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पेशवा बाजीराव , जिसने अपने जीवन में एक भी जंग नही हारी | Peshwa Bajirao History in Hindi

Peshwa Bajirao History in Hindi

Peshwa Bajirao History in Hindiपेशवा बाजीराव (Peshwa Bajirao) प्रथम हिंदुस्तान में मराठा साम्राज्य का एक महान सेनापति था | उसने 1720 से लेकर अपनी मौत तक  चौथे मराठा छत्रपति साहू के पेशवा (प्रधानमंत्री) के रूप में सेवा की | उसके अन्य नामो में उसे बाजीराव बल्लाल आयर थोराले बाजीराव भी कहते है | बाजीराव (Peshwa Bajirao) ने अपने सैन्य काल में मराठा साम्राज्य को चरम सीमा तक पहुचाया था जो उसकी मौत के बीस साल बाद भी उसके पुत्र के शासन में बना रहा | अपने 20 साल के छोटे सैन्यवृति में बाजीराव ने एक भी जंग नही हारी | एक अंग्रेज अफसर ने तो बाजीराव को हिंदुस्तान का सबसे बेहतरीन घुड़सवार सेना का सेनापति बताया है | वैसे बाजीराव मस्तानी फिल्म के जरिये बाजीराव (Peshwa Bajirao) के शौर्य के बारे में आपको काफ़ी जानकारी मिली होगी लेकिन फिर भी उसके शौर्य को सदैव जीवित रखने के लिए हम उसकी जीवनी से आपको रुबुरु करवाते है |

बाजीराव का प्रारम्भिक जीवन | Early Life of Peshwa Bajirao

बाजीराव (Peshwa Bajirao) का जन्म कोकनष्ठ चितपावन ब्राह्मण वंश के भट्ट परिवार में 18 अगस्त 1700 को हुआ था | उसके पिता बालाजी विश्वनाथ ,छत्रपति साहू के प्रथम पेशवा थे और माँ का नाम राधाबाई था | बाजीराव के छोटे भाई का नाम चिमाजी अप्पा था | बाजीराव बचपन में ही अपने पिता के सैन्य अभियानों में उनके साथ जाते थे | जब 1720 में बाजीराव के पिता विश्वनाथ की मौत हो गयी तब छत्रपति साहू ने 20 वर्षीय बाजीराव को पेशवा नियुक्त कर दिया | उसने हिन्दू साम्राज्य का भारत में प्रसार किया था |  बाजीराव दिल्ली की दीवारों पर मराठा ध्वज लहराना चाहता था और मुगल साम्राज्य को समाप्त कर हिन्दू-पत-पदशाही साम्राज्य स्थापित करना चाहता था |

कम उम्र में ही मिला पेशवा का पद

जब बाजीराव (Peshwa Bajirao) को पेशवा बनाया गया तब छत्रपति साहू पद के साथ सतारा में अपने महल तक सिमित रहते थे | मराठा महासंघ उनके नाम से चलता था लेकिन असली शक्ति पेशवा के हाथ में होती थी | बाजीराव की नियुक्ति के समय मुगल बादशाह मुहम्मद शाह शिवाजी की मृत्यु तक उनके अधीनस्थ इलाको पर वापस कब्जा करना चाहता था | 1719 में मुगल दक्कन के छ प्रान्तों से कर लेने का अधिकार रखते थे | बाजीराव को पता था कि मुगल साम्राज्य का पतन हो चूका है और इस स्थिति का फायदा उठाते हुए उसने उत्तरी भारत में अपना आक्रामक विस्तार किया |
मुगलों के पतन के बारे में बाजीराव कहता था कि “तने पर प्रहार करो और पत्तियों तो अपने आप गिर जायेगी ” | हालांकि नये पेशवा को अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा था | उसके युवा अवस्था में पेशवा नियुक्त हो जाने से सारे वरिष्ठ मंत्री जैसे नारों राम मंत्री , आनन्द राम सोमंत और श्रीपत राय बाजीराव से इर्ष्या करते थे | दक्कन में मुगल सूबेदार निजाम-उल-मुल्क असफ़ जाह अपने क्षेत्र में अपना स्वतंत्र सम्राज्य स्थापित करना चाहता था और दक्कन में मराठा अधिकारों को कर लेने के लिए चुनौती देने लगा |

