा देश विदेश के विभिन्न छात्र शिक्षा प्राप्त करने आते थे | तक्षशिला विश्वविद्यालय में छात्रों को छात्रों को चारो वेद ,धनुर्विद्या , हाथी घोड़ो का संचालन ,अठारह कलाओं के साथ साथ न्यायशाश्त्र , चिकित्सा शाश्त्र ,राजनीती शाश्त्र और सामजिक कल्याण की शिक्षा दी जाती थी | चाणक्य ने भी ऐसी ही उच्च शिक्षा प्राप्त की थी फलत: बुद्धिमान चाणक्य का व्यक्तित्व तराशे हुए हीरे के समान चमक उठा था |
तक्षशिला में अपनी विद्वता और बुद्धिमता का परचम फहराने के बाद वो वही राजनीति शाश्त्र के आचार्य बन गये | देश भर में उनकी विद्वता की चर्चा होने लगी थी |चाणक्य का जीवन दो शहरों तक्षशिला और पाटलिपुत्र से जुड़ा हुआ था | पाटलिपुत्र मगध साम्राज्य की राजधानी थी जो कि उत्तरपथ नामक मार्ग से तक्षशिला से जुडी हुयी थी | उस समय पाटलीपुत्र धनानन्द नामक राजा राज्य करता थक | मगध देश का सबसे बड़ा राज्य था और धनानन्द उसका शक्तिशाली राजा था लेकिन धनानन्द अत्यंत लोभी और भोग विलासी थे | प्रजा उससे संतुष्ट नही थी |
चाणक्य का निरादर और प्रतिशोध की शपथ
चाणक्य (Chanakya) एक बार राजा से मिलने पाटलीपुत्र आये | वो देशहित के लिए धनानन्द को प्रेरित करने आये थे ताकि वो छोटे छोटे राज्यों में बंटे देश को आपसी वैर भावना भूलकर एकसूत्र में पिरो सके | लेकिन धनानन्द ने चाणक्य के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और उन्हें अपमानित क्र दरबार से निकाल दिया | इससे चाणक्य के स्वाभिमान को गहरी चोट पहुची और वो बहुत क्रोधित हुए | अपने स्वाभाव के अनुकूल उन्होंने अपनी चोटी खोलकर दृढ़ संकल्प किया की जब तक वो धनानंद का समूल विनाश नही कर देंगे तब तक अपनी चोटी को गाँठ नही लगायेंगे |
जब धनानन्द को चाणक्य के इस संकल्प का पता चला तो उसने क्रोधित होकर चाणक्य को बंदी बनाने का आदेश दे दिया | लेकिन जब तक चाणक्य को बंदी बनाया जाता , तब तक वो वहा से निक्ल चुके थे | महल से बाहर आते ही उन्होंने सन्यासी का वेश धारण किया और पाटलीपुत्र में छिपकर रहने लगे |
चाणक्य की चन्द्रगुप्त से मुलाक़ात | Chanakya Meets Chandragupta
एक दिन चाणक्य (Chanakya) की भेंट बालक चन्द्रगुप्त हुयी , जो उस समय अपने साथियों के साथ राजा और प्रजा का खेल खेल रहा था | राजा के रूप में चन्द्रगुप्त जिस कौशल से अपने संगी साथियो की समस्या को सुलझा रहा था वो चाणक्य को भीतर तक प्रभावित कर गया | चाणक्य को चन्द्रगुप्त में भावी राजा की झलक दिखाई देने लगी | उन्होंने चन्द्रगुप्त के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की और उसे अपने साथ तक्षशिला ले गये | वहा चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को वेद शाश्त्रो से लेकर युद्ध और राजनीति तक की शिक्षा दी |
लगभग 8 साल तक अपने संरक्ष्ण में चन्द्रगुप्त को शिक्षित करके चाणक्य ने उसे शूरवीर बना दिया | उन्ही दिनों में विश्वविजय पर निकले यूनानी सम्राट सिकन्दर विभिन्न देशो पर विजय प्राप्त करता हुआ भारत की ओर बढ़ा चला आ रहा था | गांधार का राजा आम्भी सिकन्दर का साथ देकर अपने पुराने शत्रु राजा पुरु को सबक सिखाना चाहता है | चाणक्य को आम्भी की यह योजना पता चली तो वो उसे समझाने के लिए गये | आम्भी से चाणक्य ने इस सन्दर्भ में विस्तारपूर्वक बातचीत की , उसे समझाना चाहा , विदेशी हमलावरों से देश की रक्षा करने के लिए उसे प्रेरित करना चाहा , किन्तु आम्भी ने चाणक्य की एक भी बात नही मानी | वो सिकन्दर का साथ देने को कटिबद्ध रहा |
