
उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से करीब 60 किमी दूर समुद्र-तट पर स्थित पुरी (Puri) भारत का परम पावन तीर्थ स्थल है | यहाँ का जगन्नाथ मन्दिर विश्वविख्यात है | बारहों महीने में जगन्नाथ , बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं के दर्शनार्थ लाखो की संख्या में देश-विदेश से लोग यहाँ आते रहते है | पुरी (Puri) में गुजरते हुए समुद्र का दृश्य मन में ओजस्वी भावो का संचार करता है | यहाँ के घने जंगल शीशम , सखुआ , सागवान आदि कीमती लकडियो वाले वृक्षों से आच्छादित है | पहाडी क्षेत्र खनिज सम्पदा से परिपूर्ण है | लोहा , लौह पत्थर , कोयला , मैगनीज और बोक्साईट यहाँ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है | केपुझार और सुन्दरगढ़ में मैगनीज ; तालघर और रायपुर में कोयला ; सुंदरगढ़ ,केंचुअर और मयुरभंज में कोयला पाया जाता है | कागज , सीमेंट , अलुमिनियम , कांच ,चीनी और लोहे के बड़े बड़े कारखाने यहा है | राऊकरेला का इस्पात कारखाना विश्वप्रसिद्ध है |
जगन्नाथ पुरी (Puri) की रथयात्रा विश्वप्रसिद्ध है | कहते है प्राचीनकाल में पुरी को पुरुषोत्तम क्षेत्र और श्री क्षेत्र भी कहा जाता था | ऐसी मान्यता है कि भगवान बुद्ध का यहाँ दांत गिरा था इसलिए इसे कभी दंतपुर भी कहा जाता था | पुराने ढंग की बनावटवाले और संकरी गलियों से घिरे नगर के मुख्य आकर्षण है जगन्नाथ जी का मन्दिर , अन्य छोटे-बड़े मन्दिर , समुद्र तट , चिलका झील आदि |
जगन्नाथ मन्दिर
पुरी (Puri) हिन्दुओ का परम पवित्र और महान तीर्थ है | यहाँ जगन्नाथ का प्राचीन और एतेहासिक मन्दिर है | मन्दिर के अंदर जगन्नाथ , बलभद्र और सुभद्रा की मुर्तिया है | पश्चिमी समुद्र-तट के अनंत विस्तार से लगभग 1.5 किमी दूर उत्तर निलिगिरी पर स्थित 665 फीट लम्बे और इतने ही चौड़े घेरे में , 22 फीट ऊँची दीवारों के बीच यह मन्दिर स्थित है | इस मन्दिर की हर दीवार में , हर दिशा में एक-एक फाटक है |
मन्दिर के पश्चिम में 16 फीट लम्बी और 4 फीट ऊँची रत्नवेदी पर सुदर्शन रखा हुआ है | मन्दिर के सिंहद्वार तक जानेवाली 45 फीट चौड़ी सड़क पर यात्रियों और पर्यटकों की भारी भीड़ हमेशा देखी जा सकती है | बारहवी शताब्दी में नरेश चोडगंग द्वारा निर्मित यह मन्दिर कृष्णवर्ती पाषानो को तराशकर बनाया गया है | मन्दिर के दक्षिण में अश्वद्वार , उत्तर में गजद्वार और पश्चिम में बाघद्वार है | पूर्व का सिंहद्वार सर्वाधिक सुंदर है | इसके ठीक सामने गरुड़ स्तम्भ है जिस पर सूर्य की प्रतिमा प्रतिष्टित है | स्थापत्य कला की दृष्टि से मन्दिर के चार भाग है भोग मंडप , नृत्य मंडप , जगमोहन मंडप और मुख्य मंडप |
भोग मंडप में भक्तजन को महाप्रसाद मिलता है | नृत्य मंडप में आरती के समय वाध्य यंत्रो की धुन पर भक्तजन नृत्य करते है | जगमोहन मंडप में दर्शक बैठते है | इस मंडप की दीवारों पर बहुत ही सुंदर चित्राव्लिया अंकित की गयी है | मन्दिर के रसोईघर में प्रतिदिन हजारो व्यक्तियों के लिए भोजन तैयार होता है | विश्व की विशालतम पाकशाला है | सूखे भात का प्रसाद यहाँ का मुख्य प्रसाद है |
