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Sher Shah Suri History in Hindi | शेरशाह सुरी का इतिहास

Sher Shah Suri History in Hindi | शेरशाह सुरी का इतिहास
Sher Shah Suri History in Hindi | शेरशाह सुरी का इतिहास

शेरशाह सुरी (Sher Shah Suri ) का नाम इतिहास में सम्मान से लिया जाता है क्योंकि भारत पर राज करने वाले विदेशी शाशको में से शेरशाह सुरी (Sher Shah Suri ) उन अच्छे शाषको में गिना जाता है जिसने भारतवर्ष को एकसुत्र  में बाँधने का प्रयास किया था | शेरशाह सुरी वही शासक है जिसने पांच साल के लिए मुगलों से उनकी हुकुमत छीन ली थी जब मुगल काल चरम सीमा पर थी |
सुरी के शाशनकाल में नागरिक सुविधाओ और यातायात के साधनों का काफी विकास हुआ था जिसके कारण विदेशी शाषक होने के बावजूद उसे जनता का स्नेह प्राप्त था | Sher Shah Suri शेरशाह सुरी अपनी वीरता , अदम्य साहस और परिश्रम के बल पर दिल्ली के सिंहासन पर कब्जा जमाने में सफल हुआ था | आइये आज हम आपको उसी दूरदर्शी और कुशल शाषक शेरशाह सुरी की जीवनी से रूबरू करवाते है |

शेरशाह सुरी का प्रारम्भिक जीवन

सुल्तान बहलोल के शाषनकाल में Sher Shah Suri शेर शाह सुरी के दादा इब्राहीम खान सुरी अपने पुत्र हसन खा सुरी के साथ अफ़घानिसतान से भारत आये थे | इनके पिता हसन खा जौनपुर राज्य के अंतर्गत सासाराम के जमींदार थे |  शेर शाह सुरी का जन्म 1485-86 में हिसार फिरोजा में हुआ था | Sher Shah Suri शेरशाह सुरी का बचपन का नाम फरीद खान था और ऐसा माना जाता है कि उसने अपनी जवानी में एक शेर को तलवार के एक ही वार से मार गिराया था तब से उसका नाम शेरशाह सुरी पड़ गया था |
कम उम्र में ही Sher Shah Suri शेरशाह सुरी को बहलोल लोदी के दरबारे ओमार खान ने दिल्ली के फरगना गाँव की जागीर दारी उसे सौंप दी थी | शेरशाह सुरी के पिता के कई पत्निया थी जिसके कारण वो शेरशाह के साथ समय नही बिताते थे | दुसरी तरफ उसकी सभी सौतेली माँ उसके साथ बुरा व्यवहार क्र्तीत ही इसलिए शेरशाह 1494 में घर से भाग गया था और जौनपुर के शाषक जमाल खान की सेवा करने लग गया था |

बिहार और बंगाल का विजय अभियान |

फरीद खान ने बिहार के मुगल शासक बहार खा लोहानी को अपनी सेवाए देना शूरू कर दी | फरीद खा की वीरता से प्रभावित होकर बहार खान ने उसे शेरखान की उपाधि दी | जौनपुर के शासक के यहाँ पर कुछ समय तक सेवा देने के बाद वो आगरा चला गया और बाबर की सेना में भर्ती हो गया | 1527-28 तक दो साल तक वो आगरा रहा और मुगल सैन्य संयोजन को बड़ी गहराई से सीखता रहा | वहा पर एक बार बाबर की नजर युवा शेरशाह पर पड़ी और उसने अपनी मंत्रियों से कहा “शेरखान पर नजर रखना क्योंकि ये बहुत चतुर व्यक्ति है उसके ललाट पर योद्धा के निशान साफ़ दिखाई देते है ”
इसके बाद Sher Shah Suri शेरखान ने मुगलों की सेवा करना छोड़ दिया और वापस बिहार लौट आया | बहार खा की मौत के बाद शेरखान उसके बेटे जलाल खा का सरंक्षक बन गया |
शेरशाह की बिहार में बढती हुयी शक्ति को भांपते हुए जलाल खान ने बंगाल के सुल्तान से सहायता माँगी | गयासुद्दीन ने अपने सेनापति इब्राहिम खा के नेतृत्व में एक सेना भेजी लेकिन शेरखान ने उजैनिया राजपूत और अन्य सरदारों के साथ मिलकर 1534 में सूरजगढ़ की लड़ाई में इब्राहिम खा को पराजित कर दिया | इस तरह पुरे बिहार पर शेरखान का नियन्त्रण आ गया |1538 में शेरखान ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया और गयासुद्दीन शाह को हरा दिया | लेकिन शेरखा उस साम्राज्य पर कब्जा इसलिए नही कर पाया क्योंकि दुसरी तरफ से बादशाह हुमायु ने अचानक एक हमला कर दिया |

