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मैडम मेरी क्युरी की जीवनी | Marie Curie Biography in Hindi

Marie Curie Biography in Hindi
Marie Curie Biography in Hindi

मादाम मैरी क्युरी (Marie Curie) का जन्म 7 नवम्बर 1867 को वारसा , पोलैंड में उन दिनों हुआ जब पश्चिमी देशो में महिलाओं को उच्च शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नही था | किन्तु मादाम ने भागीरथ प्रयास करके पुरुषो के समान उच्च शिक्षा ग्रहण की | इन्होने रेडियम का अविष्कार करके इतनी ख्याति अर्जित की कि जितनी शायद किसी अन्य महिला ने न की होगी | पोलैंड की राजधानी वारसा में जन्मी इस महिला का बाल्यकाल में नाम स्कलोदोवस्का था किन्तु बाल्यकाल में इनको मान्या नामा से पुकारा जाता था | कालान्तर में पियरे क्युरी नामक वैज्ञानिक से विवाह कर लेने के पश्चात वे मैडम क्युरी के नाम से विख्यात हुयी |
मान्या के माता-पिता अध्यापक थे इसलिए इनका बाल्यकाल शिक्षा के वातावरण में ही व्यतीत हुआ था | 16 वर्ष की आयु में इन्होने हाईस्कूल उत्तीर्ण किया जिसमे असाधारण योग्यता का प्रदर्शन करने के लिए इनको स्वर्ण पदक प्रदान किया गया | मैरी (Marie Curie) चाहती थी कि वह विज्ञान विषय लेकर विश्वविद्यालय में अध्ययन करे किन्तु वारसा विश्वविद्यालय में उन दिनों महिला छात्रों को प्रवेश नही दिया जाता था | माता-पिता साधारण अध्यापक थे जिससे घर का निर्वाह हो रहा था | उन दिनों पोलैंड पर रूस का शासन था अत: वारसा वासियों को दबाकर रखा जाता था देशभक्ति राजद्रोह मानी जाती थी उअर उसी देशभक्ति के कारण मान्या के पिता की नौकरी चली गयी थी |
माँ बीमार रहती थी | परिवार का निर्वाह होना कठिन हो गया था | मान्या की एक बड़ी बहिन थी जिसका नामा ब्रोन्या था वह भी उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना चाहती थी | दोनों ने ट्यूशन पढ़ाकर विदेश जाने के लिए धन एकत्रित करना आरम्भ कर दिया |
कालान्तर में पहले ब्रोन्या और फिर मान्या वारसा से पेरिस चले गये | पेरिस में सादान विश्वविद्यालय से मान्या ने विज्ञान में स्नाकातोतर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया | ब्रोन्या भी पढाई करती रही और इसी बीच उसकी उसके सहपाठी कैसीमीर द्लुस्की से घनिष्ठता हो गयी और कालान्तर में दोनों विवाह बंधन में बंध गये | वही स्थिति मान्या की भी थी | परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मैरी के किसी मित्र ने उसका परिचय प्रसिद्ध वैज्ञानिक पियरे क्युरी से करवा दिया | पहली दृष्टि में ही दोनों एक दुसरे को चाहने लगे थे दोनों में गहन मित्रता हुयी और कालान्तर में दोनों ने परस्पर विवाह कर लिया |
मैरी (Marie Curie) उस समय विश्वविद्यालय में अनुसन्धान भी कर रही थी | यथासमय उसने अपना अनुसन्धान पूरा कर राष्ट्रीय उद्योग प्रोत्साहन समिति को सौंप दिया | विभिन्न इस्पातो में चुम्बकीय शक्ति पर किया गया यह महत्वपूर्ण अनुसन्धान था | मैरी को विश्वविद्यालय में कार्य करने के लिए फेलोशिप मिल गयी | उसे डॉक्टरेट के लिए किसी किसी विषय पर काम करना था | उस समय एक्स किरणों की खोज हो चुकी थी | एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक प्रो. बैकरेल ने पता लगाया था कि युरेनियम से जो किरने निकलती है वे युरेनियम को महीनों अँधेरे में रखने के बावजूद भी नष्ट नही होती | किन्तु यह विकिरण किस प्रकार होता है इसकी अभी तक खोज नही हो पायी थी | मैरी को लगा था कि इस विषय पर कार्य करना उचित होगा | अपने वैज्ञानिक पति का सहयोग उसको प्राप्त था |
