
लालपुर नामक शहर में एक राजा कौशलध्वज राज करता था | राजा के महल के पास एक डूंगरी थी | डूंगरी पर कोई आता जाता तो महल के रखवाले को दिखाई दे जाता था | बिना राजा के हुक्म के डूंगरी पर कोई जा नही सकता था | एक दिन राजा ने महल में जाते देखा कि डूंगरी पर आग जल रही है | राजा ने मंत्री को बुलाकर पूछा कि डूंगरी पर कौन है ? राजा से कोई हुक्म नही लिया गया था | राजा ने कहा कि मै खुद जाकर पता लगाऊंगा | राजा डूंगरी पर चढ़ गये और उपर जाकर देखा तो बाबा गोरखनाथ जी समाधि में बैठे है और बगल में मोटे मोटे लक्कड़ जल रहे है |
राजा हाथ जोडकर एक पाँव पर खड़े हो गये | सेवा चाकरी की | गोरखनाथ जी ने पलक उठाया तो देखा राजा खड़ा है | गोरखनाथ जी बोले “राजा मांगो , मै तुम्हे क्या दु ?” राजा ने अरज की कि महाराज आपके प्रसाद से सब सुख की दौलत है परन्तु मेरे पुत्र नही है | आपकी कृपा दृष्टि हो जाए तो एक पुत्र का वरदान दीजिये | गोरखनाथ जी ने एक गुलाब की छड़ी राजा को दी और कहा कि राजा यह छड़ी रानी के सिरहाने रख देना , तुम्हारी इच्छा पुरी हो जायेगी |
राजा ने यही किया | रानी की आशा बंध गयी और नौवे महीने उसने एक पुत्र को जन्म दिया | राजा ने बच्चे की देखभाल करने के लिए बांदिया रख दी और धाय भी रखी | बालक बड़ा होने लगा | वह दो साल का हुआ तो चार साल का सा लगता है | जब पांच साल का हुआ तो आठ का सा लगता था | बालक को हथियार चलाना सिखानेवाले भी रख दिए | विद्या सिखाने वाले तो थे ही | दिन बीतते जाते | जब कुँवर चौदह साल का हुआ तो आस-पास के राजाओं की तरफ से नारियल आने लगे | राजा मान की बेटी का नारियल आया और वह राजा कौशल ने मान लिया |
कुंवर को शिकार का बहुत शौक हो गया | जंगल के पास तम्बू लग गये उअर कुंवर ज्यादातर वही रह जाता और कुंवरानी भी | एक दिन दोनों तम्बू में बैठे थे कि थोड़ी दूर पर एक अच्छा जंगली सूअर जाता दिखाई पड़ा | कुंवर ने झट घोडा तैयार करके सूअर के पीछे लगा दिया | सूअर कभी सामने दिखलाई पड़ता , कभी छिप जाता | यों करते करते दोनों बहुत दूर निकल गये | दिन ढलने लगा तो हठात सूअर खोली बदल एक दैत्य हो गया | राजकुमार हिम्मतवाला था | उसने दैत्य को ललकार पूछा कि वह कौन है | दैत्य बोला “मै यही के नगरी में रहने वाला हु पर तुम कौन हो”|
कुंवर ने अपनी बात बताई | तब दैत्य ने कहा कि तुम क्यों जंगल में इस तरह पड़े हो ? तुम्हे एक बड़ी नगरी दिखाता हु | वहा आराम करो | वहा से काफी दूर एक शहर था | कुंवर वही पहुचा | देखा तो वहा बड़े बड़े आलीशान मकान थे पर सब खाली पड़े थे | कुंवर सोचने लगा कि क्या बात है कि मकान सभी सुने पड़े है | इस शहर में एक भी मनुष्य नही है | दैत्य ने कहा “मानव तुम किस विचार में पड़ गये | यह नगर तो एक दैत्य के पेट में पड़ गया और वह दैत्य मै ही हु | कई दिनों से कोई मनुष्य नही मिला | जंगल में भोजन की तलाश में बहुत दूर तक जाना पड़ता है आज तुम घर बैठ मिले गये”