मुगल बादशाह हुमायु से छीनी हुकुमत

बिहार और बंगाल में शेरखान की जीत ने हुमायु की नींद उड़ा दी | हुमायु गुजरात से रवाना हो गया लेकिन गौर की ओर आगे बढने के बजाय उसने छ महीने चुनर की घेराबंदी में लगा दिए | इस दौरान शेरखान ने बंगाल की राजधानी गौर और रोहतास के दुर्ग पर कब्जा कर लिया | उसकी गतिविधियों से अब हुमायु को खतरा महसूस होने लगा था | उसने बंगाल को छोडकर जब आगरा की तरफ कुच किया तो मार्ग में उसका सामना शेरशाह की सेना से हो गया | 26 जून 1539 को चौसा की लड़ाई में शेरखान का सामना हुमायु से हुआ और शेरखान ने हुमायु को पराजित कर दिया | इसके बाद 1540 में एक बार फिर कन्नौज के युद्ध में हुमायु के साथ हुए युद्ध में शेरखान ने हुमायु को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था | इस युद्ध के बाद वो दिल्ली की गद्दी पर बैठा |

मालवा का विजय अभियान

1537 में बहादुर शाह की मौत के बाद कादिर शाह  मालवा सल्तनत का नया शासक बना | उसने मालवा के खिलजी शासन में राजपूतो और मुस्लिम मंत्रियों का सहयोग ले लिया था | उसने राजा सिल्हादी के पुत्र भूपत राय और पूरण मल के शासन में सेवा करना स्वीकार किया था | 1540 में भूपत राय की मौत हो गयी और मालवा का नया शासक पूरण मल बना | 1542 में शेरशाह ने बिना लड़ाई किये मालवा पर कब्जा कर लिया और कादिर शह गुजरात भाग गया | पूरण मल ने शेरशाह के आगे समर्पण कर दिया और अपने भाई चतुर्भुज को उसकी सेवा में छोड़ दिया | इसके बदले शेरशाह ने पूरण मल और उसकी जमीन को सुरक्षित रखने का वचन दिया |
Sher Shah Suri शेरशाह के शासन में आने वाली चन्देरी की के मुस्लिम महिलाओ ने पूरण मल पर उनके पतियो की हत्या और बेटियों को गुलाम बनाने का आरोप लगाया | उन्होंने न्याय नही करने पर जान देने की धमकी दी लेकिन शेरशाह ने पूरण मल की सुरक्षा के वचन के बारे में उनको बताया और इस मसले पर उलेमा से बात करने को कहा | उलेमा ने एक फतवा जारी कर पूरण मल को मौत की सजा सुनाई | शेरशाह ने अब रायसेन में पूरण मल के महल को अपनी सेनाओ से घेर लिया |पूरण मल को जब इस बात का पता चला तो उसने अपनी पत्नी का सर कलंक कर दिया और अपने आत्मसम्मान के लिए राजपूतो को अपने परिवार के लोगो को मारने का आदेश दिया क्योंकि उनके मालिक ने उनका वादा तोड़ दियत हा | इसके बाद राजपूत रणभूमि में निकल गये और सभी राजपूतो को शेरशाह की सेना ने मार गिराया |

