एक था कुम्हार | बेचारा बहुत ही गरीब था | काम धंधा ठीक से नही चलता था | आख़िरकार एक दिन राजा के पास जाकर उसने कहा “अन्नदाता , मै आपकी सेवा में रहना चाहता हूँ”
राजा ने पूछा “क्या तनख्वाह लोगे ?”
कुम्हार बोला “एक लाख टका महीना | आप जो भी काम कहेंगे , वही मै पूरा करके दिखाऊंगा”
राजा ने उसकी बात मान ली और इस तरह कुम्हार “लखटकिया” नाम से मशहूर हो गया |
दरबार के बहत सारे लोग कुम्हार से इर्ष्या करने लगे | एक दिन उन्होंने राजवैध के साथ मिलकर एक षडयंत्र रचा और राजा से कह दिया कि महारानी की आँखों का रोग शेरनी का दूध डालने से ही दूर हो सकता है | राजा ने हुक्म दिया कि कोई जाकर शेरनी का दूध ले आवे | इस पर हरेक ने जवाब दिया | “अन्नदाता , लखटकिया कुछ भी काम-धाम नही करता | उसे ही यह काम सौंपा जाए”
सो राजा ने शेरनी का दूध वापस लाने के लिए लखटकिया से कहा |
शाम को कुम्हार जब वापस गया तो उसने देखा उसका गधा गायब है | एक तो वह पहले से ही परेशान था क्योंकि उसे पता नही था कि शेरनी को कैसे पकड़े , उस पर गधे के खो जाने की परेशानी ओर भी बढ़ गयी | रात हो गयी लेकिन फिर भी वह गधे को खोजने चला गया |
बारिश हो रही थी | एक टूटी-फूटी टपकती झोपडी में एक बुढिया रहती थी | बेचारी बैठी अपने भाग्य को कोस रही थी | बोली “न शेर से डरु , न किसी ओर चीज से | पर इस टपकले से तो मेरी जान आफत में है”
उस समय एक शेरनी झोपडी के पास ही खडी थी | उसने बुढिया की बात सूनी तो वह भी टपकले से डर गयी | शेरनी सोचने लगी इसका मतलब है कि टपकला शेर से भी ज्यादा खूंखार जानवर होता है |
तभी अपने गधे को खोजता हुआ कुम्हार वहा आ निकला | उसने अँधेरे में झोपडी के पास खडी शेरनी देखी तो उसे अपना खोया हुआ गधा समझ बैठा | आव देखा न ताव लपककर उसका कान पकड़ लिया , खींचता हुआ घर ले आया और उसे खूंटे से बाँध दिया | शेरनी समझ रही थी कि उसे टपकले ने पकड़ा है इसलिए मारे डर के थर थर काँप रही थी |
अगली सुबह कुम्हार की नींद खुली , तो एक शेरनी को आंगन में खूंटे से बंधा देख उसके प्राण सुख गये | लेकिन वह था परले सिरे का चालाक | तुंरत राजा के पास पहुचा और कहा “मै शेरनी को तो पकड़ लाया हु पर मुझे दुहना नही आता| किसी आदमी को मेरे साथ शेरनी का दूध निकालने भेज दीजिये ”
राजा ने वैध से जाने को कहा | वैध ने बहुत बहाने बनाये लेकिन आखिर उसे मजबूर होकर जाना ही पड़ा | इस तरह कुम्हार ने अपना बदला चूका दिया | इस घटना के बाद लोग उसकी इज्जत करने लगे |
लेकिन इर्ष्या की आग मुश्किल से बुझती है |
एक दिन पड़ोसी राजा ने इस राजा के राज्य पर हमला बोल दिया | राजा ने हरेक को लड़ाई के लिए तैयार होने का आदेश दिया | लोगो ने राजा से कहा “अन्नदाता , अब तो हमारे राज्य में लखटकिया जैसा वीर है | उस ही सेना के आगे रहकर युद्ध में शत्रु से लड़ना चाहिये”
राजा ने लखटकिया से कहा कि वह अपने लिए एक बढिया घोडा पसंद कर ले | लखटकिया अस्तबल में पहुचा | वहा उसने एक ऐसा घोडा पसंद किया जिसका एक पैर जमीन से थोडा उठा हुआ था | कुम्हार ने सोचा कि यह घोडा शायद लंगड़ा है इसलिए यह लड़ाई के मैदान की तरफ जाते समय पीछे रह जाएगा |
लेकिन कुम्हार के दुर्भाग्य से वह घोडा बहुत ही तेज तर्रार निकला | जैसे ही कुम्हार उस पर सवार हुआ , घोडा तुंरत शत्रु के शिविर की ओर भाग खड़ा हुआ |
जब घोडा इस तरह भागा जा रहा था तब कुम्हार ने सोचा कि अगर वह दुश्मन के शिविर में पहुच गया तो जरुर ही मारा जाएगा | इसलिए अपनी जान बचाने का उसे यही उपाय दिखाई दिया कि वह घोड़े पर से कूद पड़े | जब भागता हुआ घोडा घने बरगद के नीचे से निकला ,तो उसने उचककर एक डाल पकड़ ली , लेकिन घोड़े की रफ्तार इतनी तेज थी कि पेड़ की वह डाल टूटकर कुम्हार के हाथो में ही रह गयी | घोडा भागता रहा और कुम्हार हाथ में पेड़ की डाल थामे उस पर बैठा रहा |
दुश्मन के शिविर में लोगो ने जब उस अकेले आदमी को घोडा दौडाते हुए तेजी से अपनी ओर आते देखा तो वह घबरा उठे | बरगद की डाल उनके देखते देखते ही टूटी थी | वे समझे कि वह डाल कुम्हार ने ही तोड़ डाली थी | वे सोचने लगे “अगर एक आदमी ही इतनी बहादुरी दिखा सकता है तब तो सेना में इससे भी ज्यादा शूरवीर होंगे | ऐसे में तो हम सब मारे जायेंगे” बस दुश्मन के सैनिक प्राण बचाकर इधर-उधर भागने लगे |
इस तरह राजा ने बिना लड़े ही युद्ध जीत लिया | वह कुम्हार पर बहुत प्रसन्न हो गया | उसने उसे पन्द्रह गाँव इनाम में दे दिए |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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