यह कहकर दैत्य राजकुंवर पर टूट पड़ा | कुंवर तैयार था | दोनों में युद्ध होने लगा | रातभर लड़ते रहे | ज्यो ज्यो रात ढलने लगी , त्यों,त्यों दैत्य की शक्ति कम होने लगी | अंत में राजकुमार ने दैत्य को मार दिया | अब राजकुमार ने तय किया कि क्यों न यही रहने लगु | वह राजकुमारी को ले आया और दोनों वही महल में रहने लगे | एक दिन राजकुमार शिकार पर जाने के लिए घोडा कसने लगा तो देखा सामने दैत्य खड़ा है | राजकुमार ने दैत्य को ललकारा | दैत्य ने बोला कि तुमने मेरे भाई को मार दिया , उसी का बदला लेने आया हु | दोनों में युद्ध छिड गया | राजकुमार ने दैत्य को पछाड़ दिया | उसके हाथ बांधकर महल में ले गया और कोठरी में बंद कर दिया |
राजकुमार दिन में शिकार पर जाता , राजकुमारी महल में अकेली रहती | राजकुमारी को दिनभर का समय भारी पड़ने लगा | राजकुमारी ने एक दिन दैत्य की कोठरी खोली और दैत्य को निकाला | दिन में राजकुमार शिकार पर जाने के बाद राजकुमारी दैत्य के साथ चौपड़ खेलती | शाम को राजकुमार के लौटने से पहले दैत्य को कोठरी में बंद कर देती | राजकुमारी दैत्य से हिल-मिल गयी | दैत्य ने समय देखकर राजकुमारी से एक दिन कहा रोज आपको खोलने बंद करने का झंझट रहता है | यदि हम लोग रात-दिन साथ रहे तो आपको भी आराम रहेगा और मुझे भी राजकुमार का डर नही रहेगा | आपका समय कट जाएगा | कुंवरानी ने पूछा यह कैसे होगा ? दैत्य ने बताया कि अगर राजकुमार को किसी बहाने ऐसी जगह भेज दिया जाए , जहा से वह लौट न सके तो हम चैन से रहेंगे |
दैत्य ने बताया कि अपनी आँख में बड़े जोर के दर्द का बहाना कर उसे अमृत लाने भेज दे तो अमृत के रखवाले राजकुमार का काम तमाम कर देंगे | शाम को राजकुमार जब लौटा तो कुंवरानी बड़े जोर से कराहने लगी | उसने राजकुमार को बताया कि यह दर्द तभी ठीक हो सकता है जब आँखों में अमृत की बूंद डाली जाए | राजकुमार ने कहा कि वह फौरन अमृत की खोज में जाएगा | दुसरे दिन राजकुमार अमृत की खोज में चल पड़ा | चलते चलते एक शहर में पहुचा | शहर में उसने सुना कि वहा कई राजा आये हुए है | राजकुमारी इंदुमती का स्वयम्वर है | राजकुमार ने निश्चय किया कि वह भी स्वयम्वर में शामिल होगा |
स्वयम्वर में तीन कड़े रखे गये | सबसे आगे का कडा बड़ा , दूसरा उससे छोटा और तीसरा कडा राजकुमारी के हाथ का था | शर्त यह थी कि जिसका तीर तीनो कड़ो के अंदर से निकल जाएगा , राजकुमारी उसे ही अपना पति चुनेगी | जब सब राजा हार गये , किसी का निशाना नही लगा तो राजकुमार आगे आया | वहा से महाराज की आज्ञा से उसने भी निशाना लगाया | राजकुमार धनुर्विद्या में निपुण था और उसका तीर तीनो कड़ो को पार कर दुसरी तरफ निकल गया | राजकुमारी ने उसे माला पहना दी | एक दिन वहा रहकर राजकुमार ने आगे जाने का निश्चय किया | उसने राजकुमारी इंदुमती को सारी बात बताई | इंदुमती ने राजकुमार को राजी कर लिया कि लौटते समय वह उससे मिलकर जाएगा |
