80 रूपये की पूंजी से शुरू किया था सात गुजराती महिलाओं ने लिज्जत पापड़ का कारोबार , आज 500 करोड़ रूपये का है व्यवसाय | Lijjat Papad Story in Hindi
Lijjat Papad Story in Hindi
मित्रो जब भी हम पापड़ का नाम लेते है तो सबसे पहले हमारे सामने लिज्जत पापड़ Lijjat Papad का नाम आता है जो पिछले 50 सालो के पापड़ के कारोबार में शीर्ष पर है | 90 के दशक में लिज्जत पापड़ Lijjat Papad का कारोबार इतना फ़ैल गया था कि इस कम्पनी ने अखबारों और टीवी पर विज्ञापन देना शुरू कर दिया था | अगर हम 90 के दशक के दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले विज्ञापनों की बात करे , तो Lijjat Papad लिज्जत पापड़ को हम कभी नही भूल पायेंगे | 80 रूपये की पूंजी से शुरू होने वाला ये कारोबार आज 500 करोड़ रूपये से ज्यादा का हो गया है और ये फर्म आज भारत के लगभग 50 हजार लोगो को रोजगार मुहैया करवाती है | इस फर्म की मुख्य शाखा मुम्बई में है और पुरे भारतवर्ष में इसकी 81 शाखाए है | ग्रामीण इलाको के इस व्यवसाय ने किस तरह उचाइयो को छुआ , आइये आज हम आपको Lijjat Papad की कहानी सुनाते है
Lijjat Papad लिज्जत बॉम्बे में रहने वाली सात गुजराती महिलाओं की उपज था जो गिरगौम लोहाना निवास में रहती थी | उन निरक्षर गृहिणियो के पास अपने दैनिक कार्य निपटाने के बाद काफी समय मिल जाता था इसलिए उन्होंने विचार किया कि कुछ ऐसा काम किया जाए , जिससे वो भी परिवार की आय में अपना हाथ बंटा सके | इन सात महिलाओं के नाम जसवंतीबेन जमनादास पोपट , पार्वतीबेन रामदास ठोदानी , उजमबेन नरानदास कुण्डलिया , बानुबेन तन्ना , लागुबेन अमृतलाल गोकानी , जयाबेन विठलानी और एक ओर औरत थी जिसका नाम किसी को पता नही है | आप तो जानते है कि जिस तरह गुजराती आदमी व्यापार में सबसे आगे माना जाता है उसी प्रकार गुजराती महिलाये भी खाने की चीजे बनाने में किसी से कम नही है |तभी उन सबको आय के स्त्रोत के तौर पर पापड़ Lijjat Papad बेचने का विचार आया |
इन सातो गुजराती महिलाओं ने Servants of India Society के अध्यक्ष और एक सामाजिक कार्यकर्ता छगनलाल पारेख से 80 रूपये उधार लिए | इसके बाद इन महिलाओं ने एक घाटे में चल रहे उद्यम से पापड़ बनाने वाली मशीन को खरीद लिया और इसके साथ ही कुछ पापड़ बनाने के जरुरी सामान खरीदे | अब 15 मार्च 1959 को ये सभी गुजराती महिलाये अपने बिल्डिंग की छत पर गयी और सारे सामानों की मदद से उन्होंने पापड़ के चार पैकेट बनाये | अब इन्होने इन पापड़ो को एक जाने माने व्यापारी भुलेश्वर को बेचना शूरू कर दिया | शुरुवात से इन महिलाओं ने प्रण किया था कि वो अपने इस व्यवसाय के लिए किसी से चंदा नही मांगेगी ,चाहे हमारा व्यवसाय घाटे में ही क्यों ना चला जाये |
अब छगनलाल पारेख उनके इस काम में उनका मार्गदर्शक बने गये | शुरुवात में इन महिलाओं ने दो प्रकार के पापड़ बनाये , जिसमे से एक क्वालिटी को वो सस्ते दामो पर बेचते थे | छगनबापा ने उन महिलाओं को स्टैण्डर्ड पापड़ बनाने के सुझाव दिया और क्वालिटी से समझौता ना करने को कहा | छगनबापा व्यापार में माहिर तो थे ही साथ ही साथ वो इन महिलाओं का लेखा जोखा भी सम्भालते थे | अब लिज्जत धीरे धीरे कोआपरेटिव सिस्टम बन गया | इसमें शुरुवात में छोटी लडकिया भी काम कर सकती थी लेकिन बाद में इसमें जुड़ने की न्यूनतम आय 18 वर्ष कर दी गयी |
