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सिक्के की कहानी ,गजबखबर की ज़ुबानी | History of Coins in Hindi

History of Coins in Hindi

मित्रो आज हम आपको Coins सिक्के की कहानी बताने जा रहे है जो शुरुवात से मनुष्य जीवन में क्रय-विक्रय का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है | नोटों का प्रचलन तो पिछले 50-60 सालो से अधिक होने लगा है लेकिन उससे पहले केवल Coins सिक्को के आधार पर ही वस्तु विनिमय किया जाता था | हर देश में सिक्के का अलग अलग महत्व था और हर देश के शासक अपनी प्रजा में अपने प्रभुत्व को दर्शाने के लिए सिक्को पर अपनी छवि जरुर डालते थे | समय के साथ साथ सिक्को का एकीकरण होता गया | प्रान्तों के सिक्के Coins बंद होकर प्रदेश के सिक्के में और फिर बाद में प्रदेशो के सिक्के बंद होकर राष्ट्रीय सिक्को में तब्दील हो गये | आइये आपको सबसे पहले Coins सिक्को की उत्पति कैसे हुयी बताते है |

आज से कई वर्षो पहले सिक्को का कोई अस्तित्व नही हुआ करता था क्योंकि लोग वस्तु विनिमय के आधार पर व्यापार करते थे | वस्तु विनिमय में वस्तुओ के आदान प्रदान करके लोग जीवन चलाते थे |जैसे  किराना के सामान के बदले अनाज , सोने और चांदी का आदान प्रदान ऐसे वस्तु विनिमय हुआ करता था  उस दौर में लोग मजदूरी के बदले अन्न पाते थे | बहुत से देशो में राजकीय-कर भी अन्न के रूप में ही दिया जाता था |  रोम में ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी तक प्रजा प्राय: भेड़-बकरी देकर राज-कर चुकाती थी |

धीरे धीरे जब आर्थिक जीवन का विकास होने लगा तो मनुष्य ने अनुभव किया कि वस्तु-विनिमय प्रणाली से काम नही चल सकता है | इसलिए लोगो को ऐसी वस्तु की आवश्यकता प्रतीत हुयी जो सर्वमान्य हो ,जिसका मूल्य निश्चित हो और जिसे देकर मनुष्य मनचाही चीज ले सके |  इस उद्देश्य से लेन-देन का माध्यम बनाया , जिसे “सिक्का ” कहते है | सिक्के शब्द असीरिया के “सिक्त” शब्द से बना है | सिक्का आरम्भ में धातु का नही होता था | भिन्न भिन्न युगों में और भिन्न भिन्न देशो में उसका स्वरुप भिन्न भिन्न था |

सबसे पहले कुछ देशो में पालतू जानवर और जानवरों के बालो एवं चमड़े से सिक्के बनाये जाते थे |कृषिप्रधान देशो में गाय-बैल और भेड़ आदि मुख्य “सिक्के ” थे | इन सबकी दर निश्चित थी | उदाहरण के लिए प्राचीन रोम में दस भेड़े देने से एक बैल खरीदा जा सकता था | इसके बाद कही कही नमक ,चाय ,नारियल , खजूर , तम्बाकू ,जैतून का तेल , कपड़ा , कोयला रबर आदि वस्तुओ को विनिमय का माध्यम बनाया गया |मतलब की सिक्को से ये वस्तुए खरीदी और बेची जा सकती थी |

भारतवर्ष ने कौड़ी का सिक्का बनाया | कौड़िया हिन्द महासागर में ही अधिक मिलती है | इस सिक्के का पहले एशिया के देशो में , फिर अफ्रीका ,यूरोप ,अमेरिका अदि में भी प्रचलन हो गया | भिन्न-भिन्न भाषाओं में कौड़ी के जो नाम है , उन्ही से यह विदित होता था की इस चीज को विदेशियों ने भारत से ही लिया था | अंगरेजी में इस क्रोवरी , फ्रेच में कोरिस , रोमन में कोरी , जर्मनी में कौरिस और रूसी में कौरिस कहते थे |