कुछ दिनों बाद जब सिकन्दर गांधार में प्रवेश किया तो आम्भी ने उसका जोरदार स्वागत किया | आम्भी ने उसके सम्मान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया | इस सभा में चाणक्य और चन्द्रगुप्त भी उपस्थित थे | सभा के दौरान सिकन्दर के सम्मान में उसकी प्रशंशा के पुल बांधे | उसे महान बताते हुए देवताओ की तुलना की गयी , सिकन्दर ने अपने व्याख्यान में अप्त्र्यक्ष रूप से भारतीयों को धमकी सी दे दी थी कि उनकी भलाई इसी में है वो उनकी सत्ता स्वीकार कर ले |
चाणक्य (Chanakya) ने सिकन्दर की इस धमकी का खुलकर विरोध किया था | चाणक्य के विचारो से सिकन्दर प्रभावित हुआ था लेकिन विश्वविजय की लालसा के कारण वो युद्ध से विमुख नही होना चाहता था
मुद्रराक्षश के अनुसार चन्द्रगुप्त मुरा नाम की रखैल का पुत्र था और उसने अपना बचपन नन्द महल में ही बिताया था | बौध शाश्त्रो के अनुसार चन्द्रगुप्त पिपलिवन के मोरिया वंश के प्रमुख का पुत्र था | चाणक्य ने एक दिन उसे नौजवानों के दल का नेतृत्व करते देककर काफी प्रभावित हुआ | उसने चन्द्रगुप्त को नन्द साम्राज्य के विरोध के लिए तैयार किया था
चाणक्य (Chanakya) और चन्द्रगुप्त ने उत्तर-पश्चिम भारत के पर्वतका [ राजा पोरस ] से संधि पर हस्ताक्षर कर लिए कि वो नन्द साम्राज्य के विरुद्ध जीत जायंगे | चाणक्य के अनुयायियों के लिए नेपाल उस समय जंगे की रणनिति के लिये सुरक्षित शरणस्थान था | वहा पर उन्होंने शक , यवन , कीरत , कम्बोज ओर वह्लिक सैनिको को एकत्रित किया | नन्द साम्रज्य के विरुद्ध युद्ध में उनकी जीत हो गयी | जीत के बाद नदं साम्राज्य को दो भागो एक पर्वतका का और दूसरा चाणक्य के सहयोगी चन्द्रगुप्त में बांट दिया गया |
पर्वतका की मौत के बाद उसके पुत्र मलायकेतु ने सभी पूर्व नन्द प्रदेशो को अपने कब्जे में ले लिया | इस कार्य में नन्द साम्राज्य के पूर्व मंत्री राक्षसा ने उसकी सहायता की और उसने कई बार चन्द्रगुप्त को भी मारने की कोशिश की जिसे चाणक्य (Chanakya) ने नाकाम कर दिया था | चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने एक योजना के अनुसार एक दुसरे के बीच झूठी लड़ाई की रचना की | इस योजना में चन्द्रगुप्त ने चाणक्य को मंत्री पद से हटाने का दिखावा किया और राक्षसा को चाणक्य (Chanakya) से बेहतर बताया |
मलायकेतु के दरबार में चाणक्य (Chanakya) के गुप्तचरो ने , चन्द्रगुप्त के दरबार में चाणक्य के स्थान पर राक्षसा की नियुक्ति पर सुचना देकर , राजा को राक्षसा के विरुध कर दिया | इस घटना को चाणक्य के गुप्तचरों ने फैलाकर मलायकेतु और राक्षसा के बीच दरार पैदा कर दी | इसके अलावा चाणक्य के गुप्तचरो ने मलायकेतु को मुर्ख बनाया कि उसके पांच सहयोगी भी चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ मिलकर उसे मारने की योजना बना रहे है | अंत में राक्षसा को चन्द्रगुप्त की तरफ आना पड़ा और चाणक्य निति Chanakya Niti से मलायकेतु का गठबंधन टूट गया |
