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वी.शान्ताराम , जिनके फिल्मो ने दिए थे सामाजिक संदेश V. Shantaram Biography in Hindi

V. Shantaram Biography in Hindi

वी.शान्ताराम , जिनके फिल्मो ने दिए थे सामाजिक संदेश V. Shantaram Biography in Hindi
वी.शान्ताराम , जिनके फिल्मो ने दिए थे सामाजिक संदेश V. Shantaram Biography in Hindi

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में 18 नवम्बर 1901 को एक जैन परिवार में जन्मे राजाराम वाकुंदरे शांताराम Shantaram ने बाबुराम पेंटर की महाराष्ट्र फिल्म कम्पनी में छोटे मोटे काम से शुरुवात की थी | उन्होंने नाम मात्र की शिक्षा पायी थी | उन्होंने 12 साल की उम्र में रेलवे वर्कशॉप में अप्रेंटिस के रूप में काम किया था | कुछ समय बाद वह एक नाटक मंडली में शामिल हो गये |
Shantaram शांताराम ने फिल्मो की बारिकिया बाबुराव पेंटर से सीखी | बाबुराव ने उन्हें “सवकारी पाश (1925 )” में किसान की भूमिका दी थी | कुछ ही वर्षो में उन्होंने फिल्म निर्माण की तमाम बारिकिया सीख ली और निर्देशन की कमान सम्भाल ली | बतौर निर्देशक उनकी पहली फिल्म “नेताजी पालकर ” थी | इसके बाद उन्होंने वी.जी.दामले , के.आई.धाईबर , एम्.फतेहलाल और एस.बी.कुलकर्णी के साथ मिलकर “प्रभात फिल्म ” कम्पनी का गठन किया |
अपने गुरु बाबुराव की ही तरह उन्होंने शुरुवात में पौराणिक तथा एतेहासिक विषयों पर फिल्मे बनाई लेकिन बाद में जर्मनी की यात्रा से उन्हें एक फ़िल्मकार के तौर पर नई दृष्टि मिली और उन्होंने 1934 में “अमृत मंथन ” फिल्म का निर्माण किया | हिंदी सिनेमा के शुरवाती दौर में प्रमुखता से उभरे शांताराम उन हस्तियों में से थे जिनके लिए फिल्मे मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश  देने का माध्यम थी | अपने लम्बे फ़िल्मी सफर में उन्होंने प्रयोगधर्मिता को भी बढ़ावा दिया |
“डा.कोटनिस की अमर कहानी ” “झनक झनक पायल बाजे ” “दो आँखे बारह हाथ ” “नवरंग ” “दुनिया ना माने ” जैसी अपने समय की बेहद चर्चित फिल्मो में उन्होंने फिल्म निर्माण से जुड़े कई प्रयोग किये | उन्होंने फिल्मो के मनोरंजन पक्ष से कोई समझौता किए बिना नये प्रयोग किये जिनके कारण उनकी फिल्मे ना केवल आम दर्शको बल्कि समीक्षकों को भी काफी प्रिय लगी | Shantaram शांताराम ने हिंदी फिल्मो में मूविंग शॉट का प्रयोग सबसे पहले किया था| उन्होंने बच्चो के लिए “रानी साहिबा ” फिल्म बनाई | “चन्द्रसेना” फिल्म में उन्होंने पहली बार ट्रोली का प्रयोग किया |
उन्होंने 1933 में पहली रंगीन फिल्म “सैरेन्ध्री ” बनाई | भारत में एनीमेशन का इस्तेमाल करने वाले भी वह पहले फ़िल्मकार थे | वर्ष 1935 में प्रदर्शित फिल्म जम्बू काका ” में उन्होंने एनीमेशन का इस्तेमाल किया था | उनकी फिल्म “डा.कोटनिस की अमर कहानी ” विदेश में दिखाई जाने वाली पहली भारतीय फिल्म थी | Shantaram शांताराम ने प्रभात फिल्म के लिए तीन बेहद शानदार फिल्मे बनाई | बाद में उन्होंने प्रभात फिल्म को छोडकर राजकमल कला मन्दिर का निर्माण किया | इसके लिए उन्होंने “शकुंतला ” बनाई | इसका 1947 में कनाडा की राष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रदर्शन किया गया |
Shantaram शांताराम की सर्वाधिक चर्चित फिल्म “दो आँखे बारह हाथ ” है जो 1957 में प्रदर्शित हुयी थी | यह एक साहसिक जेलर की कहानी है जो छ: कैदियों को सुधरता है | “झनक झनक पायल बाजे ” और “नवरंग” उनकी बेहद कामयाब फिल्मे रही | दर्शको ने इन फिल्मो के गीत और नृत्य को काफी सराहा और फिल्मो को कई कई बार देखा | शांताराम की आखिरी महत्वपूर्ण फिल्म थी “पिंजरा” |यह फिल्म जोसेफ स्टर्नबर्ग की 1930 में प्रदर्शित हुयी क्लासिक फिल्म “द ब्लू एंजेल ” पर आधारित थी | वैसे उनकी आखिरी फिल्म “झांझर ” थी | यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नही हो सकी और सात दशको तक चले उनके शानदार  फ़िल्मी करियर का अंत हो गया |
Shantaram शांताराम एक चलते फिरते संस्थान थे | फिल्म निर्माण की उनकी तकनीक और उनके जैसी दृष्टि आज के निर्देशकों में कम ही नजर आती है | उन्हें वर्ष 1957 में झनक झनक पायल बाजे के लिए सर्वश्रेष्ट निर्देशक का फिल्मफेर पुरुस्कार दिया गया था | उनकी कालजयी फिल्म “दो आँखे बारह हाथ ” के लिए सर्वश्रेष्ट फिल्म का राष्ट्रपति पुरुस्कार प्रदान किया गया | इस फिल्म ने बर्लिन फिल्म समारोह और गोल्डन ग्लोब अवार्ड्स में भी झंडे गाड़े | अन्ना साहब के नाम से मशहूर शांताराम को वर्ष 1985 में भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े पुरुस्कार दादा साहब फाल्के पुरुस्कार से सम्मानित किया गया | फिल्म जगत में अमूल्य योगदान करने वाले Shantaram शांताराम का 30 अक्टूबर 1990 को मुम्बई में निधन हो गया |

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