मन्दिर में जगन्नाथ , श्रीकृष्ण और सुभद्रा की मूर्तियों की प्रतिष्टा के संबध में एक मर्मस्पर्शी एवं रोमाचंक कथा प्रचलित है | कहा जाता है कि बारहवी शताब्दी में कलिंग के राजा चोडगंग को श्रीकृष्ण ने एक रात स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि आप एक मन्दिर बनवाये और उसमे किसी योग्य मूर्तिकार से देवरारु की लकड़ी से मुर्तिया बनवाकर प्रतिष्टित करे | अंतत: एक कुशल मूर्तिकार मिल गया और वह राजा के साथ जंगल में जाकर देवदार की लकडिया ले आया | उसने रजा से कहा कि मै एकांत कमरे में अंदर से दरवाजा बंद कर मूर्तियों को बनाऊंगा | जब तक मुर्तिया बन न जाए तब तक कोई अंदर न आये ,राजा भी नही | राजा ने मूर्तिकार की शर्त मान ली |
अंदर से दरवाजा बंद क्र मूर्तिकार मुर्तिया गढने लगा | हर समय अंदर से खट-खट की आवाज होती रहती थी | इस प्रकार बहुत दिन गुजर गये किन्तु मूर्तिकार बाहर नही आया और अंदर से खट-खट की आवाज आती रही | अंतत: राजा से नही रहा गया | वह अपना धैर्य खो बैठा | उसने दरवाजा खटखटाया लेकिन अंदर से कोई आवाज नही आयी | न दरवाजा खुला न मूर्तिकार बाहर आया | राजा बार कहता रहा “मूर्तिकार दरवाजा खोलो” लेकिन अंदर से कोई आवाज नही आयी सिर्फ खत खट होती रही |
राजा से न रहा गया | उसे क्रोध आ गया – मेरी आज्ञा की अवहेलना | उसने दरवाजा तोड़ दिया | किन्तु आश्चर्य वहा कोई न था राजा हतप्रभ देखता रहा | तीनो मुर्तिया अर्धनिर्मित पड़ी थी | मूर्तिकार बन्द दरवाजे से कैसे कहा चला गया कहा जाता है मूर्तिकार के रूप में स्वयं श्रीकृष्ण भगवान ही थे | मन्दिर में आज भी वे ही तीनो अर्धनिर्मित मुर्तिया प्रतिष्टित है | कहा जाता है भगवान सिर्फ भोजन करने इस मन्दिर में आते है शेष समय द्वारिका में विश्राम करते है |
ये मुर्तिया उड़िया शैली से निर्मित काष्ट प्रतिमाये है | प्रतिवर्ष पुराणी मूर्तियों को गलाकर नई लकड़ी की मुर्तिया बनाई जाती है | पुजारी आँखों पर पट्टी बांधकर मूर्ति के अंदर शालग्राम और अन्य वस्तुए रख देते है | एक प्रवेश द्वार पर 40 फीट ऊंचा पत्थर का स्तम्भ है | ईद मन्दिर में छुआछूत और जात-पात का भेदभाव नही है सभी जातियों के लोग एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते है |
अन्य दर्शनीय स्थल
साक्षी गोपाल मन्दिर – पुरी से 25 किमी दूर साक्षीगोपाल मन्दिर है | इस मन्दिर में श्रीकृष्ण की मूर्ति दर्शनीय है | मन्दिर के समीप ही अत्यंत मनोरम वाटिका भी है जो पर्यटकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेती है |
चिलका झील – पुरी के दक्षिण-पश्चिम में स्थित इस झील में नौका विहार का आनन्द लिया जा सकता है | यहाँ 160 प्रकार की मछलिया पायी जाती है | यह बहुत ही मनोरम पिकनिक स्थल भी है | 1100 वर्ग किमी में विस्तृत इस झील को हनीमून आइलैंड भी कहा जाता है |
समुद्रतट – पुरी के समुद्रतट को गोल्डन बीच भी कहा जाता है | समुद्र तट के पास अनेक होटल और गेस्ट हाउस है | यहाँ से समुद्र तट की उठती गिरती लहरों को देखना बड़ा अच्छा लगता है | यहाँ तैराकी का भी आनन्द लिया जा सकता है |
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