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कहानी - बारह हो गये तेरह | Barah Ho Gaye Terah - Story in Hindi

barah-ho-gaye-terahएक बार एक गुरु अपने बारह चेलो के साथ तीर्थयात्रा पर निकला | अब न तो गुरु ज्ञानी था और न ही चेले इसलिए चेले आँख मूंदकर उसकी आज्ञा का पालन करते | चलते चलते दिन ढला और सामने पुरे वेग से बहती एक नदी नजर आयी | गुरु ने अपनी छड़ी की दीवार बनाते हुए चेलो को पीछे करते हुए कहा “रुको ! इस नदी में बच कर चलना है न जाने कितने लापर\वाह लोगो को इसने अपने पेट में समाया है | हो सकता है कि अब हमारी बारी हो लेकिन तुम सब डरो नही , तुम्हारे साथ तुम्हारा गुरु है गुरु का ज्ञान बड़ा भारी होता है | उसी ज्ञान के आधार पर कहता हु कि नदी अभी जाग रही है | जब तक वह सो नही जाती हमे कुछ समय के लिए विश्राम करना चाहिए ” | गूर की आज्ञा सिर-माथे | चेले विश्राम की तैयारी करने लगे |
चेलो ने अलाव जलाया | भोजन बनाने की जोर शोर से तैयारिया होने लगी | जब भोजन बन गया तो गुरु ने चेलो के साथ पेट पूजा की और भोजन उपरान्त अपनी तोंद को थपथपाते एक चेले को बुलाकर कहा “अलाव से एक जलती लकड़ी ले जाओ | उस लकड़ी को नदी से छुआ कर देखो कि वह अभी तक जाग रही है अथवा सोयी है ” | चेलें ने गूर का कहा किया लेकिन जैसे ही अलाव की लकड़ी नदी के ठंडे पानी में उतरी , एक हल्की सी सिटी बजने लगी | सारी आग बुझकर धुँआ हो गयी | चेला सर पर पाँव रखकर सरपट गुरु की तरफ भागा | गूरु के पास पहुच क्र थर थर कांपते हुए बोला “गुरूजी ! नदी तो नागिन की तरह जाग रही है जैसे ही अलाव की लकड़ी ने उसे छुआ कि सी सी करती फुफकारते हुए वह मेरी तरफ झपटी बाप रे मेरी तो जान आज बाल बाल बची ”|
तभी पास खड़े एक अन्य शिष्य ने कहा “वाकई इस नदी का कोई भरोसा नही | अब देखो न , एक बार मेरे दादाजी नमक के बोरे लादे इस नदी को पार कर रहे थे | उस दिन बड़ी गर्मी थी |दादाजी ने एक डुबकी लगाई तो सारा शरीर शीतल हो गया | अचानक गधो को देखकर दादाजी को ख्याल आया तो इनको भी गर्मी सता रही होगी | बस फिर क्या था | पूण्य कमाने का मौका वे हाथ से यु ही जाने देते ! दादाजी ने दोनों गधो को पकडकर उन नास्तिक गधो की रेंक रेंक कर की गयी ना नुकुर के बाद भी आखिर एक एक दादाजी ने नदी पार जा क्र जब नमक के बोर सम्भाले तो उनमे रत्ती भर भी नमक न था | अब बोलो बोरो की सीवन सही , यहा तक कि किसी भी बोर में किसी तरह का छेद भी नही पता  न्हीए इस बदमाश नदी ने दादाजी को कैसे चकमा देकर बोरो का सारा नमक चट कर लिया ”
खैर सारी रात गुरु चेलो ने नदी से सौ कदमो की दूरी पर विश्राम किया | सुबह हुयी तो गुरु के आदेश पर चेले ने बुझी लकड़ी से नदी का पानी छुकर देखा | इस बार न कोई सीकारा उठा और न कोई धुँआ | गूर ने खुश होकर चेलो को नदी पार करने की आज्ञा दे दी | सभी एक दुसरे का हाथ पकड़ कर नदी के उस पार उतरे | जब सभी उस पार सकुशल पहुच गये तो गुरु ने चेलो से कहा “पार पहुचे यह अच्छा लेकिन चालाक नदी का क्या भरोसा ! जो बोरो ने बंद नमक को चट कर सकती है वह पुरे पुरे आदमी को भी आँखों में धुल झोंक कर निगल सकी है अच्छा है कि हम सभी अपनी गिनती कर ले” |
अब गूर ने खुद को छोड़ सिर्फ चेलो को गिना तो उसके मुंह से आह निकल गयी “भगवान ! आखिर दुष्ट नदी ने मेरा एक शिष्य निगल ही लिया ”| गूर ने विलाप करते शिष्यों से कहा | मूढ़ शिष्यों ने अपने गुरु की भाँती खुद को छोडकर गिनती की और सभी ने सर्वसम्मति से आह भरी  ,विलाप किया कि उनका एक साथी नदी का शिकार हो गया था | सभी नदी को कोसते हुए उसे तरह तरह के श्राप देने लगे |
तभी उधर से एक आदमी गुजरा | जब उसने रोते कलपते गुरु शिष्यों को देखा तो आगे न बढ़ सका | जानने वह उन लोगो के पास पहुचा | जब सारी रामकथा उसने सुन ली तो उसने मुस्कुराते हुए कहा “आप सभी रोये नही | भगवान की कृपा से मुझे मृत लोगो को जीवित करना आता है और मैंने कितने ही मृत लोगो को जीवित करना आता है और मैंने कितने ही मृत लोगो को जीवित किया है | मैंने कभी किसी से इसके लिए कोई रुपया पैसा भी नही लिया | लेकिन इन दिनों मेरा हाथ थोडा तंग है | अगर आप सभी कुछ कीमत चूका सके तो मै पलक झपकते ही मृत आदमी को जीवित कर दूंगा ”|
यह सुनकर गुरु चेलो की बाहे खिल गयी | उन सभी ने जो जो अपनी अंटी में था उस आदमी के हवाले कर दिया  | उस आदमी ने सारी नकदी अपनी अंटी में खोसक्र एक चेले को टोकरीभर गाय का गोबर लाने को कहा | चेला कुछ ही समय में पास के गाँव में जाकर एक टोकरीभर गोबर ले आया | चालाक आदमी ने एक कतार में गोबर डलवाया | फिर गोबर की ढेरिया लगवाई | झूठ मुठ का मन्त्र पढ़ सभी को एक एक कर ढेरिया गिनवाई | सभी ने सावधानीपूर्वक गिना | एक दो तीन चार ….! अरे क्या पुरी तेरह की तेरह ढेरिया| गूर चेले खुशी से झूम उठे | सभी मूर्खो ने चालाक आदमी के प्रति पुरे मन से अपना आधार व्यक्त किया | चालाक आदमी ने हंसते हुए वहा से विदा ली | उसे ओर बारह के तेरह करने थे |

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