
आइये आज हम आपको चमकादड (Bats) से जुड़े रोचक तथ्य बताते है
- चमकादड एकमात्र ऐसा स्तनपायी जन्तु है जो उड़ सकता है हिया |
- चमकादड (Bats) कीड़े-मकौड़ो और हानिकारक जीवो को खाता है |
- चमकादड वायु में , उड़ने वाली ध्वनि तरंगो के सहारे आगे बढ़ता है और अँधेरे में कभी किसी वस्तु आदि से टकराता नही |
- चमकादड समूह में रहते है |
- चमकादड जमीन पर नही उतरता | जमीन पर यह ठीक से चल नही सकता और न ही आसानी से उड़ सकता है |
- चमकादड दिन भर किसी पेड़ की डाली , पुरानी इमारत या अंधेरी गुफा में उल्टा लटका रहता है |
- मेंढक की तरह चमकादड भी शीत निद्रा के लिए जाते है तो फिर गर्मियों में ही दिखाई देते है |
- शरद भूभागो में रहने वाले चमकादड चिरस्थायी विश्राम करते है | किसी अँधेरे स्थान में उल्टे लटके कई मास तक निराहार सोते रहते है | इस अवधि में इनकी शक्तियाँ इतनी मंद पड़ जाती है कि हाथ में लेकर उछाल देने पर भी चैतन्य नही होते |
- ग्रीष्म ऋतू की एकत्रित की गयी चर्बी घुल-घुलकर इसके शरीर को जिन्दा रखती है |
- इसकी कई जातियाँ मिलती है | कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका में पाया जाने वाला लाल कत्थई बालो वाला चमकादड सर्दी के दिन शुरू होते ही दक्षिणइ ओर प्रवास यात्रा पर चल पड़ता है | कई तो अंधमहासागर पार करते हुए 900 किमी दूर बरमूडा तक पहुच जाते है | फिर गर्मी आरम्भ होते ही उत्तर दिशा की ओर उड़ जाते है |
- यूरोप में चूहे जैसे कान वाले चमकादड सर्दिया बिताने के लिए अफ्रीका के उत्तरी भाग में चले जाते है | सर्दियों के शुरू में भूमध्य सागर के दक्षिणी तट की ओर बड़े बड़ी झुण्ड रहते है |
- फ्रांस के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में प्रवास यात्रा प्रारम्भ करने वाले चमकादडो को पिरेनीज पर्वत पार करना पड़ता है | यह पर्वत काफी उंचा है | इसे पार करने के लिए कई कठिनाइयो का सामना करना पड़ता है | प्रवास यात्रा के दौरान यह चमकादड स्पेन के दक्षिणी तट पर पिरेनीज पर्वत की गुफाओं रॉक ऑफ़ जिब्राल्टर आदि जगहों पर रुककर अपनी थकान दूर करते है | इन विश्राम स्थलों पर रुकते हुए एटलस पर्वतों की गुफाओं में पहुच जाते है जहा ये शीत निद्रा लेते है |
- बड़े कान वाले Bats की नाक के उपर झिल्ली की एक परत सी लगी होती है | यह छोटा सा चमकादड भारत में सब जगह मिलता है | पुराने घरो गुफाओं आदि में रहता है | यह अन्य जातियों के चमकादडो का खून पिया करता है | उड़ते हुए चमकादडो के कान के पीछे यह चिपट जाता है और खून चूस जाता है | खून पीने के बाद यह अपने शिकार को खा भी जाता है | इसका रंग हल्का पीला होता है | शरीर की लम्बाई 3-4 इंच होती है | कान विशेष रूप से बड़े होते है |
- पीला चमकादड की लम्बाई दुम सहित 5 इंच से कुछ अधिक होती है | यह कर्नाटक ,उत्तरी भारत और बंगाल में मिलता है | रंगदार चमकादड का शरीर लगभग 3.5 इंच होता है | यह भारत में सब जगह मिलता है | इसके शरीर के उपरी भाग का रंग नारंगी-सा होता है | नीचे के भाग का रंग पीला होता है | उड़ने वाली झिल्ली का रंग बिल्कुल काला होता है और उस पर नारंगी रंग की धारियाँ होती है | अपने सुंदर रंगो के कारण उड़ने में यह तितली की तरह लगता है | केले के गोल लिपटे हुए नये पत्तो के अंदर छिपा रहता है |
- वेस्टर टीलियो जाति के चमकादडो की लगभग 43 उपजातिया मिलती है | मूंछदार चमकादड इसी जाति का है | इस छोटे से चमकादड का शरीर दुम सहित लगभग 2.5 इंच का होता है | उपरी होठ के दोनों ओर बाहर निकले हुए मूंछों के समान बाल होते है | यह भारत में बहुत कम मिलता है |
- फ़ाइला स्तोमा जाति के चमकादडो की नाक पर खाल अथवा झिल्ली की एक पत्ती सी खडी होती है | इनका मूंह बहुत चौड़ा खुलता है और जीभ पर काँटे होते है | उपरी जबड़े की पुष्ट कीले मूंह के बाहर निकले होते है | इस जाति के जीव सिर्फ मध्य और दक्षिणी अमेरिका में मिलते है | इसका स्वभाव बहुत भीषण होता है |
- इस प्रजाति के चमकादडो को कीड़े-मकौड़े से ही संतुष्टि नही होती बल्कि पशुओ का खून पिया करते है | गाय, बैल घोड़ो से ये चिपट जाते है और खाल काटकर खून चूसते है | मौका मिलने पर मनुष्य से भी चिपट जाता है | जंगल में खुले सोते हुए लोगो के पैरो के अंगूठे से चिपक जाते है और खून चूस लेते है | इनके काटने से इतनी कम पीड़ा होती है कि मनुष्य की नीदं भी नही टूटती |
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