अपनी चालाकी से जीता समेल का युद्ध | Battle of Sammel

1543 में Sher Shah Suri शेरशाह सुरी अपनी 80000 अश्व सेना के साथ मालदेव राठोड के खिलाफ जंग के लिए निकल गया | मालदेव राठोड की 50000 अश्व सेना ने शेरशाह की सेना का सामना किया | अपने दुश्मन की राजधानी की तरफ आगे बढने के बजाय शेरशाह ने अपना पडाव जोधपुर ले पूर्व में 90 किमी दूर जैतारण के परगना में संमेल नामक गाँव में डाला | एक महीने बाद शेरशाह की स्थिति तब नाजुक हो गयी जब उसकी विशाल सेना को रसद पहुचने में परेशानी होने लगी | इस स्थिति से निपटने के लिए शेरशाह ने चालाकी की |
एक शाम को उसने मालदेव के कैंप में कुछ जाली पत्र गिरवाये जिसमे उसको भ्रमित किया कि मालदेव की सेना के कुछ सेनाध्यक्ष शेरशाह का साथ देने का वादा कर रहे है | इस घटन से मालदेव का सारा ध्यान विद्रोही सेनाध्यक्षो को खोजने में लगा गया | मालदेव अपने आदमियों को सेनापतियो के भरोसे छोडकर जोधपुर रवाना हो गया | इससे मालदेव की मासूम सेनापति जेता और कुन्पा अपने केवल 20000 सैनिको के साथ शेरशाह की 80000 सैनिको के साथ लदी | समेल के उस द्युह में शेरशाह जी विजय हुयी लेकिन उस युद्ध में उसके कई सेनापित मारे गये और उसे भारी क्षति हुएए | इस विजय के बाद शेरशाह के सेनापति खवास खान ने जोधपुर की सत्ता सम्भाली और 1544 में अजमेर से लेकर माउंट आबू तक मारवाड़ की सीमा पर कब्जा कर लिया |

शेरशाह के शासन में उपलब्धिया

  • शेर शाह ने भूमि के मापन के लिए 32 अंकवाला सिकन्दरी गज और सन की डंडी का प्रयोग किया |
  • शेरशाह ने 178 ग्रेन चांदी का “रुपया” और 380 ग्रेन ताम्बे का “दाम” चलवाया |
  • शेरशाह ने रोहतासगढ़ के दुर्ग एवं कन्नौज के स्थान पर शेरसुर नामक नगर बसाया |
  • शेरशाह के समय पैदावार का लगभग एक तिहाई भाग सरकार लगान के रूप में वसूल करती थी |
  • शेरशाह ने 1541 में पाटलीपुत्र को पटना नाम से पुनः स्थापित किया |
  • शेरशाह ने ग्रैंड ट्रंक रोड की मरम्मत करवाई और इसको अफगानिस्तान के काबुल तक फैलाया |
  • डाक प्रथा का प्रचलन भी शेरशाह द्वारा किया गया |

बारूद के धमाके से हुयी मौत

22 मई 1545 को राजपूतो के कलिंजर दुर्ग पर घेराबंदी के दौरान शेरशाह की मौत हो गयी | जब दुर्ग को भेदने की सारी तकनीके विफल हो गयी थी तब शेरशाह ने बारूद ने किले की दीवारों को उड़ाने का आदेश दिया लेकिन इस धमाके में वो खुद भी भारी तरीके से घायल हो गया | उसकी मौत के बाद उसका बेटा जलाल खान ने इस्लाम शाह सुरी के नाम से उत्तराधिकारी बना | Sher Shah Suri शेरशाह सुरी का मकबरा आज भी सासाराम में मौजूद है ये वो शहर है जहा से ग्रांड ट्रंक रोड की शुरुवात हुयी थी |

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