
बांस ,बुरांश ,देवदार और चीड के सघन वृक्षों के बीच स्थित मसूरी सिन्धु तट से 2005 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है | यह उत्तरी भारत का प्रमुख पर्यटन स्थल है जिसे पहाड़ो की मलिका , पर्वतों की रानी , बहारों की मलिका इत्यादि नामो से पुकारा जाता है | 64.25 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला मसूरी पर्यटन स्थल अपने अप्रतिम सौन्दर्य , नैसर्गिक छवि वानस्पतिक सम्पदा , जल प्रपातो ,बलखाती सड़को , वन्य जन्तुओ , ऊँची नीची पहाडियों के नयनाभिराम दृश्यों से पर्यटकों को अपनी ओर आकृष्ट करता है | इस विशाल भुस्थान पर दूर दूर तक पेड़ो के झुरमुटो के बीच रंग-बिरंगे भवन सहज ही परीलोक की कल्पना को साकार करते प्रतीत होते है |
सहारनपुर तथा हरिद्वार से मसूरी लगभग बराबर की दूरी पर है मगर मसूरी की यात्रा हरिद्वार से करने पर शिवालिक पहाड़िया , दुधिया जलधाराए चारो ओर हरे-भरे पेड़ो से आच्छादित वानस्पतिक सम्पदा ऋषिकेश में चन्द्रभागा नदी का गंगा के साथ संगम , हिम धवल पर्वत शृंखलाओं का सौन्दर्य नजर आते है | मसूरी में मनोरंजन के पर्याप्त साधन है | यूरोपीय देशो की तरह मसूरी में भी शरदोत्सव का प्रतिवर्ष सितम्बर-अक्टूबर माह में आयोजन किया जाता है |
नगरपालिका तथा पर्यटन विभाग के संयुक्त तत्वाधान में होने वाले इस उत्सव में मसूरी को दुल्हन की तरह सजाया जाता है | इस अवसर पर कवि सम्मेलनों , गीतों , लोक-नृत्यों ,मुशायरो ,फोटो प्रदर्शनी आदि कई मनोरंजक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियाँ कराई जाती है | इसी प्रकार जून में गंगा दशहरे के अवसर पर सुरकंडा देवी के मन्दिर में बहुत बड़ा मेला लगता है |
मसूरी की खोज अंग्रेज सैन्य अधिकारी मेजर हियरसे ने की थी | बाद में मि.यंग ने यहा भवन निर्माण की आधारशिला रखी | इसके पश्चात अंग्रेज अधिकारियों एवं राजा-महाराजाओं का आगमन यहा होता रहा | भीषण गर्मी से त्रस्त डचो ने भी मसूरी की राह पकड़ी थी | सन 1873 में यहा मुन्सिपल बोर्ड का निर्माण हुआ | लैडर इलाके को अंग्रेजी सेना ने अपना स्थान बनाया था | फिर तो हरी-भरी वादियों ,पेड़ो के झुरमुटो , जल-प्रपातो के इस वानस्पतिक संपदायुक्त नगर में पर्यटकों का तांता लग गया | धीरे धीरे यह विकास की डगर पकड़ता गया |
सड़क मार्ग से मसूरी देश के प्रमुख हवाई अड्डो से जुड़ा हुआ है | हालांकि यहा से 60 किमी दूर जौलीग्रांट हवाई अड्डा है | वायु सेवा देहरादून से दिल्ली उपलब्ध है लेकिन नियमित उड़ाने यहा प्रभावित होती रहती है | स्थानीय यातायात के लिए मसूरी में अनेक साधन है | हाथ से खीचे जाने वाले रिक्शे ,डांडी ,घोड़े आदो जो पर्यटकों को मसूरी की सैर आसानी से कराते है | आइये अब आपको मसूरी के पर्यटन स्थलों के बारे में बताते है |
01 सुरकुंडा देवी