निजामो के खिलाफ अभियान | Campaign against the Nizam

04 जनवरी 1721 को मराठा अधिकार के मामले पर सुलह करने के लिए बाजीराव , चिखलतन ने निजान आसफ जाह से मिला | हालांकि निजाम ने दक्कन प्रांत में कर वसूलने के मराठा अधिकार को मान्यता देने से इन्कार कर दिया | निजाम को 1722 में मुगल साम्राज्य में वजीर बनाया गया था लेकिन उसकी बढती शक्ति को देखते हुए बादशाह मुहम्मद शाह ने उसे 1723 में दक्कन भेज दिय था | निजामो ने उसके आदेश के खिलाफ विरोध किया और वजीर के पद से इस्तीफ़ा देकर दक्कन की तरफ कुच किया |
बादशाह मुहम्मद शाह ने अपनी सेना भेजी जिसमे मुगलों की पराजय हुयी | बदले में मुगल बादशाह को उसे दक्कन का सूबेदार बनाने के लिए विवश होना पड़ा | बाजीराव के नेतृत्व में मराठा , निजाम की मदद से इस जंग को जीत गये | बाजीराव को उसकी बहादुरी के लिए 7000 हाथियों की मनसबदारी से सम्मानित किया गया | युद्ध के बाद निजाम ने मराठा छत्रपति शाहू के साथ मुगल बादशाह दोनों को शांत रखा | वास्तव में वो सम्प्रभु साम्राज्य बनाना चाहता था और दक्कन में मराठो को अपना विद्रोही मानता था |
1725 में निजाम ने कर्नाटिक इलाके से मराठा राजस्व संग्राहक के मुद्दे को सुलझाने के लिए अपनी सेना भेजी | मराठो ने फतेह सिंह भोंसले के नेतृत्व में अपनी सेना भेजी जिसमे बाजीराव भी भोंसले के साथ लेकिन सेना को कमान नही दिया | मराठो को संधि के लिए बाध्य होना पड़ा | मानसून में उन्होंने दूसरा अभियान छेड़ा लेकिन इस बार भी वो निजाम को रोकने में असफल रहे |
इसी दौरान कोल्हापुर के संभाजी द्वितीय मराठा छत्रपति के पद के लिए विद्रोह पर उतर आये | निजाम ने मराठो की इस आपसी संघर्ष का फायदा उठाया | उसने कर देने से मना कर दिया क्योंकि उसे साफ़ नही हो रहा था कि असली छत्रपति साहू है या सम्भाजी | निजाम को इस मसले पर पंच बनाया गया | शाहू के दरबार में निजाम का प्रतिनिधि परशुराम पन्त प्रतिनिधि था जो बाजीराव का दुश्मन भी था | सम्भाजी द्वितीय के दरबार में उसका सहयोगी चन्द्रसेन यादव था जो एक दशक पहले बाजीराव के पिता के लिए लड़ा था |  बाजीराव ने शाहू को निजाम के मध्यस्ता की पेशकश लेने से इनकार करने को कहा और इसके बदले हमला करने को कहा |
27 अगस्त 1727 को बाजीराव ने निजाम के खिलाफ हमला बोल दिया | उसने धावा बोलते हुए निजाम के कई इलाको जलाना , बुरहानपुर और खानदेश को तबाह कर दिया | जब बाजीराव निजाम से दूर था तब निजाम ने पुणे पर धाव बोल दिया जहा सम्भाजी द्वीती छत्रपति बनकर बैठा था | 28 फरवरी 1728 को बाजीराव और निजाम की सेनाओ का पल्खेड की लड़ाई में आमना सामना हुआ | निजाम की हार हुयी और उसे संधि करनी पड़ी | इस संधि में शाहू को छत्रपति के साथ दक्कन से कर वसूलने के मराठा अधिकार को प्रस्तावित किया गया |
1728 में बाजीराव ने अपने सैन्य अभियान का केंद्र ससवाद से पुणे कर दिया और इस दौरान उसने एक कस्बे को एक बड़े शहर में तब्दील कर दिया | बाजीराव ने मुथा नदी के किनारे शनिवारवाडा महला का भी निर्माण शूर कर दिया जो 1730 में पूरा हो गया , जहा से पेशवा पुरे राज्य पर नियन्त्रण रखते थे |

