
1965 जंग में कश्मीर | 1965 War in Kashmir Region
मित्रो 1965 भारत -पाक जंग के पहले भाग में हमने देखा कि किस तरह कच्छ में पाकिस्तान ने अपने नापाक इरादे दिखा दिए थे जिसे निपटने के भारतीय सेना तैयार हो गयी थी | पाकिस्तान की योजना अब कश्मीर में बड़ी संख्या में अपने फौजे युद्ध विराम रेखा के दुसरी ओर भेजकर कश्मीरियों को भारत के खिलाफ विद्रोह के लिए भडकाने की थी | अपने इसी उद्देश्य को धयान में रखकर पाकिस्तान ने 30 हजार सैनिको की एक सेना -जिब्राल्टर फोर्क तैयार कर ली थी | इसमें शामिल अधिकांश सैनिक तथाकथित आजाद कश्मीर की फ़ौज से थे जो वास्तव में पाकिस्तानी सेना का अभिन्न हिस्सा थी | इन फौजों के साथ कुछ रजाकारो और मुजाहिदीनो को भी शामिल किया गया था | पुरी फ़ौज को दस टुकडियो में बांटा गया था जिसकी संयुक्त कमान मेजर जनरल ए.एच,मलिक के हाथो में थी |
2 से 5 अगस्त 1965 के बीच यह फ़ौज उत्तर में कारगिल तथा जम्मू सेक्टर के कालीधर क्षेत्र तक युद्ध विराम रेखा के दुसरी ओर घुस आयी | पूंछ उअर जम्मू सेक्टर में युद्ध विराम रेखा के दुसरी ओर से टोपे तैनात की गयी थी | पाकिस्तानी हमले के बारे में न तो केन्द्रीय गुप्तचर एजेंसीयो के पास कोई संकेत था और ना ही सेना की अपनी गुप्तचर एजेंसी के पास | इस कारण शुरू से दुश्मन को ज्यादा कड़े प्रतिरोध का सामना नही करना पड़ा |दुश्मन ने पूंछ के थाना मंडी पर कब्जा कर लिया और जम्मू सेक्टर के कालीधर पर्वतश्रेणी के कुछ हिस्सों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली | वे श्रीनगर और गुलमर्ग के करीब तक पहुच चुके थे परन्तु पाकिस्तान का मुख्य उद्देश्य आम विद्रोह भडकाना सफल नही हो सका | स्थानीय लोगो ने भारतीय सैनिको के साथ ही सहयोग ही किया |
आगे ओर घुसपैठ रोकने और सीमा के इस पार आये घुसपैठियों को अलग थलग करने के उद्देश्य से उनके अड्डो और घुसपैठ मार्गो पर कब्जा करने के लिए अभियान छेड़ने का निर्णय लिया गया | कारगिल क्षेत्र में जहा जहा पाकिस्तानी सैनिको के द्वारा श्रीनगर लेह राजमार्ग को नुकसान पहुचाने की आशंका थी उन उन स्थानों पर कब्जा कर लिया गया | तिथवाल सेक्टर के पीर साहब पर कब्जा करके भारतीय जवान किशनगंगा की ओर बढ़े और वहा से घुसपैठ के सभी रास्ते बंद कर दिये| हाजी पीर दर्रे को सुरक्षित करने के लिए बड़ा अभियान शूरू किया गया क्योंकि यहा से कश्मीर घाटी में घुसपैठ के लिए मुख्य मार्ग था |
हाजी पीर दर्रे पर कब्जा करने का उत्तरदायित्व ब्रिगेडियर जोरावर चंद बक्शी के नेतृत्व में 68 ब्रिगेड को सौंपा गया | 68 ब्रिगेड की कमान में 1 पैरा , 4 राजपूत , 19 पंजाब तथा 6 जम्मू कश्मीर राइफल्स के साथ 164 फील्ड रेजीमेंड थी | दोतरफा हमले की योजना बनाई गयी थी जिसमे 1 पर को सेंक पर तथा 19 पंजाब को बेडोरी पर कब्जा करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था | बेडोरी पर कब्जा होते ही 4 राजपूत को हाजी पीर दर्रे को सुरक्षित करना था | 25 अगस्त की रात को हमला शूरू हुआ लेकिन न सेंक और न ही बेडोरी पर कब्जा किया जा सका |