यहा तक पहुचने के लिए बस इत्यादि की तो सुविधा है ही मगर यह क्द्दुखाल तक ही है | आगे एक 2 किमी का रास्ता पैदल ही तय करना पड़ता है | समुद्रतल से यह स्थान दस हजार फुट की उंचाई पर है | मसूरी का शायद यह सबसे ऊँचा स्थान है | भगवती सुरेश्वरी को समर्पित इस मन्दिर को 2 किमी की चढाई थकाने वाली है | यहा से चारो ओर के हिमालय के अनुपम प्राकृतिक सौन्दर्य के नजारे हम भली भांति देख सकते है | गंगा दशहरे के अवसर पर यहा बड़ा भारी मेला लगता है | उस समय दूर-दूर के मैदानी भागो से दर्शनार्थी यहा पूजा-अर्चना हेतु आते है | ठंडी रातो के लिए प्रसिद्ध मसूरी में लाल टिब्बा गार्डन ,वन चेतना केंद्र , माल रोड , सेवाय होटल ,मसूरी झील ,लेक मिस्ट ,झड़ी पानी प्रपात ,धनोल्टी आदि अन्य दर्शनीय स्थल भी है |
02 कैम्पटी फाल
मसूरी का यह बेहद आकर्षक स्थान है | यह बहुत ही सुंदर जल -प्रपात है जो दूर ऊँचाई से गिरता है | जल-प्रपात के अधिक ऊँचाई से गिरने के कारण दुधिया पानी की लहरों से रोमांचक दृश्य उपस्थित होता है | यह झरना जिस जगह पर नीचे आकर गिरता है वहा तलाई सी बना दी गयी है | इस तलाई में घुटनों के उपर तक पानी रहता है | झरना इसी तलाई में पड़ता है | इस कारण से बच्चे ,बूढ़े और जवान सभी एक साथ उम्र का भेद , लिंग-भेद भुलाकर नहाते है | नहाने का समय के हिसाब से शुल्क लिया जाता है |
जल-प्रपात के पास कुछ दुकाने है जहा खाने पीने के अलावा किराये पर वस्त्र भी मिलते है जिन्हें पहन कर पर्यटक नहाते है | एक समय में अंग्रेज यहा चाय पिया करते थे | इस कारण से इसका नाम कैम्पटी फॉल पड़ा | यह मसूरी से 14 किमी दूर टिहरी जनपद के जौनपुर विकास खंड में पड़ता है | पर्यटकों के लिए आने जाने के साधन बहुत है |
03 गनहिल
इसे तोप टिब्बा भी कहते है | यह मसूरी की दुसरी ऊँची चोटी है | ब्रिटिशकाल में यहाँ एक तोप रखी रहती थी | दिन के 12 बजे का समय बताने के लिए उससे गोला दागा जाता था जिससे लोग अपनी घडिया मिलाते थे | 1919 में इसे दागना बंद कर दिया गया | गनहिल एक आकर्षक पर्यटक स्थल है | यहा पहुचने के लिए पैदल तथा रज्जूमार्ग दोनों है | पैदल चलने पर तकरीबन आधे घंटे में गनहिल पहुचा जा सकता है | हालांकि यात्रा सरल नही है कठिन चढाई वाली हा मगर पैदल यात्रा करने पर मसूरी के प्राकृतिक दृश्यों पर दृष्टिपात किया जा सकता है | ट्रोली द्वारा रज्जुमार्ग से गनहिल दूरी केबल 400 मीटर है तथा गनहिल पर पहुचने में केवल 5 मिनट ही लगते है | गनहिल पर अनेक प्रकार की दुकाने है | गनहिल के उपर पहुचने पे हमे ऐसा अहसास होता है कि शायद हम मसूरी की सबसे ऊँची छत पर आ गये हो ?
04 कैमल्स बैक रोड
प्रात:कालीन एवं सांयकालीन भ्रमण के लिए मसूरी का यह उत्तम स्थान है | यह 3 किमी लम्बा रस्ता है जो कुलड़ी बाजार में रिंक हाल से शुरू होता है तथा लाइब्रेरी बाजार में होटल रोजलिन पर जाकर समाप्त होता अहि | इस 3 किमी की राह से जन हम भ्रमण करते है तब ऐसा लगता है मानो हिमालय तथा गढवाल की पहाडियों के मनोरम दृश्य हमारा स्वागत कर रहे हो | रास्ते में देवदार के सघन वृक्ष है | घुड़सवारी का भी हम इस रास्ते से आनन्द ले सकते है | यह रोड गनहिल के पीछे की ओर है | गनहिल का इस ओर का एक भाग प्राकृतिक रूप से ऊंट की आकृति का बना है | इस चट्टान के कारण इस राह का नाम कैमल्स बैक रोड पड़ा | इनके अलावा मसूरी से कुछ दूर स्थित लाखा मंडल एवं बौद्ध मन्दिर के अलावा क्लोउट्स एंड रिसोर्ट जैसे स्थल भी दर्शनीय है
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