
रंगरंगीले राजस्थान के हृदय स्थल में स्थित अजमेर (Ajmer) , जयपुर के पश्चिम में लगभग 135 किमी की दूरी पर है | सातवी शताब्दी में राजा अजयपाल चौहान ने इसे बसाया था एवं 12वी शताब्दी तक अजमेर (Ajmer) पर चौहानों का प्रभुत्व रहा | पृथ्वीराज चौहान यहाँ का अंतिम हिन्दू शासक हुआ जिसके काल में अजमेर (Ajmer) को राजधानी बनने का अवसर मिला |
अजमेर (Ajmer) पर मेवाड़ के राणा कुम्भा , मालवा के मुस्लिम शासको का भी कब्जा रहा था | जिन्हें मारवाड़ के मालदेव राठौड़ ने निकाल बाहर किया था | बाद में अकबर ने अपने गुजरात एवं राजपुताना के अभियानों के लिए 1556 ई. में अजमेर को अपना मुख्यालय बनाया था | यही शाहजहाँ के पुत्र दाराशिकोह का जन्म हुआ था |
आज जिस भवन में राजकोष संग्रहालय है उसे कभी अकबर ने अपने विश्राम स्थल के रूप में बनवाया था | इसी इमारत में अंग्रेज राजपूत सर थॉमस रों ने मुगल बादशाह जहांगीर से सन 1616 में पहली मुलाकात कर भारत में व्यापार करने की इजाजत एवं कुछ रियासते माँगी थी | अजमेर (Ajmer) जिस पठारी भाग पर स्थित है वह घुमावदार अरावली पर्वत श्रेणी की तलहटी में बसा हुआ है जो समुद्रतल से 1300 फुट की ऊंचाई पर है |
अरावली पहाडियों के बीच बसे अजमेर (Ajmer) का पुराना नाम अजयमेरु है | | धार्मिक , सांस्कृतिक और शैक्षिक दृष्टि से यह भारत का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और दर्शनीय शहर है | पर्यटकों के लिए भी यह आकर्षण का केंद्र है | यह शहर मुख्यत: चौहान , राजपुर , मुगल ,मराठा एवं अंग्रेज शासको की शासन प्रणाली और समृद्ध कला-कौशल का साक्षी है | यहाँ की प्राकृतिक सुषमा से मुग्ध कर देने वाले दर्शनीय स्थलों की कमी नही है |
मुसलमानों का यहाँ पवित्र तीर्थ है जिसे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कहते है | यहाँ प्रतिवर्ष उर्स के अवसर पर दरगाह पर मत्था टेकने , चादर चढाने और मन्नते-दुआ मांगने के लिए देश के कोने कोने से बड़ी संख्या में हिंदुआ और मुसलमान आते है | साथ ही पवित्र पुष्कर झील में विशेष अवसरों पर लाखो हिन्दू श्रुधालू स्नान कर पूण्य लाभ करते है | यहाँ की हिन्दू-मुस्लिम एकता साम्प्रदायिक सद्भाव का आदर्श उदाहरण है |
अजमेर (Ajmer) के दर्शनीय स्थल
ख्वाजा साहब की दरगाह | Khwaja Dargah
अजमेर (Ajmer) के मध्य में गरीबनवाज एवं दरगाह शरीफ के नाम से प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (सन 1143-1233) की इस दरगाह में मजार है | दरगाह में प्रवेश के लिए चारो ओर दरवाजे है | मुख्य दरवाजा बहुत बड़ा है इतना ऊँचा कि सिर उठाकर देखिये तो टोपी गिर जाए | सबसे ज्यादा आकर्षक दरवाजा ,जिसे निजाम गेट कहा जाता है मुख्य बाजार में है | उस्मानी दरवाजे से कुछ दूर शाहजहाँ का बनवाया पुराने ढंग का दरवाजा है | दांयी ओर यात्रियों के लिए विश्रामालय ,अकबरी मस्जिद , फिर सामने बुलंद दरवाजा है | इसके सामने गुम्बदनुमा छतरी है |
यहाँ पुराने डिजाईन का पीतल का चिराग है जिसे सोहन चिराग कहते है | सोहन चिराग के पश्चिम में बशीरुद्दोला का बनवाया महफिलखाना औउर पूर्व की ओर के फाटक से एक दालान शुरू होता है जो लंगरखाना है | बांयी तरफ संगमरमर की एक छोटी सी मस्जिद है आलिया मस्जिद | आलिया मस्जिद के पास ही ख्वाजा नमाज पढ़ते थे| मजारे एकादश के पश्चिम में शाहजहाँ की बनवाई शाहजहानी मस्जिद है | पूर्व की तरफ गुम्बद शरीफ के चारो ओर तीन तरफ से खुला दालान है जिसे शहजादी जंहाआरा ने बनवाया था |
