Kargil War Story in Hindi
Kargil कारगिल जम्मू कश्मीर में स्तिथ एक जिला मुख्यालय है जो सुरु और शिंगो नदियों के संगम पर तथा जोजिला दर्रे के उत्तर पश्चिम में स्तिथ है | श्रीनगर से लेह तक राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 1ए यहा से होकर गुजरता है | कारगिल में 121 (स्वतंत्र ) Infantry Brigade का मुख्यालय है | Kargil कारगिल सेक्टर नियन्त्रण रेखा पर पश्चिम में काओबल गली से लेकर पूर्व में छोरबाट ला तक 168 किमी लम्बे क्षेत्र में फैला हुआ है | पुरी नियन्त्रण रेखा 4-5 हजार मीटर उंचाई और सामान्यतया जल विभाजक पर स्थित है |
Brigade की एक Infantry Battalion को द्रास में तथा दो बटालियनो और एक सीमा सुरक्षा बल की बटालियन को कारगिल में तैनात किया गया था | एक अन्य Infantry Battalion को बटालिक क्षेत्र में सिन्धु के दोनों ओर तैनात किया गया था | लेह से स्कर्दू के लिए बने पुराने मार्ग पर स्तिथ छोरबट ला की रक्षा की जिम्मेदारी लद्दाख स्काउट्स को दी गयी थी | कुल 168 किमी लम्बे क्षेत्र में से लगभग 80 किमी में कोई तैनाती नही की गयी थी |
इस 80 किमी क्षेत्र में गर्मियों के दिनों में तो नियमित रूप से गश्त लगाई जाती थी लेकिन कडाके की सर्दी में गश्त में कुछ अनियमितताए आ गयी थी | सर्दियों में सामान्यत: कई चौकियो को खाली कर दिया जाता था लेकिन खतरे की सम्भावना को देखते हुए केवल एक चौकी बजरंग – जो काकसर सेक्टर में स्तिथ थी – को खाली किया गया और वह भी 2 मार्च 1999 को |
घाटी में विद्रोह विरोधी अभियानों के सन्दर्भ में Kargil कारगिल को ज्यादा सक्रिय क्षेत्र के रूप में नही माना जाता था | अन्य क्षेत्रो की तुलना में यहा आतंकवादियों की गतिविधिया बहुत कम देखने को मिलती थी | Kargil कारगिल सेक्टर 3 Infantry Division के नियन्त्रण क्षेत्र के अंतर्गत आता था | Kargil कारगिल सेक्टर की रक्षा के अतिरिक्त उसे सियाचिन क्षेत्र तथा लद्दाख में भारत और चीन के बीच वास्तविक नियन्त्रण रेखा की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी | 3 Infantry Division का मुख्यालय लेह में बनाया गया था | इस प्रकार डिवीज़नल हेडक्वार्टर को एक बड़े क्षेत्र की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी |
Kargil कारगिल सेक्टर में सन 1997 से ही दोनों ओर से गोलीबारी बढने लगी थी जो 1998 तक काफी बढ़ गयी थी | वैसे इसके बावजूद कारगिल सेक्टर को जम्मू कश्मीर के अन्य क्षेत्रो की अपेक्षा अधिक शांत माना जा रहा था | बाद में मुश्कोह घाटी के रास्ते घुसपैठ के प्रयासों की जानकारी मिली तो द्रास में एक अतिरिक्त ब्रिगेड हेड क्वार्टर और दो अतिरिक्त बटालियने स्थापित करने की योजनाये बनाई गयी | इस प्रकार द्रास को एक अलग ब्रिगेड सेक्टर के रूप में बनाने की योजना तैयार की गयी थी |
इस क्षेत्र में पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ का पहला संकेत उस समय मिला , जब 3 मई 1999 को कुछ गडरियो ने बटालिक सेक्टर में तैनात 3 पंजाब को सुचना दी कि उन्होंने बंजु क्षेत्र में बंकर खोद रहे कुछ सशस्त्र लोगो के दलों को देखा जो पठानी वेशभूषा में थे | 3 पंजाब ने क्षेत्र में गश्त बढ़ा दी और 7 मई 1999 तक घुसपैठ की पृष्टि हो गयी | 3 Infantry Division के मुख्यालय ने तत्काल कारवाई शुरू कर दी | 10 मई 1999 तक बटालिक सेक्टर में दो बटालियनो को तैनात कर दिया गया | इस क्षेत्र में अभियान की कमान सम्भालने के लिए 70 Infantry Brigade का मुख्यालय बटालिक में स्थापित कर दिया गया |
बटालिक सेक्टर में घुसपैठ का पता लगने के बाद अन्य क्षेत्रो में भी सतर्कता बढ़ा दी गयी | अनुमान के अनुसार 200-250 घुसपैठिये बटालिक सेक्टर में , 80100 घुसपैठिये काकसर सेक्टर में , 60-80 घुसपैठिये द्रास सेक्टर में और 202250 घुसपैठिये मुश्कोह सेक्टर में सक्रिय थे | इस बात की भी पृष्टि हो गयी थी कि दुश्मन Turtok Sector में नियन्त्रण रेखा और उसके दुसरी ओर स्थापित हो चुके थे | 18-31 मई के बीच छोरबाट ला सेक्टर में कुछ ओर सैनिक टुकडिया तैनात कर दी गयी और इस क्षेत्र में दुश्मन के घुसपैठ के प्रयासों को पुरी तरह नाकाम कर दिया गया |