दुसरे दिन राजकुमार अमृत की खोज में चल पडा | शाम को वह एक जंगल के किनारे पहुचा | वहा एक बरगद का पेड़ था | राजकुमार ने वही रात का बसेरा किया | उस पेड़ पर एक हंस रहता था | हंस और हंसनी मोती चुगने चले जाते , उनके बच्चे अकेले रहते | उस पेड़ के पास एक अजगर रहता था | अजगर उस पेड़ पर चढकर बच्चो को खा जाता था | उस रात फिर अजगर चढ़ा , हंस के बच्चे चिल्लाने लगे | राजकुमार ने उपर देखा तो अजगर उपर चढ़ते दिखाई दिया | राजकुमार ने तलवार से अजगर का काम तमाम कर दिया |
दाना-पानी चुगकर हंस और हंसनी लौटे तो राजकुमार को देखकर उन्होंने सोचा कि यह कोई हमारे बच्चो को मारने आया है | हंस और हंसनी राजकुमार पर झपटने को तैयार हुए तो बच्चे चिल्लाये कि राजकुमार ने तो उनकी रक्षा की है उसकी हमे मदद करनी चाहिए | हंस ने राजकुमार से पूछा कि हम आपकी क्या मदद कर सकते है | राजकुमार ने कहा कि हम तो अमृत की खोज में निकले है पर अभी तक यह भी पता नही लगा कि अमृत कुंड कहा है | अगर आप हमारी मदद कर सके तो करिये |
हंस ने कहा कि अमृत कुंड कहा है यह तो हमे पता है किन्तु वहां देवताओं का जबरदस्त पहरा है | कुंड के आसपास भी कोई पहुचता है तो उसको मार देते है लेकिन अब हमे कोई तदबीर करनी ही पड़ेगी | दुसरे दिन सुबह कुछ न कुछ सोचकर रास्ता निकालेंगे | दुसरे दिन हंस ने कहा कि आप घोड़े को तो यही छोड़े और एक स्वर्ण पात्र में हजार गज लम्बी रेशम की डोरी बांध मेरी पीठ पर चढ़ जाए | मै कुंड के पास पहुचकर थोडा नीचे आ जाऊँगा | आप झट से पात्र को अमृत कुंड में फेंक दे और तुरंत वापस खींच ले | आपको जितना अमृत जरुरी हो , उसमे आ जाएगा और कुछ ही देर बाद मै वापस ऊँचा उड जाऊँगा |
राजकुमार ने हंस की बताई तरकीब मान ली | हंस और राजकुमार अमृत कुंड की तरफ उड चले | जैसा हंस ने बताया राजकुमार ने स्वर्ण पात्र को अमृत कुंड में फेंक दिया और तुंरतरस्सी खींच ली | राजकुमार को काफी अमृत मिल गया | अब राजकुमार ने वापस लौटने की तैयारी की | हंस ने राजकुमार को ढेर सारे मोती दिए और अपने एक बच्चे को साथ में कर दिया कि यदि राजकुमार को कभी कोई तकलीफ आये तो वह आकर हंस को खबर कर देगा | दुसरे दिन राजकुमार इन्दुमती के पास पहुचा | राजकुमार ने राजकुमारी को सारी बाते बता दी और दुसरे दिन उससे विदा लेने की तैयारी की |
राजकुमारी समझ गयी कि कुंवरानी की नीयत अच्छी नही है | उस रात को इंदुमती ने स्वर्ण पात्र से अमृत निकालकर अपने पास रख लिया और बदले में पानी भर दिया | राजकुमार को लौटा देखकर कुंवरानी और दैत्य अचम्भित हो गये | दोनों ने सलाह कर अब निश्चय किया कि राजकुमार का यही काम तमाम कर देना चाहिए | कुंवरानी ने राजकुमार से कहा कि कोई शर्त रखकर चौपड़ की बाजी खेले | राजकुमार ने कहा कि तुम्हारा मन बदलता हो तो शर्त का बहाना बनाकर बाजी खेले | कुंवरानी ने जो हारे उसका शीश काटने की शर्त रखी | राजकुमार ने यह शर्त मंजूर कर ली |