आना सागर | Aana Sagar Lake , Ajmer
बंजरगढ़ और खोबड़ा भैरवनाथ मन्दिर के बीच सन 1135-40 में अर्नोराज चौहान द्वारा मोटी पाल डालकर बनवाई इस खुबसुरत झील के पूर्वी छोर पर जहागीर ने एक बाग़ लगवाया था | इसे पहले दौलत बाग़ और अब सुभाष बाग़ के नाम से जाना जाता है | सन 1637 में शाहजहाँ ने इसकी पाल पर सफेद संगमरमर की 5 बाहरदरिया बनवाई | यहाँ नौका विहार का आनन्द लिया जा सकता है | झील के बीच टापू तथा किनारे पर खुबसुरत बाग़ है |
ढाई दिन का झोपड़ा | Dhai Din ka Jhopda
ख्वाजा साहब की दरगाह से कुछ ही दूरी पर सुल्तान सहाबुद्दीन गौरी ने इस इमारत का निर्माण करवाया था | कहते है यह इमारत पहले संस्कृत पाठशाला थी | इस पाठशाळा का निर्माण चौहान सम्राट बंसलदेव ने सन 1153 में करवाया था | इसका निर्माण 259 फीट भुजाओं वाले वर्ग के आकर में किया गया था | 1192 में मुहम्मद गौरी ने पाठशाळा की इमारत को गिराकर ढाई दिनों में मस्जिद बनवा दी थी मराठो के समय पंजाबशाह बाबा का ढाई दिन का उर्स लगता है | मस्जिद जीर्ण शीर्ण अवस्था में है | इस मस्जिद में 7 मेहराब बने है जो हिन्दू मुस्लिम एकता के बेजोड़ नमूने है |
सोनीजी की नसिया
इसे सिद्धकूट चैत्यालय भी कहते है | इसका निर्माण सर सेठ बहादुर राय मूलचंद सोनी ने सन 1865 में करवाया था | ऊँचे शिखर एवं गगनचुम्बी स्तम्भवाला , करोली लाल पत्थरों का बना यह मन्दिर जैनियों के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ जी को समर्पित है | इसके दक्षिण की और निर्मीत दो मंजिला भवन में तीर्थंकर के पांच कल्याणक – गर्भ , जन्म ,तप , ज्ञान और मोक्ष के दृश्य अंकित है | ये दृश्य सोने के वर्को से ढके रहते है | इसकी सूक्ष्म कारीगरी देखने लायक है | जिनसेन द्वारा रचित आदि पुराण पर आधारित इस मॉडल का निर्माण मनसुख जी की देखरेख में सन 1895 में किया गया था | इसमें प्रवेश के लिए 2 रूपये का टिकट लेना होता है |
फोय सागर | Foy Lake
फोय सागर या काय सागर नामक इस झील का निर्माण शहर से 7 किमी दूर सन 1891-92 में किया गया | अकाल के समय लोगो में राहत पहुचाने के लिए इसके निर्माता फोए के नाम पर इसका फोय सागर नामकरण किया गया | इसके किनारे बाग़ एवं छतरीयाँ है | पिकनिक के लिए यह उपयुक्त स्थल है |
तारागढ़ दुर्ग | Taragarh Fort Ajmer
समुद्रत्ल्व्से 2835 फीट की उंचाई पर स्थित इस दुर्ग का निर्माण चौहान राजा अजयपाल ने सातवी शताब्दी में करवाया था | यहाँ मीर सैय्यद हुसैन की दरगाह पर उर्स का आयोजन किया जाता है | यह दुर्ग अब खंडहर के रूप में परिणत होता जा रहा है |
पुष्कर | Pushkar
अजमेर (Ajmer) से 15 किमी दूर पुष्करराज हिन्दुओ का महान तीर्थ माना जाता है \ यहाँ ब्रह्मा और रंगजी का मन्दिर देखने योग्य है | यहाँ पहुचने के लिए अजमेर से टैक्सी और बस की सुविधा उपलब्ध है | पुष्कर झील में स्नान के लिए देश के कोने कोने से लोग यहाँ विशेष धार्मिक अवसरों पर आते रहते है | झील के चारो ओर हरियाली और प्राकृतिक सुषमा मन को मोह लेती है | प्रतिवर्ष यहाँ एक विशाल पशु मेला लगता है जिसमे दूर दूर से लोग झील में स्नान करने तथा ऊँट बैल आदि खरीदने के लिए आते है | कहते है ब्रह्मा जी एक ऐसे स्थान की तलाश में थे जहां यज्ञ किया जा सके | उसी समय उनके हाथ से कमल का फुल गिरा ,जिसमे तीन स्थानों को छुकर पवित्र कर दिया | उन्ही में से एक स्थान यह भी है
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