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महाराजा छत्रसाल बुंदेला ,कुशल सेनापति और असाधारण योद्धा | Maharaja Chhatrasal History in Hindi

महाराजा छत्रसाल बुंदेला ,कुशल सेनापति और असाधारण योद्धा | Maharaja Chhatrasal History in Hindi बुंदेला वीर महाराजा छत्रसाल (Maharaja Chhatrasal) में बुंदेलखंड की शौर्य ,निर्भीकता और संघर्ष की परम्परा मूर्तिमान थी | उनका स्थान इतिहास में उन भारतीय वीरो के मध्य है जिन्होंने शिवाजी और राणा प्रताप भांति मुगल साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए जीवन भर संघर्ष किया और वह बुंदेलखंड के एक बड़े भूभाग को शक्तिशाली मुगल सम्राट के पंजो से मुक्त करा सके |

महाराज छत्रसाल का आरम्भिक जीवन

छत्रसाल (Maharaja Chhatrasal) का जन्म शुक्रवार ज्येष्ठ सुदी 3 , संवत् 1706 (सन 1649) में झांसी के निकट ककर-कचनय ग्राम में हुआ था | वह ख्याति प्राप्त बुंदेला वीर ,चम्पतराय के पुत्र थे जिन्होंने 17वी सदी में तीसरे दशक में ओरछा को मुगल साम्राज्य के बंधन से स्वतंत्र कराने के लिए विद्रोह का झंडा ऊँचा किया था परन्तु वीर चम्पतराय को अपने ही स्वजनों ओरछा ,दतिया और चंदेरी के राजाओ के विरुद्ध तलवार उठानी पड़ी थी | ये राजा मुगलों के इशारे पर चम्पतराय के विद्रोह को दबाने के लगातार प्रयत्न कर रहे थे |
30 वर्ष के निरंतर संघर्ष के उपरांत सहरा के धधेरो ने सन 1661 में चम्पतराय का वध करवा दिया और चम्पतराय का सिर काटकर औरंगजेब के पास भेज दिया , जहा उसे 7 नवम्बर 1661 को दरबार में पेश किया गे | इस संघर्षमय काल में बालक छत्रसाल अपने पिता के साथ स्थान स्थान भटकते रहे और उनसे युद्ध कला की शिक्षा प्राप्त करते रहे |चम्पतराय की हत्या से छत्रसाल का हृदय प्रतिशोध की तीव्र भावना से भर गया परन्तु अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए उनके पास साधन नही थे इसलिए उन्होंने सुअवसर की प्रतीक्षा करना उचित समझा और अपनी आगामी योजना की तैयारी करने लग गये |
कुछ समय के लिए छत्रसाल (Maharaja Chhatrasal) मुगल सेना में भर्ती हो गये और सेना के साथ 1667 में दक्षिण अभियान में गये |
वे मिर्जा राजा जयसिंह की सेना के साथ पुरन्दर के घेरे में , अपने भाई अंगद तथा चाचा जामशाह के साथ उपस्थित थे | उस घेरे में बड़ी वीरता दिखाने के कारण उन्हें पुरुस्कृत भी किया गया |छत्रसाल ने बीजापुर के आक्रमण में भी हिस्सा लिया परन्तु उनके हृदय में अपने पिता की हत्या के प्रतिशोध की आग धधक रही थी |  शिवाजी के मुगलों के विरुद्ध संघर्ष ने छत्रसाल को रोमांचित कर दिया | मुगल सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध के शिवाजी प्रतीक बन चुके थे | महाराजा छत्रसाल भी उनसे प्रभावित हो , उनकी ओर आकर्षित हुए बिना कैसे रहते ? मुगलों की ओर से शिवाजी के विरुद्ध युद्ध करना उन्हें लज्जाजनक प्रतीत हुआ |