27 अगस्त को दुसरी बार हमला किया अज्ञ | इसमें 1 पैरा तो सेंक पर कब्जा करने में सफल हो गयी लेकिन बेडोरी अब भी दुश्मन के हाथ में ही था | अब 1 पैरा ने दर्रे पर कब्जा करने की अनुमति माँगी | अनुमति मिलते ही मेजर रंजीत सिंह दयाल के नेतृत्व में एक कम्पनी को यह कार्य सौंपा गया | 27 अगस्त की अपराह्न 2 बजे कारवाई शूरू हुयी और पुरी रात आगे बढ़ते हुए कम्पनी अगले दिन प्रात: 6 बजे दर्रे के ठीक नीचे पहुच गयी | एक पलटन को दुश्मन को उलझाकर रखने के लिए छोडकर मेजर दयाल शेष फ़ौज को लेकर आगे बढ़े | उन्होंने दर्रे के पश्चिमी घेरे पर कब्जा कर लिया | अचानक हुए हमले से दुश्मन स्तब्ध रह गये | वे डरकर अपनी पोजीशन से हट गये |दर्रे पर भारतीय सेना का कब्जा हो जाने से अभियान को आगे बढाने का मौका मिल गया और 12 सितम्बर तक हाजी पीर से होते हुए उडी -पूंछ मार्ग को खोल दिया गया |
हाजी पीर दर्रे के हाथ से निकल जाने और युद्ध विराम रेखा के अन्य स्थानों पर भारतीय सेना की सफलता से पाकिस्तानी बलों का उत्साह ढीला पड़ गया | कश्मीर घाटी पर कब्जा करनी की जगह उन्हें जम्मू कश्मीर के अपने अधिकार वाले हिस्सों के भी हाथ से निकल जाने का खतरा दिखाई देने लगा था |अपने सैनिको पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान ने अब अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के इस पार छम्ब और अखनूर से हमला किया | यह हमला पाकिस्तान की 12 इन्फेंट्री डिवीज़न के दो बख्तरबंद रेजीमेंटो के साथ किया था | अभियान को “ग्रैंड स्लैम” नाम दिया था जो 1 सितम्बर 1965 को छम्ब पर डटी 191 इन्फेंट्री ब्रिगेड पर तोप के द्वारा बमबारी के साथ शूरू किया गया था |
इस बार पाकिस्तानी बलों को आश्चर्यजनक सफलता मिली | शाम तक पाकिस्तानी फौजे मनावर तवी नदी तक पहुचने वाली थी | 191 ब्रिगेड रात को पीछे हट गयी | पाकिस्तान की ओर से कमांडिंग हेडक्वार्टर में परिवर्तन किआ जा रहा था जिससे 24 घंटे तक उसकी ओर से कोई हमला नही हुआ | 4 सितम्बर को पाकिस्तान ने जौदिया पर हमला कर दिया और रात में 41 माउंटेन ब्रिगेड पीछे हट गयी वह अखनूर की रक्षा के लिए 191 ब्रिगेड के साथ मिल गयी | 6 सितम्बर को पाकिस्तान की ओर से 28 ब्रिगेड पर हमले किये गये ,जिन्हें पूर्णतविफल क|र दिया गया | उसी दिन पंजाब में अंतर्राष्ट्रीय सीमा के उस पार किये गये भारतीय हमले में पाकिस्तानियों को छम्ब सेक्टर में ओर आगे हमला रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा किन्तु वे अपनी पोजीशन पर डटे रहे , जिन पर उन्होंने पहले कब्जा कर लिया था | 1 सितम्बर को इन अभियानों में पाकिस्तानी बख्तरबन्द सेना पर हवाई हमले करने के पहली बार भारतीय वायुसेना को भी शामिल किया गया था | लड़ाई का क्षेत्र अब जम्मू कश्मीर से पंजाब हो गया था |
1965 जंग में पंजाब | 1965 War in Punjab Region
