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लोककथा - आलसी का प्रण | Lokkatha- Aalsi Ka Pran

पुराने जमाने में एक बड़ा ही बलवान राजा था | उन दिनों हर राजदरबार में कुछ चारण-भाट हुआ करते थे | वे राजा के बड़े-बड़े कामो का गान किया करते थे | ऐसा ही एक चारण इस राजा के दरबार में रहता था | वह बूढा और बुद्धिमान आदमी था | एक शाम उस चारण ने कहा “बिना ऊँचे उद्देश्य के जीने से अच्छा है कि जीवन में कोई न कोई उद्देश्य जरुर रखा जाए , भले ही वह कितना ही उल-जलूल क्यों न हो “| इसी बात पर उसने एक कहानी सुनाई |
तेजा नाम का एक जाट था | वह बहुत आलसी था | अपने दिन खा और सोकर गुजार देता था | कोई काम नही करता था | जब वह छोटी उम्र का था तो पिता उसकी देखभाल करते थे | उसके पिता के गुजर जाने के बाद कुछ समय तक उसके भाई सहारा देते रहे | फिर एक धनी परिवार में उसका विवाह हो गया और बहुत वर्षो तक उसके ससुर उसका खर्च चलाते रहे लेकिन ऐसी बाते आखिर कितने दिन चलती | हर चीज की एक सीमा होती है |
एक दिन सवेरे ही जाट की पत्नी ने जाकर बताया “हमारे पास जो कुछ भी था सब खत्म हो गया | तुम एक ऐसे आलसी जीव हो , जिसके जीवन का कोई लक्ष्य नही है | हर आदमी के जीवन का कोई न कोई लक्ष्य रहता ही है लेकिन तुम्हारे जीवन में कोई भी लक्ष्य नही है | कुछ समय तक मै अपने जेवर बेच बेचकर घर गृहस्थी चलाती रही लेकिन अब यह बात ठीक नही है  ”
तेजा ठहरा अव्वल दर्जे का आलसी | वह सोचता था कि उसके जीवन में कोई निश्चीत लक्ष्य रखकर काम शुरू करना कठिन होगा इसलिए उसने कुछ ऐसा करने का विचार किया जो कम से कम उसे दिमागी तौर पर तो परेशान करे ही | उसने पत्नी से कहा “तुम चाहती हो न कि मै अपने जीवन में कोई लक्ष्य जरुर रखु | बस मैंने फैसला किया है कि जब तक अपने पड़ोसी कुम्हार का मुंह नही देख लिया करूंगा , खाना नही खाया करूंगा”
उसकी पत्नी ने कहा “चलो , कुछ न होने से तो यही अच्छा रहेगा”
यह सिलसिला कुछ समय तक चलता रहा | एक दिन ऐसा हुआ कि कुम्हार अपना गधा लेकर सवेरे बहुत जल्दी बर्तन बनाने के लिए मिटटी लाने चला गया | सुबह तेजा सोकर उठा तो पता चला कि कुम्हार कही चला गया है | उसे आश्चर्य हुआ | कुम्हार लौटने की प्रतीक्षा करता रहा लेकिन शायद कुम्हार मिटटी लाने के लिए बहुत दूर निकल गया था | ज्यादा देर होती देखकर जाट ने निश्चय किया कि वह कुम्हार के पीछे खदान जाकर वही उसका मुंह देख आएगा|
कुम्हार मिटटी खोद रहा था | खोदते खोदते उसे एक बहुत बडा खजाना मिल गया | संयोग से जाट ने जिस समय कुम्हार का मुंह देखा , ठीक उसी समय कुम्हार को जमीन में खजाना दिखाई दिया था |
जाट ने दूर से ही कुम्हार का मुंह देख लिया और खाना खाने के लिए घर की ओर मुड़ चला | कुम्हार ने सोचा कि हो न हो , जाट ने उसका खजाना देख लिया है और राजा को बताने जा रहा है | राजा उसके खजाने पर कब्जा कर लेगा |
बस कुम्हार चिल्ला पड़ा “ओ भैया लौट आओ”
जाट ने जवाब दिया “बस मैंने तुम्हे देख लिया , अब आने की क्या जरूरत है”
कुम्हार उसे बार बार बुलाता रहा | वह कहता रहा “लौट आओ | जरा सुनो तो सही” जब जाट ने कुम्हार का बहुत ही आग्रह देखा तो कुम्हार के पास जा पहुचा | वहा उसे सोने से भरा एक बड़ा बर्तन दिखाई दिया | कुम्हार ने कहा “हम इसे आपस में आधा आधा बाँट लेंगे”
इस तरह अपने जीवन में लक्ष्य रखने का तेजा को भरपूर इनाम मिला और उसके बाद वह अपने परिवार के साथ सुख से जीवन बिताने लगा |

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