शिवाजी-छत्रसाल भेंट

एक दिन शिकार खेलने के बहाना बनाकर ,छत्रसाल (Maharaja Chhatrasal) मुगल  खेमे से भाग निकले | उन्होंने भीमा नदी पार की और अपनी पत्नी सहित शिवाजी से पूना में भेंट की | इतिहासकारों का मत है कि शिवाजी-छत्रसाल भेंट ,शिवाजी के आगरा से भाग निकलने के बाद सन 1667 के अंतिम महीनों में हुयी होगी | छत्रसाल कुछ समय तक शिवाजी के पास पूना में रहे | वहा उन्होंने शिवाजी से युद्ध प्रणाली ,कूटनीति और शासन निति की शिक्षा ग्रहण की | बाद में छत्रसाल ने इस शिक्षा का बुंदेलखंड में बहुत कारगर ढंग से उपयोग किया |
महाराजा छत्रसाल (Maharaja Chhatrasal) की इच्छा थी कि दक्षिण में रहकर मुगलों के विरुद्ध शिवाजी के स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान करे परन्तु शिवाजी दूरदर्शी थे | वह स्वराज के प्रयत्नों को मात्र दक्षिण तक सिमित रखने के पक्ष में नही थे अत: उन्होंने छत्रसाल को परामर्श दिया कि वह बुंदेलखंड लौट जाए और मुगलों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजाए | सुप्रसिद्ध इतिहासकार यदुनाथ सरकार के मत है कि इस परामर्श के कारण यह था कि शिवाजी मुगल सेनाओ का ध्यान बटाकर दक्षिण में उनका दबाव कम करना चाहते थे | इस प्रकार मुगलों के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम की मशाल वीर छत्रसाल के नेतृत्व में बुंदेलखंड में प्रज्वलित हुयी |