कौड़ी भारत की अत्यंत प्राचीन मुद्रा है | भास्कराचार्य ने अपने ग्रन्थ “लीलावती ” में मुद्रा के रूप में कौड़ी का उल्लेख किया है | वह पंडितो को दक्षिणा में दी जाती थी | कुछ वर्षो पहले तक कौड़ी मुद्रा के रूप में स्वीकृत होती थी | तीर्थ स्थानों में भिखारियों को कौड़िया बांटी जाती थी | सन 1840 से 2400 कौड़ियो का एक रुपया होता था | उसके बाद पहले तो इसका मूल्य घटता गया और बाद में बढ़ता गया | अब तो कौड़िया बहुत महंगे मोल मिलती है | अफ्रीका के बहुत से भागो में 19वी सदी के मध्य तक वही प्रमुख मुद्रा थी | वहा के एक राजा की वार्षिक आय तीन करोड़ कौड़ी थी जहा इसको “कुरंदी ” कहते थे |

विनिमय के उपयुक्त माध्यम संतोषजनक सिद्ध नही हुए  इसलिए किसी वस्तु की आवश्यकता हुयी जो उपयोगी हो , कम और कठिनाई से मिलती हो , ठोस और टिकाऊ हो तथा जिसे पहचानने और लेने देने में सबको सुविधा हो | ये सब गुण धातु में ही मिले , इसलिए उसे विनिमय का माध्यम बनाया गया | अत: सब तरह के अन्य सिक्को के स्थान पर उसी का सिक्का जम गया | आरम्भ में धातु के सिक्के आजकल के सिक्को जैसे नही थे | उनके सादे टुकडो से या छोटी-बड़ी धातु की छड़ो और कीलो से सिक्के का काम लिया जाता था |

कुछ विशेषज्ञों का मत है कि आज से लगभग 3000 वर्ष पहले चीन ने धातु का सिक्का चलाया था | अरस्तु ने लिखा है  कि चीन और जापान में इसके लिए लोहे का उपयोग होता था | यूनान में चांदी का प्रचलन था | रोम में पहले पीतल के सादे टुकड़े चले , फिर ईसा पूर्व 269 से चांदी का उपयोग होने लगा | कही ताम्बा या सोना भी काम में लिया जाता था |

ये धातु खंड एक से आकार-प्रकार के नही होते थे इसलिए उनकी शुद्दता और नापतौल की चांज करने और हिसाब लगाने में कठिनाई होती थी | इस कठिनाई को दूर करने के लिए ये आवश्यक समझा गया कि धातु -खंडो को एक ही नाप और तौल के छोटे छोटे आकारों में विभाजित करके उनका मूल्य निश्चित कर दिया जाए और उन पर कोई ऐसा चिन्ह अंकित किया जाए , जिससे उनका ठीक ठीक मूल्य और उनके प्रचलन के लिए किसी का अधिकार सूचित हो |

ऐसे धातु के चिन्हांकित टुकड़े राज्य के बनावाए और चलाए जाने पर प्रमाणिक और सर्वस्वीकृत हो सकते है | इसलिए विविध देशो के राजा ने सोने ,चांदी ,ताम्बे और पीतल के तरह तरह के सिक्के बनावाना आरम्भ कर दिया | उन पर सब अपने अलग अलग राजकीय और जातीय धर्म चिन्ह , नाम और मूल्य अंकित कराते थे | प्रत्येक देश में वहा के राजा का सिक्का ही चल सकता था | राजा का यह अधिकार इतना महवपूर्ण माना जाने लगा कि सिक्का चलाना ही प्रभुत्व का परिचायक हो गया |

प्रत्येक स्वाधीन राजा अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए अपनी विशेष चिन्हित मुद्रा चलाता था | किसी देश के स्वतंत्र सरकार को ही मुद्रा बनाने और प्रचलित करने का अधिकार रहता था | इस समय भिन्न भिन्न देशो में भिन्न भिन्न नामो और रूपों की मुद्रए प्रचलित थी | जैसे रूस में रूबल , अमेरिका में डॉलर , इंग्लैंड में पाउंड , फ़्रांस में फ्रैंक , इटली में लिरा , जर्मनी में मार्क और भारत वर्ष में रुपया |

तो मित्रो ये तो रही सिक्को के उत्पति की कहानी | अब अगले अंश में हम आपको अलग अलग देशो में शुरू हुए Coins प्राचीन सिक्को और आधुनिक सिक्को की कहानी Coins बतायेंगे | तब तब आप हमारी इस पोस्ट पर हमारे विचार प्रकट करे और अन्य पोस्ट पढ़ते रहे |

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