Kargil कारगिल में जो कुछ देखने को मिल रहा था उससे यह स्पस्ट हो गया था कि वह अपने नियमित बलों का प्रयोग करके नियन्त्रण रेखा को बदलने की पाकिस्तान की सोची समझी योजना का हिस्सा है | यह भी स्पष्ट था कि जिन चोटियों पर दुश्मन ने कब्जा कर लिया था उन्हें खाली कराने के लिए अच्छे संसाधन और अच्छी तैयारी की आवश्यकता होगी | शुरू में दुश्मन को भगाने के जो प्रयास किये गये , उनमे बड़ी संख्या में सैनिक हताहत हुए |
26 मई को भारतीय वायुसेना को भी इस अभियान में शामिल कर लिया गया | शुरू में वायुसेना को भी क्षति उठानी पड़ी लेकिन बाद में उसने अपनी रणनीति में सुधार कर लिया था | उसने आगे के अभियान के लिए थलसेना को अत्यंत महत्वपूर्ण सहायता पहुचाई | कई विशेष अभियानों ,सीमित हमलो और गश्त के माध्यम से दुश्मन की शक्ति और उसकी तैनाती के बारे में महत्वपूर्ण सुचनाये प्राप्त हुयी | पता चला कि बटालिक और Kargil कारगिल द्रास मुश्कोह सेक्टरो में दुश्मन की एक एक ब्रिगेड तैनात थी |
प्रत्येक ब्रिगेड में शुरू में पाकिस्तान की Northern Line Infantry की दो बटालियने ,स्पेशल सर्विसेज ग्रुप की दो कम्पनिया और Frontier Core के लगभग 600-700 सैनिक थे | इनके अतिरिक्त प्रत्येक ब्रिगेड में लगभग 15 Artillery इकाईया तथा नियमित इंजिनियर ,सिग्नल और प्रशाशनिक इकाईया शामिल थी |
आरम्भ में दुश्मन से उन क्षेत्रो को खाली कराने की योजना थी , जहा से वे राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 1 ए पर अपना अधिकार जमाए हुए थे और उसके बाद अन्य क्षेत्रो से दुश्मन को खदेड़ने की योजना थी | राजनितिक और कूटनीतिक पहलुओ को ध्यान में रखते हुए नियन्त्रण रेखा के उस पार जाने का निर्णय लिया गया था | प्राथमिकता के आधार पर सबसे पहले द्रास सेक्टर को ,फिर मुश्कोह घाटी को , उसके बाद बटालिक सेक्टर को और फिर काकसर सेक्टर को सुरक्षित करने की योजना बनाई गयी थी |
8 Mountain Division के Headquarter को कारगिल और द्रास मुश्कोह सेक्टरो से पाकिस्तानियों को भगाने की जिम्मेदारी सौपी गयी थी | उसके नियन्त्रण में 56 , 79 और 192 Mountain Brigade थी | 3 Infantry Division बटालिक और Turtok सेक्टरो के अभियान की जिम्मेदारी सम्भाले हुए थी | 70 Mountain Brigade को बटालिक सेक्टर के अभियान की कमान सम्भालने के लिए पहले ही रवाना कर दिया गया था |
द्रास मुश्कोह सेक्टर में सबसे पहले तोलोलिंग सेक्टर पर कब्जा करने की योजना थी | द्रास के मूल रक्षक सेना 18 ग़्रनेदिएर्स तोलोलिंग पर पुन: कब्जा करने के लिए तीन असफल प्रयास पहले ही कर चुकी थी | 2 जून को 18 ग़्रनेदिएर्स ने तोलोलिंग पर कब्जा करने के लिए अपना चौथा प्रयास किया | भारी गोलीबारी का सामना करती हुयी वह बटालियन 10 जून तक ऐसे स्थान पर पहुच गयी , जो पाकिस्तानी पोजीशन से लगभग 30 मीटर नीचे था |
2 राजपुताना राईफल्स ने 12 जून को तोलो लिंग पर कब्जा करने के लिए उस स्थान को एक मजबूत आधार के रूप में प्रयोग किया | 12 जून को रात 11 बजे उसने हमला शूरू किया और कुछ देर की घमासान लड़ाई के बाद Point 4590 पर कब्जा कर लिया | उसके बाद 18 ग़्रनेदिएर्स ने 12 राजपूतना राईफल्स के साथ आगे बढकर पॉइंट 4590 से 3 किमी आगे पोजीशन पर कब्जा कर लिया | बाद में Point 5140 पर हमला करने के इसी पोजीशन Point 4590 का प्रयोग किया गया |
Point 5140 पर कब्जा करने के लिए 13 जम्मू कश्मीर राईफल्स ने दो बार प्रयास किये थे लेकिन उसे ज्यादा सफलता नही मिली थी | 19 जून को तीन बटालियनो 18 गढवाल राइफल्स , 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स और 1 नगा ने एक साथ मिलकर एक बहुकोणीय हमला किया | अंतत: 20 जून को रात 3:35 बजे तक पोजीशन पर कब्जा कर लिया गया |
कारगिल युद्ध की इस कहानी के अगले अंश में हम आपको कैप्टेन विक्रम बत्रा के शौर्य की कहानी और कारगिल युद्ध की गौरवशाली युद्ध की कहानी सुनायेंगे तब तक आप कारगिल के शहीदों को अपने विचारों के जरिये श्रुधान्जली देना ना भूले |
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