History of Rakhi Raksha Bandhan in Hindi
बहना ने भाई की कलाई से प्यार बाँधा है , प्यार के दो तार से संसार बाँधा है |
भाई की कलाई पर Rakhi राखी बाँधने का सिलसिला बहुत पुराना है | Raksha Bandhan रक्षाबंधन का इतिहास सिन्धु घाटी सभ्यता से जुड़ा हुआ है | वह भी तब आर्य समाज में सभ्यता की रचना की शुरुवात मात्र हुयी थी | Raksha Bandhan रक्षाबंधन पर्व पर जहा बहनों को भाइयो की कलाई में रक्षा का धागा बाँधने का बेसब्री से इंतजार रहता है वही दूर दराज बसे भाइयो को भी इसी बात का इंतजार रहता है कि उनकी बहना उन्हें राखी Rakhiभेजे |
उन भाइयो को निराश होने की जरूरत नही है जिनकी अपनी सगी बहन नही है क्योंकि मुहबोली बहनों से Rakhi राखी बाँधने की परम्परा काफी पुरानी है | असल में Raksha Bandhan रक्षा बंधन की परम्परा उन बहनों ने डाली थी जो सगी नही थी | भले ही उन बहनों ने अपने संरक्षण के लिए ही इस पर्व की शुरुवात क्यों ना की हो लेकिन उसकी बदौलत आज भी इस त्यौहार की मान्यता बरकरार है | आइये आज हम आपको रक्षाबंधन से जुड़े पौराणिक रिश्ते की कहानिया आपको बताते है |
01 देवराज इंद्र और शाची की कथा
एक समय देवताओ के राजा इंद्र अपने शत्रु वृतासुर से पराजित हो गये थे | तब वह देवो के गुरु बृहस्पती के पास गये | तब देवगुरु बृहस्पती की सलाह से विजय प्रप्ति के लिए इंद्र की पत्नी देवी सची ने इंद्र को राखी Rakhi बांधी और तब इन्द्र व्रज के निर्माण के लिए ऋषि दधिची की अस्थिया लेने गये |इंद्र ने उनसे उनकी अस्थिया प्राप्त करके वज्र नामक शस्त्र बनाया | फिर वृतासुर पर आक्रमण करके उसे हराया और अपना स्वर्ग का राज्य पुन: प्राप्त किया |
02 संतोषी माता और भगवान गणेश
माता संतोषी के अवतार की कथा में यह कहा जाता है कि एक समय की बात है राखी के त्यौहार पर भगवान गणेश की बहन ने गणेश को राखी बांधी परन्तु भगवान गणेश के दोनों पुत्रो शुभ और लाभ को कोई राखी बाँधने वाला नही था क्योंकि उनकी कोई बहन नही था | इस बात पत शुभ और लाभ बहुत निराश हुए | तब दोनों ने भगवान गणेश और माता रिद्धि-सिद्धि से एक बहन के लिए बहुत प्रार्थना की | भगवान गणेश ने दोनों पुत्रो शुभ और लाभ की प्रार्थना स्वीकार की | तब माता रिद्धि-सिद्धि द्वारा दैवीय ज्योति से संतोषी माता का अवतार हुआ | तब संतोषी अमता ने शुभ और लाभ को राखी Rakhi बांधी |
03 कृष्ण और द्रौपदी Krishna and Draupadi
कहा जाता है कि शिशुपाल का वध करते समय कृष्ण के हाथ में लगी चोट पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाडकर उन्हें पट्टी बांधी थी | यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था | कृष्ण ने इस उपहार का बदला द्रौपदी की चीरहरण के समय साडी को बढ़ाकर चुकाया था | रक्षा के वचन के रूप में ही इस त्यौहार को मनाया जाता है |
04 देवी लक्ष्मी और राजा बलि Goddess Laxmi and King Bali
