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Tulsidas Biography in Hindi | गोस्वामी तुलसीदास की जीवनी और दोहे

Goswami TulsiDas Biography and Dohe in Hindi

Tulsidas Biography in Hindi गोस्वामी तुलसीदास की जीवनी और दोहे
Tulsidas Biography in Hindi गोस्वामी तुलसीदास की जीवनी और दोहे

Goswami TulsiDas गोस्वामी तुलसीदास एक महान संत होने के साथ साथ एक महान सृजनकर्ता भी थे | श्री राम के परम भक्त होने के कारण भक्तिरस में डूबे हुए उन्होंने अनेक काव्य लिखे जिनमे “रामचरितमानस ” को एक महाकाव्य के रूप में विश्व स्तर पर ख्याति मिली | तुलसीदास एक साधारण कवि नही बल्कि एक सुकवि थे | छंद , चौपाई ,सोरठा ,दोहा आदि से अपने काव्य को जिस तरह उन्होंने जीवन्तता और सरसता प्रदान की है उस तरह जीवंतता शायद ही किसी कवि ने अपने काव्य में दी है | तुलसीदास के काव्य की ख़ास विशेषता यह है कि उनके काव्य को संगीत के साथ गाया जा सकता है |
Goswami TulsiDas तुलसीदास स्वयं एक कुशल कथावाचक थे जो रामकथा गा गाकर लोगो को सुनाया करते थे | तुलसीदास एक उदार हृदय के व्यक्ति थे और दुसरो के प्रति उनके मन में अपार श्रुधा थी | उन्होंने जीवन के हर रंग को बड़े करीब से देखा था | तभी तो तुल्सीदास के साहित्य में जीवन के सभी पक्ष खुलकर सामने आये है | Goswami TulsiDas तुलसीदास को वेदों ,पुराणों और शाश्त्रों का विधिवत ज्ञान था जिसका जीता जागता सबूत “रामचरितमानस” है जिसमे गोस्वामी जी ने वेद ,पुराण ,शास्त्रों का निचोड़ बड़ी कुशलता से मिला दिया है |
Goswami TulsiDas गोस्वामी तूलसीदास की एक यह विशेषता भी काबिले तारीफ़ थी कि वो सगुण ब्रह्म के उपासक थे | उनका मानना था कि सगुण और निर्गुण ब्रह्म में कोई फर्क नही है जैसे बर्फ और जल एक ही है | जल से बर्फ और बर्फ से जल बनने की क्रिया शाश्वत है ब्रह्म की भी यही स्तिथि है | निर्गुण विधि से ब्रह्म को जानना जितना असहज है उतना ही सहज सगुण विधि से जानना है | तूलसीदास में समन्वय की भावना थी | उन्होंने रामचरितमानस में राम से यह कहलवाया कि जो लोग शिव को नही पूजते और मेरी पूजा करते है वो सपने में भी मुझे नही सुहाते है और शिव से कहलवाया था कि जो व्यक्ति राम की भक्ति में विश्वास नही करते है वो मेरे भक्त नही हो सकते है | इस तरह गोस्वामी तुलसीदास ने शिव और राम के भक्तो को एक धागे में पिरोने का पुण्य कार्य किया |
Goswami TulsiDas तूलसीदास मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानते है ,मर्यादा का गुणगान करते थे और दुसरो को पीड़ा पहुचाने के कार्य को अधम मानते थे | दुसरो का भला करना उनकी नजर में सबसे महान कार्य था | गोस्वामी जी ने जो हृदय से अनुभव किया उसे ही आत्मसात किया और दुसरो के लिए भी उपयुक्त माना | Goswami TulsiDas तूलसी दास राम के भक्त होने के साथ साथ हनुमान के भी परम भक्त थे और उन्होंने हनुमान जी को संकटमोचक कहकर उनका गुणगान किया लेकिन तूलसी दास का प्रारम्भिक जीवन बहुत विविधता पूर्ण रहा और उन्हें जीवन में काफी उतार चढाव देखने पड़े | आइये उनके प्रारम्भिक जीवन पर प्रकाश डालते है |

