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Louis Braille Biography in Hindi | ब्रेल लिपि से नेत्रहीनो को आशा की किरण देने वाले लुइस ब्रेल की जीवनी

Louis Braille Biography in Hindi | ब्रेल लिपि से नेत्रहीनो को आशा की किरण देने वाले लुइस ब्रेल की जीवनी
Louis Braille Biography in Hindi | ब्रेल लिपि से नेत्रहीनो को आशा की किरण देने वाले लुइस ब्रेल की जीवनी

दुनिया भर में नेत्रहीनो में ब्रेल लिपि बहुत लोकप्रिय है | इस लिपि में दुनिया भर का अच्छा साहित्य मौजूद है | ब्रेल लिपि की खोज करने वाले लुइस ब्रेल (Louis Braille) स्वयं नेत्रहीन थे |
लुइस ब्रेल (Louis Braille) का जन्म फ्रांस की राजधानी पेरिस के निकट कुपरे नामक गाँव में 14 जनवरी 1809 में हुआ था | उनके पिता सायमन ब्रेल का घोड़ो की जीन बनाने का कारखाना था | लुइस (Louis Braille) जब तीन साल के थे , तब एक बार पिता के साथ उनके कारखाने चले गये | वहा पर खेल खेल मे वो चाक़ू से चमडा काटने की कोशिश करने लगे और झटके से चाक़ू उनकी एक आंख में जा लगा | आँख से खून की धारा बहने लगी और उनकी एक आँख की रोशनी हमेशा के लिए चली गयी | थोड़े दिनों में संक्रमन से उनकी दुसरी आँख से भी दिखना बंद हो गया और वो पुरी तरह दृष्टिहीन हो गये |
सात साल ऐसे ही गुजर गये | जब लुइस (Louis Braille) दस साल के हुए , उसी वर्ष नेत्रहीन बच्चो के लिए खुले विश्व के पहले स्कूल नेशनल इंस्टिट्यूट फॉर ब्लाइंड चिल्ड्रन , पेरिस में उन्हें दाखिला मिल गया | यहा पर “वेलंटीन होऊ ” नामक लिपि पढाई जाती थी , पर यह लिपि आधी अधूरी थी | लुइस (Louis Braille) ने यहा गणित , भूगोल और इतिहास का अध्ययन किया | सन 1821 में इंस्टीट्यूट में एक पूर्व सैनिक चार्ल्स बर्बियर का भाषण हुआ | उसने बताया कि डॉट तकनीक से अँधेरे में भी संचार कर लेते है | यह लिपि कागज पर अक्षरों को उभारकर बनाई जाती थी | उसके इस भाषण से ब्रेल को नेत्रहीनो के लिए नई लिपि विकसित करने का विचार आया |
सैनिक ने जिस लिपि का उल्लेख दिया था , उसमे 12 बिन्दुओ को 6-6 की पंक्तियों में रखा जाता था , पर उसमे विराम चिन्ह , संख्या और गणितीय चिन्ह आदि मौजूद नही थे | लुइस (Louis Braille) ने इसी लिपि के आधार पर 12 की बजाय 6 बिन्दुओ का उपयोग कर 64 अक्षर और चिन्ह बनाये | इसमें उन्होंने विराम चिन्ह और यहा तक की संगीत के नोटेशन लिखने के लिए भी जरुरी चिन्हों का भी समावेश किया |
उन्होंने जो लिपि इजाद की , आज ब्रेल लिपि के नाम से जानी जाती है |उन्होंने 15 वर्ष की आयु में सन 1824 में इस लिपि को इजाद किया लेकिन अफ़सोस उनके जीवनकाल  में उनकी लिपि को मान्यता नही मिली | शिक्षा समाप्त कर वो उसी स्कूल में शिक्षक नियुक्त हुए और 43 वर्ष की आयु में 6 जनवरी 1832 को उनका निधन हो गया |
उनकी मृत्यु के 16 वर्ष बाद सन 1868 में उनकी लिपि को मान्यता मिली और यह दुनिया भर में मान्य है | इस लिपि में बाइबिल , रामायण ,महाभारत सहित स्कूली पाठ्य पुस्तके भी मौजूद है | उनकी मृत्यु के वक्त बेखबर दुनिया भर में मिडिया ने उनकी 100वी पूण्यतिथि सन 1952 में उनपर लेख लिखे , डाक टिकिट जारी हुए और उनके घर को संग्रहालय का दर्जा मिला |
ब्रेल लिपि आज दुनिया भर के नेत्रहीनो के लिए प्रमाणिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है | क्या कहा जा सकता है कि ब्रेल (Louis Braille) का नेत्रहीन होना  ,दुनिया भर के नेत्रहीनो के लिए वरदान बन गया ?जरा सोचिये

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