मैरी (Marie Curie) उस समय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बैकरेल की सहायिका के रूप में कार्य कर रही थी | इन किरणों के रहस्यमय स्त्रोत को खोज निकालने का दृढ़ निश्चय करके मैरी ने प्रो.बैकरेल की सहायिका के रूप में अपने पद से त्यागपत्र दे दिया | मैरी क्युरी ने ज्यो ज्यो अपना अनुसन्धान आगे बढाया युरेनियम की किरणों के बारे में महत्वपूर्ण परिणाम ज्ञात होने लगे | उसके मन में जिज्ञासा हुयी कि क्या किसी अन्य धातु से भी इस प्रकार की किरन निकलती है ? उन्होंने युरेनियम पर खोज बंद करके अन्य धातुओ पर कार्य करना आरम्भ किया | पता लगा कि थोरियम धातु से यौगिको से भी किरने निकलती है फिर पिचब्लेड नामक धातु पर काम किया | पता चला कि इसमें युरेनियम और थोरियम से भी अधिक शक्तिशाली किरने निकलती है | इस विकिरण की क्रिया को मैरी ने नाम दिया “रेडियो एक्टिविटी” |
मैरी (Marie Curie) पिचब्लेड धातु के ओर भी अनुसन्धान करना चाहती थी इसके लिए पति पियरे ने अपना काम रोककर मैरी का साथ देना आरम्भ कर दिया | अपनी प्रयोगशाला में महीनों तक दोनों पति-पत्नी काम करते रहे | नवम्बर 1898 की एक रात को पिचब्लेड से प्राप्त पदार्थ को उन्होंने एक परखनली में रख छोड़ा था | कुछ देर आराम करने के उपरांत जब उन्होंने अपनी प्रयोगशाळा का द्वार खोला तो देखा कि अँधेरे कमरे में एक कोने से उनकी उस परखनली का हल्का नीला प्रकाश सा दिखाई दे रहा है | यह बड़े रहस्य की बात थी | मोमबत्ती जलाते ही प्रकाश की वह चमक लुप्त हो गयी | उन्होंने इस तत्व का नाम रेडियम रखा | इस कार्य के लिए इन दोनों पति-पत्नी और बैकरेल को सम्मिलित रूप से सन 1903 का नोबेल पुरुस्कार प्रदान किया गया | क्युरी दम्पति का नाम सारे विश्व में फ़ैल गया | अब उनको रेडियम का माता-पिता कहा जाने लगा था |
जब अन्य देशो में रेडियम उत्पादन करने की विधि और अनुमति माँगी तो क्युरी दम्पति ने कहा “यह हमारी व्यक्तिगत सम्पति नही है सार्वजनिक कल्याण की कामना से हमने रेडियम की खोज की है इसकी विधि हम समाचार पत्रों में प्रकाशित कर देंगे जिससे अनुसन्धानकर्ता इसे जान सके” | मैरी क्युरी ने अपना शोध जारी रखा और जब 25 जून 1903 को उन्होंने अपना शोध प्रबंध विश्वविद्यालय को सौंपा तो निर्णायको ने उन्हें डॉक्टर ऑफ़ फिजिकल साइंस की उपाधि से विभूषित किया | सन 1905 में मैरी क्युरी को सारबोन विश्वविद्यालय में विज्ञान प्रयोगशाला की निदेशक पद पर नियुक्त कर दिया गया |
19 अप्रैल 1906 को एक सडक दुर्घटना में उनके पति का देहांत हो गया | मैरी क्युरी ने इस आघात को बड़ी कठिनाई से सहन किया | अब उनके मन में यह आने लगा कि वे अपने पति के अधूरे छोड़े अनुसन्धान कार्य को पूर्ण करे | मैरी के कन्धो पर अब गृहस्थी , प्रोफेसर का काम , प्रयोगशाळा के निदेशक का काम , शोध कार्य आदि का बोझ पड़ने लगा , किन्तु वे अपना उत्तरदायित्व बड़ी लगन से निभा रही थी | सन
1911में मैरी क्युरी को रेडियम प्रयोगशाळा का प्रमुख बनाया गया | 20 मई 1921 को अमेरिकी राष्ट्रपति हार्डिज ने वाइट हाउस में आयोजित एक समारोह में मैरी को एक ग्राम “रेडियम” भेंट किया | राष्ट्रपति ने मैरी को श्रेष्ट मानते हुए उन्हें एक आदर्श पत्नी और आदर्श माँ कहकर संबोधित किया था |
मैडम क्युरी (Marie Curie) ने पेरिस में क्युरी इंस्टिट्यूट ऑफ़ रेडियम की स्थापना की | इन्ही के नाम पर रेडिओधर्मिता की इकाई का नाम क्युरी रखा गया | क्युरी को सम्मान प्रदान करने के लिए एक तत्व का नाम क्युरियम रखा गया | मैरी आजीवन रेडियोधर्मी पदार्थो के सम्पर्क में रही | इससे उनकी आँखे खराब हो गयी | इसी के कारण उन्हें रक्त कैंसर रोग ने भी घेर लिया और विज्ञान की यह साधिका 4 जुलाई 1934 को इस संसार से सदा के लिए विदा हो गयी |

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