गोस्वामी तुलसीदास  का प्रारम्भिक जीवन

तीर्थराज प्रयाग के नजदीक एक बांदा जिला है जिसमे राजुपुर नामक एक सुंदर गाँव है | राजापुर गाँव में आत्माराम दुबे अपने पत्नी हुलसी के साथ सुख से रह रहे थे |  दोनों पति-पत्नी को अपने जीवन में एक सन्तान की कमी खल रही थी क्योकि कई वर्ष बीतने पर भी उन्हें सन्तान प्राप्ति नही हुयी थी | आत्माराम जाति से ब्राह्मण और विद्वान थे  फिर भी उनकी इश्वर में अगाध आस्था थी और उनकी पत्नी भी धर्म के नाम पर सब न्योछावर करने को तैयार थी |
ईश्वर की कृपा आखिर उस ब्राह्मण दम्पति पर बरस ही गयी और हुलसी देवी गर्भवती हो गयी | गर्भावस्था के दौरान हुलसी देवी अनेक चमत्कारिक अनुभवो से गुजरी | पुरे नौ माह बीत जाने के बाद भी जब उन्होंने सन्तान को जन्म नही दिया तो दुबे परिवार चिंतित हो गया कि ऐसा क्या है कि पुरे नौ माह पुरे होने पर भी प्रसव पीड़ा अभी तक नही हुयी | दसवा और ग्यारहव महीना भी बीत गया जो एक आश्चर्यजनक घटना थी | हुलसी देवी को इश्वर में पुरी आस्था थी जिसके कारण बारहवे महीने को प्रसव पीड़ा की अनुभूति हुयी |
संवत 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी को मूल नक्षत्र में हुलसी देवी ने एक अलौकिक दिव्य बालक को जन्म दिया | यह एक असाधारण बालक था वैसे तो सामान्यत बच्चा पैदा होते ही बच्चे चीखते चिल्लाते है लेकिन ये बालक बिलकुल शांत था | बालक ने माँ की गर्भ से बाहर आते ही “राम ” का नाम लिया | उसके मुख में बत्तीसो दांत थे और उसके शरीर की बनावट पांच साल के बालक की तरह थी | ऐसे अनोखे बालक को देखने के लिए पूरा गाँव उमड़ आया | बालक मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था जिसको अशुभ माना जाता था | लोगो की बातो से आत्माराम काफी डर गये थे |
हुलसी देवी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने अपने पति की परेशानी को देखते हुए अपनी दासी चुनिया से इस बालक को उसके ससुराल ले जाने को कहा | चुनिया हुलसी देवी से बहुत स्नेह रखती थी और उसका आदर भी करती थी | चुनिया बालक को लेकर चली गयी और उसके जाने के अगले ही दिन हुलसी देवी ने देहत्याग दिया | उधर बालक को “रामबोला ” कहकर पुकारा जाने लगा क्योंकि उसने पैदा होते ही राम नाम लिया था | चुनिया ने बालक को पालने पोसने में कोई भेदभाव नही किया और उसे भी अपने पुत्र की तरह वात्सल्य दिया |
बालक रामबोला जब पाच वर्ष का हुआ तब चुनिया ने भी संसार छोड़ दिया | चुनिया का निधन रामबोला के लिए ढेरो कष्ट लेकर आया | रामबोला का अब इस दुनिया में कोई नही था | वह बिलकुल अनाथ हो गया था और उसकी देखभाल करने वाला भी कोई नही था | उधर आत्माराम का भी निधन हो गया था | रामबोला के उपर ऐसे संकट के कारण उन्हें अपशकुनी माना जाने लग गया | राम बोला अब मजबूरी में अपना पेट भरने के लिए भीख मांगने लगा लेकिन जिस दरवाजे पर जाता तो औरते अनिष्ट के भय से दरवाजा बंद कर लेती और कहती रहती थी जन्म लेते ही जिसके माता पिता मर जाए भला उस बालक के पास कौन आना चाहेगा |
दासी चुनिया की मौत के बाद तो रामबोला को लेकर लोगो में बहुत ज्यादा गलत धारणाये पैदा हो गयी थी जिसके कारण रामबोला दाने दाने का मोहताज हो गया | उन्हें कोई भी भीख देने को तैयार नही था | ऐसा कहा जाता है कि ऐसी कठिन परिश्तिथि में जगतजननी माता पार्वती से उनकी ये दुर्दशा देखी नही गयी और वो ब्राह्मणी के वेश में रोज बालक के पास आकर उसे भोजन कराने लगी | गोस्वामी जी ने स्वयं कहा है जिसे लोग अमंगलकारी समझकर छोड़ देते है भगवान स्वयं उनकी देखभाल करते है |

