पाँच पर्वो के महासंगम से रोशन है दीपोत्सव | Significance of Deepawali in Hindi”तमसो मा ज्योतिर्मय ” के पावन संदेश के साथ जगमग दीपो से सजी दीपावली Deepawali अपने साथ पंच पर्वो को लेकर फिर आ रही है | पौराणिक मान्यताओं में दीपावली को चार म्हारात्रियो में सबसे विशिष्ट “कालरात्रि” की संज्ञा प्राप्त है | इसी कालरात्रि की महानिशा में महावीर ने निर्वाण का दीप जलाया था ,देह से विदेह हुए थे | आश्चयर्य कि भगवान राम ने लंका विजय के बाद अपने राज्य में वापसी के लिए इसी घोर निशा का चयन किया था जबकि उनके कुलगुरु वशिष्ट जैसे मुहूर्त मुहूर्त शास्त्री थे | पुराण कहते है कि इस महानिशा में समुद्र मंथन से दुर्वासा ऋषि के श्राप्र से विलुप्त लक्ष्मी पुन: प्रकट हुयी थी | Deepawali दीपावली का लक्ष्मी पूजन संदेश है की लक्ष्मी का उपयोग मात्रु पद की अवमानना है | दीपो का महापर्व धन त्रयोदशी से प्रारम्भ होकर भाई दूज को समाप्त होता है | इस पंच दिवसीय महोत्सव Deepawali के अनेक त्यौहार सम्मिलित है |
आरोग्य और धन समृधि का प्रतीक धनतेरस [धन त्रयोदशी ] | Dhanteras or Dhana Trayodashi
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से दीपोत्सव का शुभारम्भ होता है | समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन औषधियों के जन्म धन्वन्तरी का प्राकट्य हाथो में अमृत कलश लेकर हुआ था | धनतेरस को मध्याह्न में धन्वन्तरी पूजन के साथ दीप पर्व की शुरुवात होती है इसलिए लक्ष्मी के साथ विष्णु या कुबेर का पूजन करने से वो स्थायी होते है | लक्ष्मी के स्थाई निवास के लिए आज के दिन नव विधियों के स्वामी कुबेर का पूजन किया जाता है | त्रयोदशी का ज्योतिष में वृधि तिथि भी माना गया है | यही वजह है कि इस अवसर पर आभूषण ,बर्तन ,सोना ,चांदी और वाहन अदि बहुमूल्य वस्तुए खरेदी जाती है | अर्थात इस दिन की खरीद वर्ष पर्यन्त सौभाग्य एवं समृधि में वृधि करती है |
ज्योतिष में कार्तिक त्रयोदशी अबूझ मुहूर्त कहा गया है इसलिए इस दिन स्थाई महत्व के कार्य और मांगलिक कार्य प्रारम्भ करने हेतु महूर्त देखने की आवश्यकता नही होती | धनतेरस को सांयकाल से मृत्यु के देवता यम को दीप दान करते हुए दीप पर्व का श्रीगणेश किया जाता है | पौराणिक मान्यताओं की माने तो इस दिन यम के निमित्त दीप दान करने के पीछे उद्देश्य होता है कि परिवार में अकाल मृत्यु न हो |
भगवान श्रीकृष्ण से जुडी है नरक चतुर्दशी [रूप चतुर्दशी या रूप चौदस ] | Naraka Chaturdashi
दीपावली के एक दिन पूर्व कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या रूप चौदस का पर्व आता है | छोटी दीवाली के रूप में भी ये पर्व लोक प्रसिद्ध है | कहते है इस दिन हनुमान जी का प्राकट्य भी हुआ था इसलिए रूप चतुर्दशी के दिन हनुमान भक्त उनकी जयंती भी मनाते है | ज्योतिष में ये पर्व ऐसा है कि सूर्योदय व्यापानि एवं चन्द्रोदय व्यापानि दोनों ही चतुर्दशी को अलग अलग रूपों में ग्रहण किया जाता है |
नरक चतुर्दशी पर्व नरक के भय से मुक्ति पाने के उद्देश्य से मनाये जाने की परम्परा है | इस दिन सूर्योदय से पूर्व उबटन सहित स्नान करने से नरक भय समाप्त होता है | ऐसी पौराणिक मान्यताये हाउ | स्नान के पश्चात यम तर्पण किया जाता है जो उनके चौदह नामो से होता है | इस दिन रात्रि में यम के निमित एक चौमुखी दीप घर के मुख्य द्वार पर जलाए जाने की परम्परा है जो ग्रह दोषों के साथ मृत्यु भय को भी दूर करता है |
