किसी जमाने में इन्द्रपुरी नगरी में एक बहादुर राजा राज करता था | दूर दूर तक उसका नाम फ़ैला था | वह बहुत समझदार था , प्रजा का पालन बड़े ध्यान से करता था जैसे पिता अपने सन्तान की देखभाल करता है | उसके राज्य में सभी सुखी थे | सारी जनता उसे प्यार करती थी |
एक दिन उसके दरबार में एक गरीब ब्राह्मण आया और उसे निति के तीन वचन सुनाये |
राजा ने ब्राह्मण से पुछा “आप क्या चाहते है ?”
ब्राह्मण ने कहा “मुझे अपनी बेटी का विवाह करना है | अगर हर निति वाक्य के बदले मुझे एक हजार रुपया मिल जाए , तो मेरा काम चल जाएगा”
राजा ने मंत्री को आज्ञा दी कि ब्राह्मण को तीन हजार रूपये दिलवा दे | फिर उसने तीनो निति वचनों को कागज पर सुंदर ढंग से लिखवाकर अपने बिस्तर के सामने दीवार पर टंगवा दिया |
रात को जब राजा सोने गया , तो उसकी निगाहें सामने लिखे निति वचनों पर गयी | पहला था “राजा को सदा सतर्क , सजग रहना चाहिए” राजा ने फैसला किया कि वह शहर में जाकर पता लगाएगा कि उसकी प्रजा में कौन लोग सुखी है और कौन दुखी ? उसने वेश बदला और चल दिया |
जब राजा एक गली से गुजर रहा था तो उसने एक बुढी औरत के रोने की आवाज सूनी | उसके पास जाकर उसने पूछा “ओ माई , तुझे क्या परेशानी है ? तू इतनी दुखी क्यों है ?”
बुढिया बोली “भैया , तू मेरे रोने धोने की चिंता क्यों करता है ? अपने रस्ते जा |”
राजा ने कहा “कम से कम इतना तो बता दो कि तुम्हे क्या हैरानी है शायद मै तुम्हारी कुछ मदद कर सकू |”
बुढिया बोली “मै राजा के किले की देवी हु | मै उसके राज्य में बहुत प्रसन्न थी लेकिन अब राजा की उम्र बस एक सप्ताह की ओर रह गयी है | सातवे दिन एक सांप राजा को डंस लेगा और वह मर जाएगा | मै इसी बात से दुखी हु”
इतनी बात सुनकर राजा महल में वापस चला गया | जब वह पलंग पर लेटने जा रहा था तो उसकी निगाह ब्राह्मण के दुसरे निति वाक्य पर पड़ी | लिखा था “राजा को चाहिए कि अपने दुश्मन से भी अच्छा व्यवहार करे ”
सातवे दिन राजा ने महल के दरवाजे से अपने सोने के कमरे के दरवाजे तक सुगन्धित फुल बिखरवा दिए और रस्ते के दोनों ओर तरह तरह की मिठाईया रखवा दी | हर स्थान पर बर्तन में शहद भरवा दिया , दुसरी जगह मीठा और सुंगंधित चावल | अन्य स्थानों पर भी ऐसी ही चीजे रखवा दी गयी लेकिन अपने पलंग के चारो पायो के सब ओर नमक की ढेरिया लगवा दी , फिर पलंग पर बैठकर सांप की राह देखने लगा |
सांप महल में घुसा और सुगन्धित फूलो पर से रेंगता हुआ आगे बढने लगा | जब उसने रास्ते के दोनों और मिठाइयाँ रखी देखी तो वह उन्हें सूंघने और चखने लगा | फिर वह सोने के कमरे के दरवाजे तक पहुचा तो उसका मन बहुत प्रसन्न हो गया था |
लेकिन इतना ज्यादा मीठा खाने के बाद अब सांप की तबीयत नमक खाने के लिए कर रही थी | जब पलंग के पास आया और पलंग के चारो ओर नमक की ढेरिया देखी तो वह जल्दी जल्दी नमक खाने लगा |
जब तबीयत भर गयी तो वह पलंग के पाए के उपर चढने लगा लेकिन उपर पहुचते ही वह रुक गया | वह समझ गया कि राजा का नमक खाने के बाद उसे नही डंसना चाहिए इसलिए वह नीचे उतरकर चला गया | इस तरह राजा की जान बच गयी | वह ब्राह्मण के दो निति वचनों का मूल्य समझ गया |
राजा का एक मंत्री बहुत दुष्ट था | वह राजा को मारने का षडयंत्र रच रहा था | एक बार राजा बीमार पडा तो मंत्री ने राजवैध को अपनी ओर मिला लिया | उसे इस बात पर राजी कर लिया कि वह राजा को दवा के साथ विध देगा और इस तरह राजा मर जायेगा | कुछ हजार सोने के सिक्के मिलते ही राजवैध इस घिनौने काम के लिए तैयार हो गया |
राजवैध दवा लेकर राजा के पास गया | राजा दवा खाने के लिए पलंग पर उठकर बैठ गया | ज्योही वह दवा खाने को था उसकी निगाह ब्राह्मण के तीसरे निति वाक्य पर पड़ी “राजा को चाहिए कि कुछ भी करने से पहले उस पर भली प्रकार से सोच-विचार कर ले”
जिस समय राजा इस बात पर विचार कर रहा था वैध समझा कि शायद राजा को उसका पता चल गया है |
बस वह घबरा गया | राजा के पैरो में गिरकर दया की भीख मांगने लगा | उसने राजा को सारे षड्यंत्र के बारे में बता दिया | राजा ने तुंरत मंत्री को बुलाया और वह विषैली दवा उसे पिला दी | इस तरह दुष्ट मंत्री मर गया |
ब्राह्मण के तीन निति वाक्यों ने राजा के प्राण बचा लिए | राजा ने ब्राह्मण को बुलवाया और उसे अपना मंत्री बना लिया | उसके बाद राजा ने बहुत बड़े बड़े काम किये | वह बहुत समय तक सुख से जिया |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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