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भारतेंदु हरीशचंद्र , जिन्होंने हिंदी को प्रतिष्ठित कर की देशसेवा | Bharatendu Harishchandra Biography in Hindi

भारतेंदु हरीशचंद्र , जिन्होंने हिंदी को प्रतिष्ठित कर की देशसेवा | Bharatendu Harishchandra Biography in Hindi

भारतेंदु हरीशचंद्र , जिन्होंने हिंदी को प्रतिष्ठित कर की देशसेवा | Bharatendu Harishchandra Biography in HindiBharatendu Harishchandra भारतेंदु हरीशचंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते है | इनका मूल नाम “हरीशचंद्र” था “भारतेंदु” उनकी उपाधि थी | उन्होंने भारत देश की गरीबी ,पराधीनता ,शाशको के अमानवीय शोषण के चित्रण को ही अपने साहित्य का विषय बनाया | हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का भरपूर उपयोग किया | हिंदी भाषा को आगे बढाने के लिए भारतेंदु के समय हिंदी आन्दोलन का आरम्भ हुआ | आन्दोलन में नवीन धनर राय ,स्वामी दयानन्द सरस्वती ,महात्मा गांधी ,मदनमोहन मालवीय ,पुरुषोतम टंडन आदि का विशेष योगदान था |
भारतेंदु काल में हिंदी की स्तिथि बड़ी विकट हो गयी थी | अंग्रेज अपनी “फुट डालो राज करो ” निति पर हिंदी की राह में तरह तरह के रोड़े अटकते थे मगर भारतेंदु ने जो हिंदी आन्दोलन चलाया वह हिन्दू-मुस्लिम सभी के लिए उपयोगी था | ठीक उसी तरह जैसे बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय और रवीन्द्रनाथ टैगोर  की बंगला सेवा हिन्दू और मुसलमान सबके लिए थी | भारतेंदु बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे | हिंदी में नाटको का प्रारम्भ उन्ही के काल से माना जाता है |
Bharatendu Harishchandra भारतेंदु का जन्म 9 सितम्बर 1850 में काशी के एक प्रतिष्टित वैश्य परिवार में हुआ था | उनके पिता गोपाल चन्द्र अच्छे कवि थे | 1857 में भारत के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी आयु केवल 7 वर्ष थी | जब वे 10 वर्ष के हुए  तभी उनके पिता की मृत्यु हो गयी | माता का आंचल पहले ही छिन चूका था | माता-पिता के सुख से उनका बचपन वंचित रहा मगर बचपन से उनमे देखने-समझने की आदत विकसित होती गयी | आगे चलकर क्वीन्स कॉलेज बनारस में प्रवेश लिया |
बनारस में उस समय में अंग्रेजी पढ़े-लिखे और बहुत प्रसिद्ध लेखक राजा शिव प्रसाद सितारे हिन्द था जिनसे भारतेन्दु ने अंग्रेजी सीखी | स्वाध्याय से संस्कृत ,मराठी ,गुजराती ,पंजाबी ,उर्दू भाषाए भी सीख ली | भारतेंदु को  काव्य प्रतिभा तो अपने पिता से विरासत के रूप में पहले ही मिल गयी थी | 15 वर्ष  उम्र में ही साहित्य सेवा प्रारम्भ कर दी थी | 18 वर्ष की अवस्था में उन्होंने कविवचन सुधा (1868) नामक पत्रिका निकाली | 20 वर्ष में आनरेरी मजिस्ट्रेट बन गये और आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक के रूप में प्रतिष्ठित हुए | आगे उन्होंने 1873 में हरिश्चन्द्र पत्रिका और 1874 में स्त्री शिक्षा के लिए बाल बोधिनी पत्रिकाओं का सम्पादन किया |
नाटक लिखने की शुरुवात बंगला के विद्यासुंदर (1867) नाटक के अनुवाद से हुयी | खडी बोली में अनेक नाटक लिखकर Bharatendu Harishchandra भारतेंदु ने हिंदी नाटक की नीव मजबूत की | भारतेंदु की  लोकप्रियता से बहुत अधिक प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने 1880 में उन्हें “भारतेंदु ” की उपाधि प्रदान की | साहित्य सेवा के साथ साथ भारतेंदु जी की समाज सेवा भी चलती थी | दीन दुखियो ,साहित्यकरो और मित्रो की सहायता करना वे अपना कर्तव्य मानते समझते थे हालांकि इन्ही कारणों से उम्र  के आखिरी वर्षो में उन्हें धन का अभाव झेलना पड़ा |
चिंताओं के कारण उनका शरीर शिथिल होता गया | परिणाम स्वरुप 34 वर्ष की अल्पायु (1885) में ही उनका निधन हो गया | 34 वर्षो के जीवन काल में Bharatendu Harishchandra ने इतना लिखा ,इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचना कर्म पथ प्रदर्शक बन गया |

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