मालवा विजयी अभियान

1723 में बाजीराव (Peshwa Bajirao) ने मालवा के दक्षिणी इलाको पर अपने अभियान शुरू करने की योजना बनाई | मराठा मंत्री मालवा के कई इलाको से कर लेने में सफल रही थे | मराठा शक्ति का विरोध करने के लिए मुगल बादशाह ने गिरधर बहादुर को मालवा का शासक नियुक्त कर दिया | निजाम को हराने के बाद बाजीराव का ध्यान अब मालवा की तरफ था | अक्टूबर 1728 में बाजीराव अपने छोटे भाई चिमाजी अप्पा के नेतृव में एक विशाल सेना लेकर मालवा की ओर बढ़ा | चिमाजी की सेना ने अमझेरा की लड़ाई में मुगलों को शिकस्त दी | इस लड़ाई में गिरधर बहादुर और उसके सेनापति दया बहादुर को मार दिया गया | चिमाजी उज्जैन की तरफ भी बढ़ा लेकिन रसद की कमी के कारण उसे संधि करनी पड़ी | फरवरी 1729 तक मराठा सेना वर्तमान राजस्थान तक पहुच चुकी थी |

बुंदेलखंड अभियान | Bundelkhand campaign

बुंदेलखंड में छत्रसाल ने मुगल साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह करते हुए अपना स्वतंत्र साम्राज्य स्थापित किया | दिसम्बर 1728 में मुहम्मद खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने छत्रसाल को हराकर उसके परिवार को बंदी बना लिया | छत्रसाल लगातार बाजीराव से सहायता मांग रहा था लेकिन उस समय बाजीराव मालवा के अभियानों में व्यस्त था | मार्च 1729 में अंततः पेशवा परिवार ने छत्रसाल का जवाब दिया और बुंदेलखंड की ओर मराठा सेना ने कुच किया |
छत्रसाल भी अपनी कैद से निकलने में सफल रहा और मराठा सेना में शामिल हो गया | जैसे ही उनकी सेना में जैतपुर की तरफ रुख किया , बंगाश को बुंदेलखंड छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा | बुंदेलखंड में एक बार फिर छत्रसाल का शासन हो गया | छत्रसाल ने एक बड़ी जागीर बाजीराव को सौंपी और साथ ही अपनी बेटी मस्तानी का विवाह भी उससे करवाया | दिसम्बर 1731 में अपने मौत से पहले छत्रसाल ने कुछ इलाके मराठो को सौंप दिए |

Gujarat campaign गुजरात अभियान

मध्य भारत में मराठा शक्ति बढाने के बाद बाजीराव (Peshwa Bajirao) ने अपना अगला निशाना गुजरात को बनाया | 1730 में चिमनाजी अप्पा के नेतृत्व में मराठा सेना को गुजरात भेजा गया | गुजरात में मुगल सूबेदार सरबुलंद खान ने मराठो के आगे समर्पण कर दिया और उनको गुजरात का कर वसूलने का अधिकार को मान्यता दे दी | बाजीराव की इस सफलता से छत्रपति शाहु के सेनापति त्रिम्ब्क राव नाराज हो गया क्योंकि इससे पहले त्रिमब्क राव वंश के लोगो ने अनेको बार गुजरात पर आक्रमण कर कर वसूलने का अधिकार लेना चाहा था लेकिन असफल रहे थे |
बाजीराव के नियन्त्रण से परेशान होकर दाभाडे ने पेशवा के खिलाफ विद्रोह कर दिया | गुजरात से दो अन्य मराठा मंत्री गायकवाड और कदम बंदे ने भी दाभाडे का पक्ष लिया | इस दौरान 1728 में गिरधर बहादुर को हराने के बाद मुगल बादशाह ने जय सिंह द्वितीय को मराठो को वश मर करने के नियुक्त किया | हालांकि जय सिंह ने मराठो के साथ शांतिपूर्ण समझौता किया | बादशाह इससे नाराज हो गया और उसने मुहम्मद खान बंगाश को उसके स्थान पर नियुक्त किया | बंगाश ने दाभाडे ,गायकवाड और कदम के साथ मिलकर संयुक्त सेना बनाई |
दाभोई की लड़ाई में त्रिंबक राव की मौत हो गयी | 13 अप्रैल को बाजीराव ने वरना की संधि के साथ सम्भाजी द्वितीय के साथ मतभेद सुलझा लिया जिसमे छत्रपति शाहू और सम्भाजी द्वितीय की सीमाए निर्धारित कर दी गयी | इसके बाद निजाम 27 दिसम्बर 1732 को बाजीराव से मिला और मराठा अभियानों में विघ्न नही डालने का वायदा किया | त्रिंबक राव को जीतने के बाद शाहू और बाजीराव ने शक्तिशाली दाभाडे वंश के साथ मुकाबला करने से दूर रहे | त्रिम्ब्क के बेटे यशवंत राव को शाहू का नया सेनापति घोषित किया गया | इसेक बाद बाजीराव की सेना ने दिल्ली का रुख किया और वहा फतेह पायी |