पहली बाजी राजकुमार जीत गया | उसने कुंवरानी को माफ़ कर दिया | दूसरी बाजी भी राजकुमार जीत गया | तीसरी बाजी में राजकुमार ने कुंवरानी को जीता दिया | अब कुंवरानी राजकुमार का शीश काटने की तैयारी करने लगी | राजकुमार भौचक्का सा रह गया | कुंवरानी ने उसके सारे हथियार ले लिए और राजकुमार को घुटनों के बल बैठाकर तलवार उठाई | राजकुमार कुछ बोले ,उससे पहले ही कुंवरानी ने तलवार चला दी | राजकुमार का सिर नीचे जा गिरा |
कुंवरानी ने दैत्य से कि राजकुमार का सिर और शरीर एक पेटी में बंद करके नदी में बहा दे | नदी राजकुमारी इंदुमती के बाग़ के सामने से जाती थी | इंदुमती अपने बाग़ में सहेलियों के साथ खेल रही थी | सामने से एक पेटी को बहते देखकर उसने अपने आदमियों को हुक्म दिया कि उसे निकाल ले | पेटी को खोलते ही राजकुमार का मृतक शरीर देखकर राजकुमारी सन्न रह गयी किन्तु तुरंत ही उसे अमृत की याद आ गयी | इंदुमती ने अमृत मंगाकर राजकुमार के शरीर पर छींटे दिए | राजकुमार जी उठा और इंदुमती से सलाह करके निश्चय किया कि कुंवरानी और उसके दैत्य का काम तमाम कर देना ही उचित होगा और वह शहर की तरह चल पड़ा | साथ में इंदुमती भी चली |
शहर पहुचकर उन्होंने देखा कि दैत्य और कुंवरानी चौपड़ खेल रहे थे और आनन्द मना रहे थे | सामने से राजकुमार को आते देखकर दोनों देखते रह गये | राजकुमार ने दोनों का कत्ल कर दिया | अब राजकुमार को वापस अपने राज में जाने की उत्कंठा हो गयी | इंदुमती ने भी यही राय दी | जाने से पहले राजकुमार आस-पास के गाँवों में जाकर इस बड़े शहर में सभी को रहने का निमन्त्रण दे आया , जिससे कि यह शहर सुना न रह जाए |
शुभ मुहूर्त देखकर वे राजकुमार के राज की तरफ चल पड़े | उधर राजकुमार के जाने के बाद कुछ दिन राजा कौशलध्वज और रानी ने राजकुमार के आने की राह देखी | जब इतने दिनों तक राजकुमार नही लौटा तो उन्हें चिंता होने लगी | राजा ने जगह-जगह राजकुमार को खोजने अपने आदमी भेजे , पर राजकुमार का कही पता न चला | राजा कौशलध्वज और रानी निराश हो गये | राज-काज मंत्रियों पर छोडकर राजा भगवत भजन में लग गये | शहर में लोगो में भी मुर्दनी सी छा गयी | सबका उत्साह मंद पड़ गया |
राजकुमार ने कांकड (सरहद) पहुचते ही यह खबर बिजली की तरह सारे राज में फ़ैल गयी | लोग दौड़-दौडकर राजकुमार को देखने के लिए इकट्ठे हो गये | राजा कौशलध्वज पूजा में बैठे थे वहां भी खबर पहुच गयी | राजा और रानी जल्दी जल्दी चलकर द्वार पर आकर खड़े हो गये | दोनों बड़ी उत्सकुता से राजकुमार के आने की राह देखने लगे | राजकुमार ने भी दूर से ही राजा-रानी को द्वार पर खड़े देखा | वह घोड़े से उतरकर द्वार की तरफ दौड़ा और जाकर अपने पिता के पैर पकड़ लिए | राजकुमार को जनता भी बहुत चाहती थी | जगह जगह लोग बड़ी खुशी से उत्सव मनाने लगे | रानी इंदुमती को देखकर गदगद हो गयी और उसने अपनी बाहों में भरकर खुशी के मारे आंसू बहाने लगी | राजा ने कुंवर को गद्दी पर बैठा दिया और स्वयं भगवत भजन में लग गये |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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