तुलसीदास जी को गुरु नरहर्यानन्द की शिक्षा

भगवाना शिव ने रामबोला के विषय में रामशैल रहने वाले श्री नरहर्यानन्द को बताया जो एक पहुचे हुए सिद्ध महात्मा थे | वो उसी क्षण रामबोला की खोज में निकल पड़े और उन्होंने आखिर कार रामबोला को ढूढ ही लिया और अयोध्या लेकर आ गये | अब रामबोला के अच्छे बुरे दिन बीतते गये | अब रामबोला एक योग्य गुरु के हाथो सजने संवरने लगे और बढ़ने फलने लगे |  श्री नरहर्यानन्द ने अयोध्या में ले जाकर संवत 1561 में रामबोला का यज्ञोपवीत संस्कार करवाया | फिर पांच वैष्णवों के पांच संस्कारो से रामबोला को संस्कारित किया और “राम ” नाम का गुरु मन्त्र दिया जिसके बाद रामबोला तूलसीदास हो गये |
Goswami TulsiDas तूलसीदास जी की गुरूजी की छाया में अलौकिकता प्रकट होने लगी | वो गुरु के मुख से जो भी एक बार सुन लेते थे वो उसे ना केवल कंठस्थ करते बल्कि मन में भी हमेशा के लिए रख लेते थे | तुलसीदास गुरु के साथ अयोध्या रहने के बाद शुकर क्षेत्र चले गये वही पर तूलसी दास ने गुरु के मुख से पहली बार रामचरित को सुना जो उनको बहुत अच्छा लगा | राम तो बचपन से ही तुलसीदास के रोम रोम में रचे बसे थे | रामकथा सुनने के बाद राम कर प्रति उनकी आस्था ओर गहरी हो गयी | शुकरक्षेत्र कुछ दिनों रक रहने के बाद तूलसीदास शिव की नगरी काशी आ गये |
तूलसीदास बचपन से ही मेधावी आयर दिव्य तेजयुक्त थे | तूलसीदास जी के गुरूजी चाहते थे कि तूलसीदास वेदों का गहन अध्ययन करे क्योंकि वेदों के ज्ञान के बिना सारा तत्व को समझना मुशिकल तगा | शेष सनातन से तूलसीदास को मिलवाकर उनके गुरूजी यात्रा पर  निकल गये | तूलसीदास शेष सनातन से वेदों की शिक्षा ग्रहण में पुरे मनोयोग से जुट गये |

तुलसीदास की युवावस्था और वैवाहिक जीवन

काशी में आने के बाद तुलसीदास जी 15 वर्षो तक शेष सनातन जी के पास रहने लग गये जहा उन्होंने वेदों का अध्ययन किया | तूलसीदास अब बीस साल के युवा थे | आचार्य शेष सनातन ने उन्हें आदेश देते हुए कहा कि तूलसी ! मुझसे प्राप्त शिक्षा का दुरूपयोग कभी नही करना | इसे धनार्जन का जरिया कभी नही समझना और भगवान राम पर अपना विश्वास सदा ही बनाये रखना , वही तुम्हारी नैया पार लगायेंगे | तुलसीदास जी गृहस्थाआश्रम में प्रवेश नही करना चाहते थे लेकिन उनके गुरूजी ने भगवान राम का उदाहरण देते हुए विवाह करने के लिए प्रेरित किया | आचार्य के आदेश के अनुसार उन्होंने विवाह करने का निर्णय ले लिया |
Goswami TulsiDas गोस्वामी तूलसीदास एक बार राजापुर के एक मन्दिर में जब रामकथा सुना रहे थे तब उनकी दृष्टि एक युवती पर पड़ी | वो युवती उनको पलक झपकाए बिना देखे जा रही थी | कथा समाप्त होने के बाद वो युवती तुलसीदास जी के समीप आ गयी और उनसे बाते करने लगे गयी | धीरे धीर उनकी समीपता बढ़ गयी और एक दिन तूलसीदास जी उस युवती के घर पर उसके पिता से मिलने चले गये | कुछ दिनों बाद उस युवती रत्नावली के पिता ने तूलसीदास जी से अपनी पुत्री के साथ विवाह करने की बात कही | तुलसीदास जी राजी हो गये और उन दोनों का विवाह हो गया |
अब तूलसी दास जी रत्ना के प्रेम में इतने आसक्त हो गये कि राम का नाम लेना तक भूल गये थे | तूलसी विवाह के बाद पहले वाले कथावाचक तूलसी नही थे | रत्नावली तूलसी को लेकर काफी चिंतित थे | महाविध्वान तूलसी वासना का पुतला बनकर रह गया है यह ख्याल आते ही रत्नावली का हृदय दो टुक हो जाता और वो इसके कलिए स्वयं को ही दोषी मानती थी | रत्नावली ने सोचा कि वह कुछ दिनों के लिए यदि मायके चली जाए तो शायद तूलसी में बदलाव आ जाए और उसके दिमाग से आसक्ति निकल जाए |
रत्नावली का प्रेम तूलसी के प्रति सच्चा था वो तूलसी से अलग नही रहना चाहती थी
लेकिन तूलसी की उनकी आसक्ति को देखकर उसने यह निर्णय किया था | तूलसी जब घर पर नही थे वह मायके के लिए प्रस्थान कर गयी | तूलसी कथा बांचकर मन्दिर से आये तो रत्नावली को कही नहीं देखकर वो काफी चिंतित हो गये | आस पडोस में उन्होंने रत्नावली को ढूंढा लेकिन कही नही मिली तो निराश होकर घर आ गये | तूलसी ने जब रत्नावली के कपड़े नही देखे तो उन्होंने अनुमान लगाया कि वो मायके चली गयी है | तूलसी अब शांत कहा बैठने वाले थे और वो भी रत्नावली के मायके निकल पड़े|
Goswami TulsiDas तूलसीदास का ससुराल तारिपता गाँव में था जो यमुना नदी के किनारे बसा था | बारिश का मौसम था और नदिया उफन रही थी | शाम ढल गयी थी और आसमान बादलो से ढका हुआ था | किसी भी समय मुसलाधार बारिश हो सकती थी लेकिन तूलसी को इन सब की परवाह नही थी | तूलसी दास परेशान थे कि इतने खराब मौसम में रत्नावली घर से कैसे निकल गयी | रत्नावली की चिंता करते करते वो नदी की ओर भागते चले गये | नदी तट पर पहुचते ही जोर से बारिश होना शुरू हो गयी  | तूलसी ने एक नाविक से नाव को उस पार ले जाने को कहा लेकिन तूफ़ान की वजह से उसने माना कर दिया |
अब तूलसी ने दूर तक नजर दौड़ाई तो उसे एक नाव नजर आयी जी पर रत्नावली अकेली बैठी थी | तूलसी अगले ही पल नदी में कूद गये और तैरने लगे | बहुत देर तक हाथ पाँव मारने के बाद वो थक गये तब उन्हें किसी लकड़ी के लट्ठे का सहारा मिल गया जिसकी मदद से वो रत्नावली की नाव के समीप आ गये | जब तूलसी ने रत्नावली को पुकारा तो रत्नावली ने नाविक से नाव रोकने को कहा | नाविक ने एक रस्सा फेंका और तूलसी नाव में तो आ गये लेकिन मुर्चित हो गये थे  | जब उस नाविक को पता चला कि जिसके सहारे वो तैरकर उस नाव तक पहुचा वो लकड़ी का लट्ठा नही बल्कि लाश थी तो उसने विद्वान तूलसी को मुर्ख कहकर पुकारा |
तूलसी के इस व्यवहार से रत्नावली को बहुत आत्मग्लानी हुयी और तब रत्नावली ने तूलसी पर एक तंज कसा जिससे उनका जीवन बदल गया |

