
लद्दाख सम्भाग का प्रमुख शहर लेह (Leh) है | यह अपने बौद्ध मन्दिरों और मठो के लिए प्रसिद्ध है | इन मठो को गोम्पा कहते है | यहाँ का हर नागरिक किसी न किसी मठ या गोम्पा का सदस्य है | लेह (Leh) सिन्धु नदी द्वारा बनाये गये पठार के शिखर पर समुद्र तल से 3368 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है |
14वी शताब्दी में रव्री-त्सुग्ल्दे द्वारा स्थापित लेह (Leh) शुरू में स्ले या ग्ले कहा जाता था | 19वी शताब्दी में मोरोवियन मिशनरी के नाम पर इसका नाम लेह रखा गया | यह लद्दाख क्षेत्र का प्रमुख नगर है | इसकी स्थापना से ही यह मान्यता प्रचलित थी कि राजगद्दी का भावी उत्तराधिकारी लेह में जन्म लेगा | फलस्वरूप लद्दाख के राजाओ ने इस नगर में अनेक महलो, बौद्ध मठो और धार्मिक भवनों का निर्माण अपने वर्षो के शासनकाल के दौरान करवाया | लेह (Leh) में इस्लाम का आगमन यारकंद और कश्मीर के व्यापारियों द्वारा हुआ |
लेह (Leh) की संस्कृति
गोम्पाओ में मनाये जाने वाले उत्सवो में नृत्य नाटको का आयोजन किया जाता है जिसमे लामा चमकदार रंगीन पोशाक में सजे हुए भयानक मुखौटे पहनकर स्वांग रचते है तथा धर्म के विभिन्न पक्षों का प्रदर्शन करते है जैसे आत्मा का उत्थान या इसका शुद्धिकरण उया बुराई पर अच्छाई की जीत | ईस अवसर पर लोगो को अपने नये मित्र बनाने और पुराने मित्रो से मिलने-जुलने का अवसर प्राप्त होता है |
सबसे बड़ा और प्रसिद्ध बौद्ध मठ उत्सव है हेमिस , जिसमे सैलानी और स्थानीय लोग इकट्ठे होते है | यह जून के अंतिम सप्ताह के पहले पखवाड़े तक चलता है और पद्मासम्भव को समर्पित किया जाता है | हर 12 वर्ष बाद गोम्पा की सबसे बड़ी निधि एवं विशाल थंगा जोकि कपड़े पर चित्रित या कढाईदार एक धार्मिक आकृति होती है का धार्मिक अनुष्टान के साथ प्रदर्शन किया जाता है |
लेह (Leh) के दर्शनीय स्थल
लेह महल – 17वी शताब्दी में बना यह महल आज भी प्राचीन सभ्यता की कहानी कहता नजर आता है | इस महल में नामग्याल तेस्मा का मन्दिर है | चारो ओर पहाडियों से घिरा यह महल वास्तुशिल्प का खुबसुरत नमूना है |
सेमो गोम्पा – महल के पीछे एक शाही मोनेस्ट्री है जिसका निर्माण राजा द्वारा करवाया गया था | यह एक देवता के रूप में उत्कृष्ट कृति है | यह बैठी अवस्था में दो मंजिला ऊँची चम्बा की पवित्र प्रतिमा है | इस प्रतिमा में शरीर के अंगो की बनावट , उनमे परस्पर अनुपात और संतुलन , चेहरे की सुन्दरता तथा विशेषतया आँखों की परमानन्द से पूर्ण अभिव्यक्ति ,देखने वाले व्यक्ति को स्तब्ध और अभिभूत कर देती है |
लेह मोनेस्ट्री – महल वाली पहाडी की एक अन्य चोटी पर स्थित लेह मोनेस्ट्री न केवल महल पर ,बल्कि शहर पर भी प्रभावी है | अनेक गलियारों से युक्त इस विशाल गोम्पा में अमूल्य पांडूलिपियों एवं चित्रावलियो की कुंडलिया है | इसमें प्राचीन समय के महान चित्रकारों द्वारा बनाये गये बादलो ,नदियों ,जंगलो ,आकाशीय कृतियों और साक्य-मुनि बुद्ध के जीवन वृतांत के चित्र है | इसमें लामा विद्यार्थियों के लिए स्कूल है | यह विशाल मोनेस्ट्री 281 वर्ग मीटर के क्षेत्र में निर्मित है |