3 महीनों के अंदर पापड़ बनाने वाली औरतो की संख्या 25 हो चुकी थी | अब कुछ महिलाये अपने साथ पापड़ बनाने के कुछ जरुरी सामान जसी बर्तन ,स्टोव आदि साथ लाती थी जिससे काफी आर्थिक मदद होती थी | पहले साल में इसकी वार्षिक सेल 6196 रूपये थी | टूटे हुए पापड़ो को ये सभी अपने पडौसियो में मुफ्त में बाँट दिया करते थे | शुरुवात के एक साल में तो महिलाओं को बारिश की मौसम के चार महीनों में अपने इस काम को ठप्प करना पड़ता था क्योंकि बारिश के मौसम में पापड़ सूखते नही थे | अगले साल इन्होने इसका भी इलाज ढूढ निकाला और उन्होंने एक खटिया और स्टोव खरीद लिया | अब इन पापड़ो को खटिया पर सुखाया जाता था इअर इसके नीचे स्टोव से आग जलाई जाती थी जिससे बारिश के मौसम में भी उनका काम ठप्प नही हुआ |
इस ग्रुप ने माउथ पब्लिसिटी और और अखबारों में उनके आर्टिकल के जरिये खूब नाम कमाया | इस पब्लिसिटी ने उनको काफी फायदा हुआ और कई औरते इस उद्यम के साथ जुडती गयी | दुसरे साल में इस ग्रुप में 100 से 150 महिलाये जुड़ गयी थी जो तीसरे साल में 300 के पार पहुच चुकी थी |अब उनका कारोबार इतना फ़ैल गया था कि इसकी स्थापना करने वाली सातो महिलाओं की छत कम पड़ गयी थी इसलिए उन्होंने अपने सदस्यों को घर पर ले जाकर पापड़ बनाने की सलाह दी | पापड़ बनने के बाद उन्हें वापस लाकर तोला जाता था और फिर पैक कर दिया जाता था |
1962 में ग्रुप ने अपने पापड़ का नामकरण किया और “लिज्जत” Lijjat Papad नाम रखा . एक गुजराती शब्द है जिसक अर्थ स्वादिष्ट होता है | इसके नामकरण के लिए एक कांटेस्ट रखा गया था और लिज्जत नाम देने वाली धीरजबेन रुपारेल इस कांटेस्ट में विजयी हुयी जिसके लिए उन्हें 5 रूपये का पुरुस्कार मिला | इस ऑर्गेनाइजेशन का नाम “श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़” रखा | 1962-63 में इस ग्रुप की वार्षिक आय 1 लाख 82 हजार पहुच गयी | जुलाई 1966 को लिज्जत को Societies Registration Act 1860 के तहत रजिस्टर किया गया | इसी साल Khadi Development and Village Industries Commission के अध्यक्ष देवधर में खुद लिज्जत का इंस्पेक्शन किया और 8 लाख की पूंजी का निवेश किया |
अब Lijjat Papad पापड़ की अपार सफलता के बाद लिज्जत ने खाखरा , मसाला ,वादी और बेकरी प्रोडक्ट भी शूरू कर दिए | 70 के दशक में लिज्जत ने आटा चक्की , प्रिंटिंग डिवीज़न और पैकिंग डिसिशन की मशीने भी लगा दी | इस ग्रुप में माचिस और अगरबती बनाने का काम भी शुरू किया था लेकिन सफल नही हुआ | 80 के दशक में लिज्जत ने मेलो और प्रदर्शनियो में भाग लेना शुरू कर दिया जिससे लोगो के बीच लिज्जत नाम का काफी प्रसार हुआ | इसके बाद अखबारों , टीवी और रेडियो के जरिये भी लिज्जत का काफी प्रसार किया गया | 90 के दशक में लिज्जत ने अपना व्यापार विदेशो में फैलाना शुरू कर दिया | 2002 में लिज्जत का टर्न ओवर 10 करोड़ तक पहुच गया | आज इस ग्रुप के पुरे देश में 62 शाखाओ में 42 हजार लोग काम करते है | 15 मार्च 2009 को लिज्जत ने 50वी वर्षगाँठ मनाई |
Lijjat Papad लिज्जत ग्रुप की प्रत्येक सदस्य को “बहन” सम्बोधित किया जाता है और वह “श्री महिला उद्योग लिज्जत पापड़ की सह-स्वामित्वधारी मानी जाती है | लिज्जत नाम चुनाव स्वाद ,गुणवत्ता और औरतो द्वारा स्वंतंत्र आजीविका कमाने की प्रतिष्ठा की अच्छाई को ध्यान में रखकर किया गया था | वर्षो से दो स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता छगन पारेख और पुरुषोतम दत्तानी द्वारा उद्मीय महिलाओं का संरक्ष्ण किया जाता है क्योंकि उन्होंने ही 80 रूपये की पूंजी से प्रारम्भिक बीज पूंजी की व्यवस्था की थी | Lijjat Papad लिज्जत आज इतना बड़ा ब्रांड है जिसको अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार मिले है |
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