चाणक्य (Chanakya) ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना पर चन्द्रगुप्त के मुख्य सलाहकार के रूप में कार्य किया | जैन शाश्त्रो में बताया जाता है कि चाणक्य , राजा चन्द्रगुप्त मौर्य को भोजन में थोड़ी थोड़ी मात्रा में विष देता था ताकि वो दुश्मनों के विष देने के प्रयासों से प्रतिरक्षित रह सके | इस बात से अनभिग चन्द्रगुप्त एक दिन अपने भोजन का कुछ हिस्सा अपनी गर्भवती पत्नी दुर्धरा को दे देते है जिसकी विष से प्रतिरक्षा ना होने से तुरंत मौत हो जाती है | वंश के उत्तराधिकारी को बचाने के लिए चाणक्य रानी की मौत के तुरंत बाद उसके पेट को चीरकर नवजात शिशु को बाहर निकाल देते है | रक्त में विष की एक बूंद छु जाने के कारण उस शिशु का नाम बिन्दुसार रखा जाता है | चाणक्य बिन्दुसार के दरबार में भी कई वर्षो तक सलाहकार रहे थे
चाणक्य की मौत से जुड़े विविध तथ्य | Death Facts of Chanakya in Hindi
चाणक्य (Chanakya) की मृत्यु पर भी विवाद है एक किंवदंती के अनुसार चाणक्य सेवामुक्त होकर जंगल चले गये थे जहा पर उन्होंने भूखा रहकर अपने आप को मार दिया | एक दुसरे मत के अनुसार चाणक्य बिन्दुसार के एक मंत्री सुबंधु के षड्यंत्र के कारण मारे गये जिसने चाणक्य को बिन्दुसार की माँ की मौत का जिम्मेदार बताया| बिन्दुसार ने उनकी दाई से इस बात की पृष्टि भी करी और ये सुनकर भयभीत और नाराज हो गये थे |
जब चाणक्य (Chanakya) को इस बात का पता चला कि राजा उससे नाराज है तो उन्होंने वन में जाकर भूख से अपने आप को मार दिया | बिन्दुसार को बाद में ये ज्ञात हुआ कि चाणक्य उनकी माँ की मौत के जिम्मेदार नही बल्कि ये दुर्घटनावश हो गया था लेकिन देर हो चुकी थी | चन्द्रगुप्त के पूछताछ पर सुबंधु ने उनको चाणक्य की हत्या की योजना बताई की वो चाणक्य को एक वीरान जगह पर बुलाकर जीवित जला देना चाहता था |
चाणक्य (Chanakya) को भारत का सबसे महान विचारक और कूटनीतिज्ञ माना जाता है | कई राष्ट्रवादी इतिहासकारों का मानना है कि चाणक्य भारतवर्ष में एकमात्र ऐसे इन्सान हुए जिन्होंने अखंड भारत का स्वप्न देखा और उसे पूरा किया | चाणक्य को दो पुस्तको अर्थशाष्त्र और चाणक्य निति Chanakya Niti का जनक माना जाता है | चाणक्य के सम्मान में दिल्ली की एक जगह का नाम चाणक्यपुरी रखा गया और इसके अलावा कई बड़े संस्थानों के नाम भी इनके नाम पर रखे गये |
चाणक्य से जीवन से जुड़े धारावाहिक | Serial Based on Chanakya in Hindi
चाणक्य के जीवन पर आधरित एक टीवी सीरियल “Chanakya” नाम से दूरदर्शन पर प्रसारित किया जाता था जो मुद्र राक्षस नाटक पर आधारित था | इसके अलावा NDTV Imagine पर “Chandragupta Maurya” सीरियल में चन्द्रगुप्त और चाणक्य के जीवन को दर्शाया गया | 2015 में Colors TV पर “चक्रवती अशोक सम्राट ” सीरियल में भी बिन्दुसार के दरबार में चाणक्य को दिखाया गया | चाणक्य के जीवन और कार्य पर कई पुस्तके भी लिखी गयी |
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