अँधेरे पर प्रकाश का विजय पर्व दीपावली | Deepawali
कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस की महानिशा को दीपावली का पर्व मनाया जाता है | देवताओं और दैत्यों द्वारा हजारो वर्ष पर्यन्त समुद्र मंथन किया गया | दुर्वासा ऋषि से श्रापित लक्ष्मी की पुनः प्राप्ति के लिए स्वयं भगवान विष्णु कच्छप अवतार लेकर मन्दराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण करना पड़ा था तब मन्दराचल पर्वत स्थिर हुआ और समुद्र मंथन की जटिल प्रक्रिया शुरू हो सकी थी | ह्लाक्ल विष ,चन्द्र ,कामधेनु ,ऐरावत ,कल्पवृक्ष ,धन्वन्तरी ,अमृत आदि प्राप्त होने के पश्चात मंथन के दौरान अंत में कार्तिक अमावस को अति दुर्लभ लक्ष्मी प्रकट हुयी जिसे भगवान विष्णु ने प्राप्त कर लिया |
मंथन के दौरान निकले शंख और चन्द्रमा महालक्ष्मी के भाई बहन माने गये | ये आख्यान पौराणीक होते हुए भी लक्ष्मी की विशष्टिता और ऐश्वर्य को बताता है | कहते है की महानिशा की घोर रात्रि में लक्ष्मी नगर की हर नगर में विचरण करती है और दीप से सुशोभित स्वच्छ और मर्यादित आचरण से युक्त अपने घरो में अपना स्थायी निवास बना लेती है |
शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार प्रदोष काल में दीपावली पूजन शास्त्र सम्मत माना गया है | प्रदोष काल सूर्यास्त के पश्चात 3 घटी का लिया जाना चाहिए |दीपावली के दिन प्रदोष काल में ही दीप दान किया जाना चाहिए | दीपदान के निमित एक थाल में तेल के 26 दीपक रखे और उसके मध्य एक चौमुखा दीप प्रज्वलित करे | तदोपरांत रोली , अक्षत और पुष्प से दीपो का पूजन करे | दीपक मुख्यत: मुख्य द्वार के दोनों ओर ,एक तुलसी के समीप , एक रसोई घर में ,दो पूजा स्थल में , एक जल केस्थान पर और एक दीपक घर के ब्रह्म स्थान अर्थात बीचोबीच रखना चाहिए |
गुरु और गोपाल से सबंध गोवर्धन पूजा
दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की परिवा को गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाता है | इसके विषय में मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी युक्ति निति से इसी दिन ग्वालो को गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण दी थी | भगवान कृष्ण की प्रसन्नता के निमित्त इस दिन गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाकर कृष्ण की विधिवत पूजा की जाती है और उनसे संकट निवारण का वरदान माँगा जाता है | इस अवसर पर गौपुजन से भी पूण्य प्राप्ति होती है
भाई दूज
पंचदिवसीय दीपावली महोत्सव का ये अंतिम पर्व है | कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया यम दीतिया और भाई दूज के रूप में मनाते है | मान्यता है कि इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने गये थे | यमुना ने अपने भाई का सत्कार करते हुए टीका आदि किया था | बी यमुना ने भाइयो को दीर्घायु के लिए यम से ये पर्व मनाये जाने का वरदान माँगा था | माना जाता है कि इस दिन बहन के हाथो किया गया तिलक भाई की आयु में वृधि करता है | इसके अलावा इस दिन चित्रगुप्त और कलम दवात की पूजा की जाती है | कार्तिक द्वीतिया पर देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा की पूजा अर्चना की जाती है |

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