लेह मस्जिद -सोवांग नामग्याल के भाई जाम्यांग नामग्याल ने 1555 ई. ,इ स्कार्दू की मुस्लिम राजकुमारी अवग्याल खातून से , उसके पिता शेर अली से युद्ध में हारने के बाद विवाह किया | यह महान रानी प्रसिद्ध एवं पराक्रमी सिंगे नामग्याल की माता बनी जिसने बौद्ध जगत के सर्वाधिक प्रसिद्ध गोम्पाओ का निर्माण करवाया | इस मस्जिद का निर्माण उसने अपनी माता की याद में 1594 ई. ,में करवाया जो कि तुर्की एवं इरानी वास्तुशिल्प का एक सूक्ष्म एवं दक्षतापूर्ण कार्य है तथा मुख्य बाजार में स्थित है |
खारडूंगला दर्रा – लेह से 46 किमी दूर खारडूंगला दर्रा विश्व के सबसे ऊँचे बस मार्ग से जुड़ा है | 18380 फुट की ऊँचाई पर खड़े होकर हिमालय देखना एक स्वप्नलोक में पहुचने जैसा ही लगता है | वास्तव में यह सीमा क्षेत्र है जहां से पर्यटक चीन के इलाके पर भी नजर डाल सकते है |
शहीद स्मारक – लेह से 10 किमी सेना की छावनी के पास बने इस स्मारक को 10 रूपये प्रवेश शुल्क देकर देखा जा सकता है | इसमें कारगिल एवं इस क्षेत्र की सीमा पर शहीद हुए सैनिको के चित्र ,परिचय एवं अन्य विवरण मौजूद है | यहाँ कारगिल युद्द में दुश्मनों से जब्त किये गये हथियार रखे गये है |
कारगिल – लेह और श्रीनगर के 434 किमी के फासले के बीच कारगिल लेह से 225 किमी की दूरी पर है | कारगिल भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के भीषण संघर्ष की कहानी कहता दिखाई पड़ता है | लेह के बाद यह लद्दाख का दूसरा बड़ा कस्बा है |
स्टॉक पैलेस संग्रहालय – लेह से 17 किमी की दूरी पर स्टॉक नामक कस्बे में बने इस महल को अब संग्रहालय का रूप दे दिया गया है | यहाँ कीमती पत्थर ,पुराने सिक्के , थंका (लद्दाखी चित्र), शाही मुकुट और अन्य शाही वस्तुओ का संग्रह लाजवाब है |
हेमिस गोम्पा – मनाली मार्ग से जुड़ा हेमिस गोम्पा लेह से 40 किमी दूर है | लद्दाख के सबसे बड़े बौध केंद्र , पुस्तकालय , स्मारक और लद्दाखी चित्र संग्रहालय के रूप में हेमिस गोम्पा का नाम लिया जाता है | इसका निर्माण सन 1630 में हुआ था | जून या जुलाई में होने वाले हेमिस उत्सव में विश्वभर से लोग बड़े जोश से यहाँ पहुचते है | इस उत्सव में होने वाला मुखौटा नृत्य रोमांचकारी होते है | हेमिस के घोर एकांत में बौद्ध शिक्षाओं के साथ अनेक ध्यान पद्धतियों के प्रयोग चलते रहते है | हेमिस में ठहरने का अच्छा प्रबंध है | गोम्पा में भी रहने एवं खाने की किफायती व्यवस्था है |
लेह पहुचने के मार्ग
- हवाई मार्ग द्वारा लेह के लिए दिल्ली-चंडीगढ़ , जम्मू और श्रीनगर से इंडियन एयरलाइन्स की नियमित सेवाए उपलब्ध है |
- सडक मार्ग द्वारा लेह के लिए दो सडक मार्ग है |एक मार्ग श्रीनगर से लेह होकर जाता है जो कि लगभग 434 किमी लम्बा है तथा मार्ग में पूर्ण रात्रि के लिए यात्रा के दौरान रुकना पड़ता है | दूसरा रास्ता मनाली से लेह है जिसकी लम्बाई 475 किमी है यह बीस घंटे की यात्रा है तथा इसमें भी पूर्ण रात्रि के लिए रुकना पड़ता है | श्रीनगर एवं मनाली बस सेवा के अलावा टैक्सी एवं जीप आदि भी किराये पर मिलती है |
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