भगवान श्री गणेश का “विघ्नराज” नामक अवतार विष्णु ब्रह्म का वाचक है | वह शेषवाहन पर चलने वाले और ममतासुर के संहारक है | एक बार की बात है भगवती पार्वती अपनी सखियों से बात करते हुए हंस पड़ी | उनके हास्य से एक पुरुष का जन्म हुआ | वह देखते ही देखते पर्वताकार हो गया | पार्वती जी ने उसका नाम ममतासुर रखा | उन्होंने उससे कहा कि तुम जाकर गणेश का स्मरण करो | उनके स्मरण से तुम्हे सब कुछ प्राप्त हो जाएगा |
माता पार्वती ने उसे गणेश जी का षडक्षर (वक्रतुण्डाय हुम ) मन्त्र प्रदान किया | ममतासुर माता के चरणों में प्रणाम कर वन में तप करने चला गया | वहा उसकी शम्बरासुर से भेंट हुयी | उसने ममतासुर को समस्त आसुरी विद्याये सिखा दी | उन विद्याओं के अभ्यास से ममतासुर को सारी आसुरी शक्तिया प्राप्त हो गयी | इसके बाद शम्बरसुर ने उसे विघ्नराज की उपासना की प्रेरणा दी | ममतासुर वही बैठकर कठोर तप करने लगा | वह केवल वायु पर रहकर विघ्नराज का ध्यान और जप करता था | इस प्रकार उसे तप करते हुए दिव्य सहस्त्र वर्ष बीत गये |
प्रसन्न होकर गणनाथ प्रकट हुए | ममतासुर ने विघ्नराज के चरणों में प्रणाम कर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की थी | इसके बाद उसने कहा “प्रभो ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न है तो मुझे ब्रह्मांड का राज्य प्रदान करे | युद्ध में मेरे सम्मुख कभी कोई विघ्न ना हो | मै भगवान शिव आदि के लिए भी सदैव अजय रहू |” भगवान विघ्नराज ने कहा “दैत्यराज ! तुमने दुसाध्य वर की याचना की है फिर भी मै उसे पूरा करूँगा “|
वर प्राप्त कर ममतासुरपहले शम्बरासुर के घर गया | वर-प्राप्ति का समाचार जानकर वह परम प्रसन्न हुआ | उसने अपनी रूपवती पुत्री मोहिनी का विवाह ममतासुर से कर दिया | यह समाचार जब शुक्राचार्य को मिला तो उन्होंने धूमधाम से ममतासुर को दैत्यों का राजा बना दिया | एक दिन ममतासुर ने शुक्राचार्य से अपनी विश्वविजय की इच्छा व्यक्त की | शुक्राचार्य ने कहा “राजन ! तुम दिग्विजय तो करो , लेकिन विघ्नेवेश्वर का विरोध कभी मत करना | विघ्नराज की कृपा से ही तुम्हे इस शक्ति और वैभव की प्राप्ति हुयी है ”
इसके बाद ममतासुर ने अपने पराक्रमी सैनिको द्वारा पृथ्वी और पाताल को जीत लिया | फिर स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया | इंद्र से उसका भीषण संग्राम हुआ | रक्त की सरिता बह चली , परन्तु बलवान असुरो के सामने देवगण नही टिक सके | स्वर्ग ममतासुर के अधीन हो गया | युद्ध क्षेत्र में उसने भगवान विष्णु और शिव को भी पराजित कर दिया | सम्पूर्ण ब्रहामंड पर राक्षस शाशन करने लगा | देवताओ को बन्दीगृह में डाल दिया गया | धर्माचरण का नाम लेने वाला कोई नही रहा |
सभी देवताओ ने कष्ट निवारण के लिए विघ्नराज की पूजा की | एक वर्ष की कठोर तपस्या के बाद विघ्नराज प्रकट हुए | देवताओ ने उनसे धर्म के उद्धार तथा राक्षस के अत्याचार से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की | भगवान विघ्नराज ने नारद जी को ममतासुर के पास भेजा | नारद जी ने उससे कहा कि तुम धर्म और अत्याचार को समाप्त कर विघ्नराज की शरण ग्रहण करो अन्यथा तुम्हारा सर्वनाश निश्चित है |
शुक्राचार्य ने भी उसे समझाया पर उस अहंकारी असुर पर कोई प्रभाव नही पड़ा | ममतासुर की दुष्टता से विघ्नराज क्रोधित हो गये | उन्होंने अपना कमल असुर की सेना पर छोड़ दिया | उसकी गंध से समस्त असुर मुर्छित एवं शक्तिहीन हो गये | राक्षस कांपता हुआ विघ्नराज की चरणों में गिर गया | उनकी स्तुति करके क्षमा माँगी | विघ्नराज ने उसे क्षमा कर पाताल भेज दिया | देवगन मुक्त होकर प्रसन्न हुए और चारो तरफ विघ्नराज की जयकार होने लगी |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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