1 सितम्बर को पाकिस्तानी सेना ने छम्ब पर हमला किया था | उस समय जनरल चौधरी कश्मीर में थे | उसके बाद वह दिल्ली रवाना हो गये और दिल्ली से उन्होंने पूर्व निश्चित योजना के अनुसार पंजाब में हमले का आदेश जारी कर दिया | जैसा की पहले उल्लेख किया जा चूका है कि योजना के अनुसार 11 कोर को अमृतसर के सामने से पूर्व की ओर खेमकरण के सामने बढना था | 1 कोर को साम्बा से सियालकोट की ओर हमला करते हुए आगे बढना था | आइये पहले 11 कोर के अभियानों की चर्चा करते है |
11 कोर के नियन्त्रण में तीन दिविजने थी – 15 माउंटेन डिवीज़न जो अमृतसर में थी ; 7 माउंटेन डिवीज़न जो फिरोजपुर में थी और 4 माउंटेन डीविजन जो अम्बाला में थी | योजना के अनुसार तीन डिवीज़नो को 2-2 ब्रिगेडों को लेकर आगे बढना था | 15 इन्फंत्री डिवीज़न को ग्रांड ट्रंक रोड के दोनों ओर चलते हुए आगे बढना था | 7 डिवीज़न को खालरा-बरकी-लाहौर मार्ग पर चलते हुए आगे बढना था जबकि 4 डिवीज़न को खेमकरण से कसूर की ओर आगे बढना था | दुश्मन को स्तम्भित करने के लिए इन टुकडियो को 5-6 सितम्बर की रात में आगे बढ़ते हुए सुबह तक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करनी थी | सेना की यही शुरुवाती बढत पुरी तरह सफल रही |
15 डिवीज़न के मोर्चे पर 54 इन्फंत्री ब्रिगेड के साथ 3 जाट डिवीज़न ने Grand Trunk Road पर आगे बढना शुरू किया | बटालियन को आरम्भ में घमासान युद्ध के बाद अच्छी सफलता मिली लेकिन ब्रिगेड की शेष टुकडियो उससे काफी पीछे रह गयी | ब्रिगेड हेडक्वार्टर से सम्पर्क बनाये रखने के लिए रेडियो सेट नही थे इस कारण बटालियन का ब्रिगेड हेडक्वार्टर से सम्पर्क टूट गया |इसके बावजूद बटालियन 4 हॉर्स की एक टुकड़ी के साथ आगे बढी और इच्चोगिल नहर के पास पहुचकर उसने डोगराई पर कब्जा कर लिया | डिवीज़न हेडक्वार्टर से सम्पर्क टूट जाने और आर्टिलरी सहायता न मिलने के बाद बटालियन को पीछे हटना पड़ा |
सरसल लाहौर के लिए खतरे से सचेत होकर दुश्मन ने जोरदार प्रतिक्रिया दिखाते हुए सैन्य टुकडियो पर भारी गोलीबारी और हवाई हमले किये | इस कारण सैन्य टुकडियो का आगे बढना रुक गया | कई टुकडिया तो तितर बितर भी हो गयी थी | इससे कमांडरो का उत्साह कुछ ढीला पड़ गया था | कारण जो भी रहा हो , 15 डिवीज़न अपने उद्देश्य में सफल नही हो सकी | अब मेजर जनरल मोहिन्दर सिंह को जनरल ऑफिसर कमांडिंग बनाया गया और 54 ब्रिगेड की कमान ब्रिगेडियर निरंजन सिंह को सौंपी गयी |
पाकिस्तान की ओर से हमले की झूठी चेतावनिया मिलने से अमृतसर क्षेत्र में तेजी से सैन्य टुकडिया बढाई जाने लगी | 96 इन्फेंट्री ब्रिगेड , 50 पैरा ब्रिगेड , 41 माउंटेन ब्रिगेड और अंत में 2 बख्तर बंद ब्रिगेड अमृतसर पहुच गयी किन्तु अमृतसर पर पाकिस्तान की ओर से न कोई हमला हुआ और ना ही इन्फेंट्री डिवीज़न ने कीसी स्थान पर कब्जा कर पाई | 22 अक्टूबर को 3 जाट ने डोगराई पर पुन कब्जा कर लिया था | कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल डेसमंड हायडी के नेतृत्व में 3 जाट ने घमासान लड़ाई के बाद उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की |लड़ाई की भयावहता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इस लड़ाई में जाट डिवीज़न के 216 सैनिक हताहत हुए जिसमे 10 अधिकारी भी शामिल थे | इसके अतिरिक्त वहा लगभग 840 पाकिस्तानी सैनिको के शव पाए गये थे |