लाज न लागत आपको ,दौरे आवहु साथ
धिक् धिक् ऐसे प्रेम को , कहा कहू मै नाथ
अस्थि-चर्ममाय देह मम, तामे जैसी प्रीति
ऐसी जो श्री राम महे , होती न तो भव भीति

ये सुनकर तूलसी के मन को बड़ी ठेस पहुची और उनके आगे अँधेरा छा गया | तारपिता गाँव आने के बाद उन्होंने गाँव में कदम नही रखा और रत्नावली से वापस लौटने की इजाजत माँगी | तूलसी इसके बाद रत्नावली से प्यार में अँधा हो जाने की क्षमा मांगकर उसकी आँखों से ओझल हो गये | चार साल तक तूलसी इसके बाद भटकते रहे और एक बार जब वापस तारपिता गाँव में लौटे तो उन्हें पता चला कि पति वियोग में उनकी पत्नी के मृत्यु हो गयी | तूलसी इसके बाद अगले की दिन चित्रकूट पहुचे और रत्नावली का श्राद्ध किया |

रामचरितमानस का लेखन और तूलसी दास जी के अंतिम दिन

Goswami TulsiDas तूलसी अब चित्रकूट से काशी आ गये और एक मठ के महंत बन गये | उन्हें बार रत्नावली की याद सता रही थी और रत्नावली उनको एक रामभक्त के रूप में देखना चाहती थी इसलिए उन्होंने राम कथा को आधार बनाकर एक महाकाव्य लिखने का विचार किया |  सन 1574 में चैत्र मास की नवमी से उन्होंने रामचरितमानस का लेखन कार्य शुरू किया | इसके बाद उन्होंने महंत पद छोडकर पुरी तरह रामचरितमानस के लेखन में खुद को स्मप्र्पित कर दिय | तूलसी दास की ज्यादातर समय काशी में ही बिता
संवत 1680 में श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन तुलसीदास जी ने काशी के असी घाट पर देह त्याग दिया | जब तूलसीदास जी का देहांत हुआ उस समय वो 91 वर्ष के थे | तूलसी दास इस दुनिया से तो चले गये लेकिन अपने महाकाव्यों के कारण सदैव के लिए अमर हो गये |

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