Personal life | पेशवा बाजीराव का व्यक्तिगत जीवन

पेशवा बाजीराव (Peshwa Bajirao) की पहली पत्नी का नाम काशीबाई था जिससे तीन पुत्र बालाजी बाजी राव (नाना साहेब), रघुनाथ राव और जनार्दन राव (बचपन में ही मौत हो गयी ) | 1740 में बाजीराव की मृत्यु के बाद नाना साहेब , बालाजी बाजी राव के नाम से पेशवा के उत्तराधिकारी बने |
बाजीराव (Peshwa Bajirao) की दुसरी पत्नी महाराज छत्रसाल की बेटी मस्तानी थी | बाजीराव मस्तानी से बहुत गहरा प्यार करते थे इसलिए उनके लिए अपने निवास स्थान पुणे में एक महल भी बनवाया जिसे मस्तानी महल के नाम से जाना जाता है | उस दौर में हिन्दू ब्राह्मण समाज ने इस शादी को मानने से इनकार कर दिया था क्योंकि मस्तानी का एक मुस्लिम भाई था | इसी वजह से भट परिवार को अपम्नानित भी होना पड़ा था | बाजीराव के भाई चिमनाजी अप्पा और माँ राधाबाई ने कभी मस्तानी को अपने परिवार का हिस्सा नही समझा | कई बार तो उन्होंने मस्तानी मी मौत की साजिश भी रची लेकिन छत्रपति साहू की मदद से मस्तानी बच गयी थी |
1734 में बाजीराव और मस्तानी के एक पुत्र हुआ जिसका जन्म के समय नाम कृष्णराव था | बाजीराव उसे ब्राह्मण बनना चाहते थे लेकिन माँ के मुस्लिम होने की वजह से पुजारियों ने हिन्दू उपनयन समारोह करने से मना कर दिया | इसी कारण उस बालक को मुस्लिम की बड़ा किया गया जो बाद में शमशेर बहादुर के नाम से जाना गया | काशीबाई ने छ साल के बच्चे को अपने संरक्षण में लिया और उसे अपने बच्चे की तरह पालन पोषण किया | 1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठो और अफगानों के बीच हुयी लड़ाई में शमशेर बहादुर की केवल 27 वर्ष की उम्र में मौत हो गयी थी |

बाजीराव की मृत्यु | Death

28 अप्रैल 1740 को अचानक बीमार हो जाने या शायद दिल का दौरा पड़ने से 39 वर्ष की उम्र में बाजीराव की मृत्यु हो गयी | उस समय बाजीराव (Peshwa Bajirao) अपनी एक लाख सैनिको की सेना के साथ इंदौर शहर के निकट खारगोन जिले में अपने कैंप में थे | बाजीराव का नर्मदा नदी के तट पर रावरखेड़ी नामक स्थान पर दाह संस्कार किया गया और इसी स्थान पर उनकी याद में एक छतरी का निर्माण भी किया गया |

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