7 इन्फेंट्री डिवीज़न को खालरा लाहौर मार्ग पर आगे बढ़ते हुए अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा सफलता मिली | उसने 6 सितम्बर को प्रात: 5:30 बजे आगे बढना शूरू किया था और 10:30 बजे तक 6/8 गोरखा ने हुडियारा गाँव पर कब्जा कर लिया था तथा शाम 5 बजे तक गार्ड्स ने हुडियारा नाले पर बने पुल को ध्वस्त कर दिया और उसके बाद वो बरकी की ओर चले गये | 17 राजपूत डिवीज़न के बेड़ियान को सुरक्षित करने के लिए उस पर हमला किया गया था जो दुश्मन द्वारा रोक दिया गया | उसके बाद दुश्मन राजपूत डिवीज़न को आगे बढने से रोकने के लिए पुरे क्षेत्र में फ़ैल गये | हुडियारा नाले पर पुल के पुनर्निर्माण का कार्य 7 सितम्बर तक ही पूरा हो सकता था | अब बरकी की ओर बढना शुरू किया गया |
8-9 सितम्बर तक बरकी के निकट के गाँवों को सुरक्षित कर लिया गया | उसके बाद दुश्मन की व्यवस्था का पता लगाने के लिए गश्त शूरु कर दी गयी | 4 सिख बटालियन ने 10-11 सितम्बर की रात में बरकी पर हमला किया और कड़े संघर्ष के बाद बरकी गाँव को अपने कब्जे में सुरक्षित कर लिया | अब दुश्मन नहर पर बने पुल को ध्वस्त करते हुए नहर के उस पार चले गये | इस प्रकार 7 इन्फेंट्री डिवीज़न ने अपने अधिकाँश अभियानों में सफलता प्राप्त की ; हालांकि इसमें उसे निश्चित समय से कुछ ज्यादा समय अवश्य लगा |
11 कोर की तीसरी डिवीज़न 4 माउंटेन डिवीज़न थी | NEFA के अनुभवो के बाद उसमे काफी सुधार किया गया था और उसे पर्वतीय युद्ध के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया था किन्तु अब मैदानों में अभियान शुरू करने के लिए आदेश दिए गये | उसे बेड़ियाँ के दक्ष्णि में सतलज तक के क्षेत्र को सुरक्षित करने का कार्य सौंपा गया | डिवीज़न 5 सितम्बर को रात्रि 2 बजे शिमला की पहाडियों में रवाना हुयी और अगले दिन रात को 10 बजे वह निर्धारित स्थान पर पहुच गयी | 62 ब्रिगेड ने प्रात: 5:30 बजे अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार कर ली और 11 बजे तक उसने रोही नल्ला पर कब्जा कर लिया |
7 ब्रिगेड की 7 ग्रेनेडियर्स को बल्लनवाला पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी लेकिन दुश्मन के जोरदार प्रतिरोध के कारण उसे सफलता नही मिली | इच्छोगिल नहर के किसी भी स्थान पर कब्जा नही किया जा सका | 6-7 सितम्बर को दिन में शेष समय तथा रात के दौरान दुश्मन की ओर से कई प्रत्याक्रमण हुए ,जिससे भारतीय सेना तितर बितर होने लगी | उसी समय खबर मिली कि दुश्मन के टैंक नहर के इस ओर पहुचने वाले है | दुश्मन की ओर से जोरदार प्रत्याक्रमण का अनुमान लगाकर डिवीज़नल कमांडर मेजर जनरल गुरबक्श सिंह ने पीछे हटने का निर्णय ले लिया | पीछे हटकर उन्होंने असल उत्तर और चीमा नामक गाँवों ,जो खेमकरण से अमृतसर और पट्टी जाने वाले मार्गो पर स्थित थे ,में अपनी रक्षात्मक पोजीशन सम्भाल ली |