प्रारम्भिक संघर्ष

बुंदेलखंड को स्वतंत्र कराने के दृढ़ संकल्प के साथ युवा छत्रसाल सन 1671 में बुंदेलखंड लौटे | इस समय उनके साथ केवल 5 अश्वारोही और 25 पदाति थे | इतने कम सैनिक बल और अन्य साधनों के अभाव में उद्देश्य प्राप्ति लगभग असम्भव ही थी | उनके पास एक इंच भूमि भी ऐसी नही थी जिसे वह अपनी कह सकते | किन्तु बहुप्रतीक्षित सुअवसर आशा से पहले ही आ गया | औरंगजेब ने अपनी सेना को , जो उस समय ओरछा पर आक्रमणरत थी मन्दिरों को नष्ट करने के आदेश दिए | ऐसे समय जनता की दृष्टि में छत्रसाल ही आशा की अंतिम किरण थे और इसलिए वे छत्रसाल के नेतृत्व में संघठित हो गये | चम्पतराय के पुराने साथी बुंदेलखंड के कोई 70 जागीरदार और सरदार छत्रसाल की सहायता के लिए फिर से जागे और शस्त्र लेकर मैदान में आ गये |
एक वर्ष के निरंतर संघर्ष के बाद छत्रसाल ने अपने पैर जमा लिए और मऊ के आसपास के क्षेत्र पे अधिकार कर लिया | दो वर्षो में भीतर ही उन्होंने अपने प्रभाव क्षेत्र में काफी विस्तार कर लिया और मुगल खेमो में खलबली मचा दी | सागर जिले में अपने असाधारण शौर्य और साहस के लिए विख्यात बांसा के जागीरदार केशवराय दांगी से उनकी मुठभेड़ बहुत प्रसिद्ध है | उसने छत्रसाल को द्वंद युद्ध के लिए ललकारा | लोगो ने छत्रसाल को बहुत रोका परन्तु बुंदेला वीर छत्रसाल चुनौती से मुंह कैसे मोड़ सकते थे | दोनों में भयानक युद्ध हुआ | छत्रसाल की बरछी के वार से केशवराय धराशायी हो गया और उन्होंने उसका सिर काट लिया |
छत्रसाल के वीर योद्धा थे और शत्रु के सर्वनाश करने में उनके कोई हिचक नही थी परन्तु पराजित शत्रु एक प्रति वह हमेशा उदार रहते थे और उसकी वीरता का सम्मान भी करते थे | इसी निति के पालन में उन्होंने केशवराय की जागीर उसके पुत्र विक्रमजीत को लौटा दी | दक्षिण में रायसेन ,उत्तर में कलापी और महोबा तक के प्रदेश ,पश्चिम में सिरोंज और ग्वालियर तथा पूर्व में बघेलखंड तक उनकी तलवार की झंकार सुनाई देने लगी | कलिंजर के किले पर अधिकार करने के पश्चात छत्रसाल मऊ लौट आये |
एक दिन शिकार खेलने के समय स्वामी प्राणनाथ से उनकी अचानक भेंट हुयी | यह भेंट स्थायी महत्व की सिद्ध हुयी | प्राणनाथ ने छत्रसाल के स्वाधीनता संग्राम को नैतिक और अध्यात्मिक बल प्रदान किया तथा छत्रसाल के राजनितिक कार्यो में भी अध्यात्मिक सहयोग दिया | कभी कभी वह स्वयं छत्रसाल के सैनिक अभियानों में उनके सैनिको का साहस बढ़ाने के लिए जाया करते थे | स्वामी प्राणनाथ की प्रेरणा से ही छत्रसाल ने पन्ना में अपने राज्य की राजधानी स्थापित की |
छत्रसाल एक के बाद दुसरे स्थानो पर विजय प्राप्त करते चले गये और जब तक कि पूरा पूर्वी बुंदेलखंड उनके अधिकार में नही आया निरंतर आगे बढ़ते चले गये | उन्होंने अपनी स्थिति इतनी सुदृढ़ बना ली कि मुगलों को छत्रसाल द्वारा विजित प्रदेश से उन्हें अपदस्थ करने के विचार को छोड़ना पड़ा | युद्ध से क्लांत होकर छत्रसाल ने औरंगजेब के साथ 1707 में संधि कर ली | बदले में औरंगजेब ने छत्रसाल को “राजा” और 4000 मनसब की पदवी से विभूषित किया |
परवर्ती मुगल शासको से छत्रसाल (Chhatrasal) ने संबध सन 1723 तक सौंजन्यपूर्ण बने रहे किन्तु सन 1727 में इलाहाबाद के मुगल सूबेदार मोहम्मद खान बंगश ने छत्रसाल को परास्त करने तथा राज्य को विजित करने के लिए बुंदेलखंड पर आक्रमण किया | यह युद्ध दो वर्ष तक चलता रहा | शुरू में बंगश की विपुल सैन्य शक्ति से बुन्देल सेना छिन्न भिन्न हो गयी | अपनी स्थिति की गम्भीरता को समझते छत्रसाल को देर नही लगी | यद्यपि शिवाजी जीवित नही थे परन्तु मुगलों के विरुद्ध मराठा संघर्ष का नेतृत्व शूरवीर बाजीराव पेशवा के हाथो में था | उन्हें पूर्ण विश्वास था कि पेशवा उनकी सहायता करेंगे | कहते है कि बाजीराव पेशवा को सहायता के लिए पत्र लिख भेजा
पत्र पाकर बाजीराव एक बड़ी सेना लेकर बुंदेलखंड आये और उन्होंने बंगश को परास्त कर बुंदेलखंड की स्वाधीनता की रक्षः की | महाराजा छत्रसाल (Chhatrasal) उस सहायता से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने राज्य का तीसरा हिस्सा देने का वचन किया | छत्रसाल की मृत्यु 81 वर्ष की पूर्णावस्था में 4 दिसम्बर 1731 को नौगाँव से 7 किमी दक्षिण में मऊ-सिहानिया ग्राम में हुयी | उन्होंने अंतिम समय तक ओजपूर्ण और सम्मानपूर्ण जीवन व्यतीत किया |
उनकी शक्ति और साहस का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बंगश के विरुद्ध छत्रसाल (Chhatrasal) ने 77 वर्ष की उम्र में स्वत: सैन्य संचालन किया | महराजा छत्रसाल का 60 वर्षीय योद्धा जीवन इतिहास का अभूतपूर्व उदाहरन है | वह योद्धा के रूप में जिए और योद्धा के रूप में वीरगति को प्राप्त हुए | बुन्देल इतिहास में लिखा गया है कि छत्रसाल के पहले और बाद में कोई ऐसा राजा नही हुआ जिसने मुस्लिम विजय के वेग को इतनी सफलतापूर्वक रोक दिया हो या जिसने कई बार मुगल सम्राटो के सर्वाधिक योग्य और उद्यमी शासक के चुने हुए सैन्य बल का विरोध किया और उन्हें परास्त किया हो | उनका व्यवहार सैनिको के प्रति बहुत सहृदय था | वह जानते थे कि संतुष्ट प्रजा ही सुदृढ़ राज्य का आधार हो सकती है |

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