
पूरा वनस्पति विज्ञानी बीरबल साहनी (Birbal Sahni) का जन्म 24 नवम्बर 1891 को शाहपुर जिले के भेडा गाँव (अब पाकिस्तान) में हुआ था | उनके पिता प्रो. रुचिराम साहनी सरकारी कॉलेज , लाहौर में रसायनशास्त्र के प्रोफेसर थे | भेड़ा आने से पूर्व इनके पूर्वज डेरा इस्माइल खा में रहते थे किसी कारणवश उन्हें अपनी पैतृक सम्पति छोडकर वहां से भेडा आना पड़ा था | इनके पिता तथा परिवार ब्रह्मसमाजी विचारों एक थे और इनके पिता रुचिराम साहनी स्वतंत्रता सेनानी भी थे | इन सबका प्रभाव बालक बीरबल साहनी पर भी पड़ा था |
बीरबल साहनी (Birbal Sahni) की रूचि बाल्यकाल से ही पेड़-पौधों की ओर थी | पिता चाहते थे कि वह I.C.S. बनकर किसी सरकारी उच्च पद पर प्रतिष्टित हो , किन्तु बीरबल की रूचि विज्ञान में थी | बीरबल साहनी की शिक्षा लाहौर में हुयी और पंजाब विश्वविद्यालय में बी.एस.सी. उत्तीर्ण करने के उपरान्त सन 1918 में वे उच्च अध्ययन हेतु कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय इंग्लैंड में चले गये , जहां उन्होंने एमानुअल कॉलेज से ट्राईपोस उपाधि प्राप्त की और फिर प्रोफेसर एल्बर्ट चार्ल्स स्वीर्ड के मार्ग दर्शन में शोध कार्य आरम्भ किया | इस प्रकार अन्वेषण तथा शोध कार्य के क्षेत्र में बीरबल साहनी को सुयोग्य एवं समुचित मार्गदर्शन प्राप्त हुआ |
तदुपरांत साहनी (Birbal Sahni) म्यूनिख गये और वहां उन्होंने प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी प्रो.के.गोयल के निर्देशन में अनुसन्धान किया | लन्दन विश्वविद्यालय से उन्होंने बी.एस.सी. की उपाधि अर्जित की | बीरबल साहनी का पहला शोध पत्र वनस्पति विज्ञान के प्रख्यात पत्र “न्यू फाइटोलोगिस्ट” में प्रकाशित हुआ था | उन्होंने रॉयल सोसाइटी से सहायता प्राप्त कर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डी.एस.सी. तक की उपाधियाँ अर्जित की | सन 1919 में उन्हें लन्दन विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट की उपाधि से अलंकृत किया | यह सम्मान उन्हें Fossil Plants नामक प्रबंध पर प्राप्त हुआ | बाद में डा.साहनी ने वृक्ष के तने को पत्थर में रूपांतरित करने का सफल प्रयोग भी किया |
सन 1929 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से उन्हें एम.एस.सी. की विशेष उपाधि से सम्मानित किया गया | 1936-37 में लन्दन की रॉयल सोसाइटी ने उन्हें अपना फैलो निर्वाचित कर गौरवान्वित किया | सन 1929 में विदेश से भारत लौटने पर डा.साहनी की बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति हुयी | सन 1920 में उनका विवाह हो गया | उनकी धर्मपत्नी ने उनके कार्य में सक्रिय रूप से भाग लिया और लगातार उनका साथ दिया | इस दम्पति को कोई सन्तान नही हुयी | डा.साहनी सन 1921 में लखनऊ विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान विभाग में प्रोफेसर पद पर नियुक्त हुए | उन्ही के अथक परिश्रम और लगन का परिणाम है देश का सर्वोच्च वनस्पति और पुरावनस्पति विज्ञान का वह गौरवशाली एवं विशिष्ट पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान | जिसके तत्वाधान में सन 1946 में वनस्पति विज्ञान की वृहद प्रयोगशाला स्थापित हुयी |
प्रो.साहनी (Birbal Sahni) ने भारतीय ही नही अपितु विदेशी वैज्ञानिक संस्थानों की प्रगति में भी अपना सहयोग दिया | दो बार सन 1930 और 1934 में विश्व वनस्पति कांग्रेस की पूरा वनस्पति शाखा के उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए | सन 1921 तथा 1928 में दो बार भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए | राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के सन 1937-38 तथा 1943-44 में प्रधान रहे | विश्व वनस्पति कांग्रेस स्टॉकहोम के भी वे प्रधान रहे थे | प्रो.साहनी को 1936 में बंगाल की रॉयल एशियाटिक के वर्कले मैडल 1945 में न्युमिस्ममैटिक सोसायटी ऑफ़ इंडिया के नेल्सन राईट मैडल तथा 1947 में सर सी.आर.रेड्डी राष्ट्रीय पुरुस्कार से सम्मानित किया गया | पटना और इलाहबाद विश्वविद्यालय ने भी उन्हें डी.एस.सी की उपाधि से सम्मानित किया गया |
प्रो.साहनी (Birbal Sahni) भारतीय पूरावन्स्प्तिविदो की सोसायटी के संयोजन थे | जब वह सोसायटी एक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत हुयी तो साहनी दम्पति ने अपनी सम्पूर्ण सम्पति इस ट्रस्ट को दान कर दी | सन 1948 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस ट्रस्ट को पुरावनस्पति संस्थान के निर्माण हेतु 3.5 एकड़ भूमि दान में दी थी और 3 अप्रैल 1949 को पंडित नेहरु द्वारा इस संस्थान की नींव रखी गयी | इस शुभावसर पर विश्व के अनेक वैज्ञानिकों की ओर से बधाइयो और शुभकामना संदेश प्राप्त हुए किन्तु दुर्भाग्यवश इस संस्था को तब बड़ा आघात पहुचा जब 10 अप्रैल 1949 को अर्थात स्थापना के ठीक एक सप्ताह बाद प्रो.साहनी (Birbal Sahni) का सहसा निधन हो गया | उनकी स्मृति में विज्ञान के विविध क्षेत्रो में सराहनीय कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को बीरबल साहनी स्मृति पुरुस्कार प्रदान किये जाते है |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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