उस समय तक डिवीज़न दुश्मन की घुसपैठ के केंद्र तक पहुच गयी थी लेकिन भारतीय कमान को इसके बारे में जानकारी नही थी | पाकिस्तान की 1 बख्तरबन्द डिवीज़न और 11 इन्फेंट्री डिवीज़न कसूर के इर्द गिर्द ही तैनात थी जिसका उद्देश्य भारतीय क्षेत्र में बड़ा हमला करना था | उनके इस हमले में पाकिस्तान की 1 बख्तरबन्द डिवीज़न को कसूर और सोबराव नहर के रास्ते आगे बढ़ते हुए ग्रांड ट्रंक रोड स्थित जान्दियाला गुरु और व्यास नदी पर बने पुल को सुरक्षित करना था | हमले के लिए 7 सितम्बर का दिन निश्चित किया गया | अत: भारत की 4 इन्फेंट्री डिवीज़न के हमले से पाकिस्तानी फौजों का यह हमला 24 घंटो तक रुका रहा | ये 24 घंटे 4 इन्फेंट्री डिवीज़न को अपने सैनिको को पुनः संघठित करने तथा क्षेत्र में अपनी बख्तरबन्द ब्रिगेड को तैनात करने के लिए म्ह्त्वपुर्न्त थे |
8-10 सितम्बर के बीच दुश्मन ने भारतीय सैनिको को तितर बितर करने के प्रयास किये | इस बीच की लड़ाई मुख्यत बख्तरबंद लड़ाई थी जो पाकिस्तान की 1 बख्तरबन्द डिवीज़न ,भारत की चार पैटन रेजीमेंटो तथा एक चाफी रेजीमेंट और 2 बख्तरबन्द ब्रिगेड के साथ दो शरमन रेजीमेंट एवं एक सेंचुरियन रेजीनेट के बीच लड़ी गयी थी | यद्यपि शस्त्र के मामले में दुश्मन ज्यादा सक्षम थे तथापि टैंक और तोपों के कुशल प्रयोग से भारतीयों ने उन्हें पस्त कर दिया | मुख्य लड़ाई 10 सितम्बर को लड़ी गयी | इसी लड़ाई में हवलदार मेजर जनरल अब्दुल हमीद को दुश्मन को दुश्मन के तीन टैंको को ध्वस्त करने के लिए परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया था | इस लड़ाई में दुश्मन के कुल 97 टैंक नष्ट किये गये थे जिनमे 72 पैटन टैंक थे | इनमे से 32 टैंक तो सक्रिय स्थिति में दुश्मन उन्हें छोडकर भाग खड़े हुए थे |
सियालकोट सेक्टर में 1 कोर के हमले से दुश्मन को सबकुछ छोडकर नये खतरे का सामना करना पड़ गया | किन्तु खेमकरण अभी तक पाकिस्तान के हाथो में ही था | उस पर कब्जा करने के लिए भारतीय फौजों की ओर से कई कोशिशे की गयी लेकिन सफलता नही मिली | 11 कोर के अभियानों पर एक व्यापक दृष्टी डालने से पता चलता है कि कोर ने अपने लक्ष्य को सामन्यता प्राप्त कर लिया अर्थात भारतीय क्षेत्र में किसी घुसपैठ को रोकने के लिए वह पुरी तरह सफल रही | मात्र खेमकरण क्षेत्र को छोडकर | घुसपैठ के संघर्ष में दुश्मन की एक बख्तरबन्द डिवीज़न को नष्ट कर दी गयी |दक्षिण की ओर आगे हुसैनी वाला तथा सुलेमान के क्षेत्रो में छुटपुट लड़ाई हुयी | इई तरह राजस्थान सेक्टर में भी मामूली झडपे हुयी लेकिन इन छिटपुट लड़ाइयो अथवा झड़पो का कोई विशेष प्रभाव नही पड़ा |
इस तरह कश्मीर में तो भारतीय सेना ने पाकिस्तान के मनसूबो को कामयाब नही होने दिया और पंजाब में पाकिस्तान की सीमा के अंदर घुसकर पाकिस्तानी सेना को खदेड़ा था | 1965 जंग के अगले भाग में हम आपको भारत के जवाबी हमले और युद्ध विराम की कहानी बतायेंगे कि किस तरह युद्ध विराम के कारण पाकिस्तान बच गया था |
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