एक पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि दैत्यों के राजा बलि भगवान विष्णु के अनन्य भक्त था | भगवान विष्णु राजा बलि से इतने प्रसन्न थे कि कि एक बार वह बैकुंठ धाम छोडकर राजा बलि की साम्राज्य की रक्षा के कार्य में लग गये | माता लक्ष्मी बैकुंठ धाम में अकेली रहे गयी | जब भगवान विष्णु बहुत समय तक वापस बैकुंठ धाम को नही लौटे तब माता लक्ष्मी ने साधारण स्त्री का रूप धारण किया और राजा बलि के यहाँ पहुच गये | वहा माता लक्ष्मी ने अपने आपको निराश्रित महिला बताया जो अपने पति से बिछुड़ गयी है और पति के मिलने तक राजा की शरण में रहना चाहती है | इस प्रकार लक्ष्मी ने बलि के यहाँ आश्रय पा लिया |
तत्पश्चात श्रावण मास की पूर्णिमा को माता लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बाँधा और राजा बलि से रक्षा का वचन लिया |तब बलि ने माता लक्ष्मी से सारा सच जानना चाहा तो माता लक्ष्मी ने सब बात बलि को सच सच बता दी |राजा बलि ने माता लक्ष्मी की सारी बात सुनकर उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट किया और भगवान विष्णु से माता लक्ष्मी के साथ बैकुंठ धाम लौटने की प्रार्थना की | ऐसा कहा जाता है कि तब से ही रक्षाबंधन के दिन Rakhi राखी बंधवाने के लिए बहन को भाई द्वारा अपने घर आमत्रित करने की प्रथा चल पड़ी है |
05 रानी कर्णावती और हुमायु Rani Karmawati and Humanyu
Rakhi राखी से संबधित राजस्थान अंचल की यह बहुत प्रसिद्ध कहानी है | जब बहादुर शाह जफर ने राजस्थान के चित्तोड़ पर आक्रमण किया तो विधवा रानी कर्णावती ने देखा कि वह स्वयं को तथा अपने राज्य को बहादुर शाह से बचा पाने में सक्षम नही है |तब कर्णावती ने हुमायु को राखी भेजकर अपनी रक्षा की प्रार्थना की | हुमांयू ने उसकी राखी को पूरा सम्मान दिया और पप्रण किया कि वह राखी की लाज रखेगा |अपना प्रण निभाने के लिए हुमायु एक विशाल सेना लेकर तुरंत चित्तोड़ के लिए निकल पड़ा परन्तु जब वह चित्तोड़ पहुचा तब तक बहुत देर हो चुकी थी |
बहादुर शाह चित्तोड़ पर कब्जा कर चूका था | राजस्थान के इतिहास में 8 मार्च 1535 को वह दिन हमेशा घाव के रूप में रिसता है जब रानी कर्णावती ने बहुत सी महिलाओं सहित जौहर किया | तब राखी की लाज रखते हुए हुमायु ने चित्तोड़ का राज कर्णावती के पुत्र विक्रमजीत सिंह को सौंप दिया |रानी कर्णावती और हुमायु की इस राखी की पवित्रता को राजस्थान की मिटटी कभी नही भुला सकेगी | रानी कर्णावती और हुमायु के इस पवित्र रिश्ते और राखी के महत्व को राजस्थान के अनेक कथाकारों और कवियों ने अपनी वाणी देकर अमर कर दिया |
06 रोक्साना और पोरस Roxana and King Porus
कहा जाता है कि सिकन्दर महान की पत्नी रोक्साना ने पति के सबसे बड़े शत्रु पोरस को राखी बांधी थी और उपहार में वचन लिया था कि युद्ध में वह उसके पति को ना मारे | पोरस ने युद्ध में सिकन्दर का मुकाबला किया मगर हाथ में बंधी राखी और बहन को दिए वचन के सम्मान में उसने सिकन्दर को जीवन दान दिया | यह देखकर सिकन्दर को भी उसके सम्मान में झुकना पड़ा था |
तो मित्रो इस प्रकार अज आपने Rakhi राखी के पौराणिक महत्व के बारे में भी जानना जिसके बारे में जानना बहुत जरुरी था | मित्रो आपको हमारा ये लेख पसंद आया तो राखी Rakhi के शुभ अवसर पर अपने विचार प्रकट करना ना भूले |
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