
सन 1850 की बात है | ब्रिटिश अधिकारियों का एक दल चम्बा की दुर्गम घाटियों की ख़ाक छानता फिर रहा था | इस दल को ब्रिटिश सरकार ने आदेश दिया था कि चम्बा की धौलाधार पर्वत शृंखलाओं में स्थित किसी ऐसे स्थल का पता लगाया जाये , जो नैसर्गिक सौन्दर्य के लिहाज से प्रकृति के स्वर्ग से कम न हो और साथ ही जहां की जलवायु भी स्वास्थ्यवर्धक हो | इसी लक्ष्य के लिए ब्रिटिश अधिकारी चम्बा घाटी में प्रकृति का स्वर्ग तलाश रहे थे | एक दिन अचानक दल की निगाह देवदार एक घने वृक्षों के बीच स्थित हहरे भरे मैदान पर पड़ी | दल के सदस्य बीच मैदान में पहुच गये | चारो ओर का नजारा दर्शनीय था | देवदार के ऊँचे ऊँचे पेड़ो से घिरा मैदान और उसमे एक तश्तरीनुमा झील इस स्थल की सुन्दरता में चार चाँद लगा रही थी | दल ने सरकार को भेजी अपनी सिफारिश में इस स्थल की दिल खोलकर प्रशंशा की | बाद में यहाँ के छावनी भी स्थापित हुयी |
सन 1900 में लार्ड कर्जन जब इस स्थल पर आये तो प्राकृतिक दृश्यावली ने उन पर मानो जादू सा कर दिया | सम्मोहित से लार्ड कर्जन बुदबुदा बैठे “अरे वाह ! भारत में स्विटजरलैंड” बस फिर तो खजियार (Khajjiar) की ख्याति बढती गयी और ब्रिटिश अधिकारियों का यह पसंदीदा स्थल बन गया | गोल्फ खेलने और तफरीह करने के लिए अंग्रेज यहाँ आने लगे | यहाँ की तश्तरीनुमा झील में तैराना बड़ा (टीला) भी प्रकृति का एक करिश्मा ही लगा उन्हें | हवा के झोंको से यह टीला कभी एक ओर जाता और कभी दुसरे किनारे आ लगता | ऐसी मान्यता कि पहले इस झील में दो टीले तैरते थे पाप का टीला और पुन्य का टीला | कालान्तर में पूण्य का टीला झील में समा गया और पाप का टीला सदियों से विराजमान है |
कुछ वर्ष पूर्व जब भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति आर.वेंकटरैमैया खजियार आये तब यहाँ के नैसर्गिक सौन्दर्य से अभिभूत होकर उन्होंने टिप्पणी की थी “मुझे दुनियाभर के अनेक देशो में जाने और उन्हें निकट से देखने के अवसर मिले है परन्तु यह बात मै बिना किसी पूर्वाग्रह और हिचकिचाहट से कहता हु कि खजियार विश्व के सुंदरतम स्थलों में से एक है | मै इस मनोरम स्थल से काफी प्रभावित हुआ हु”
हिमाचल प्रदेश की चम्बा घाटी में स्थित खजियार (Khajjiar) पर्यटन स्थल होने के साथ साथ धार्मिक महत्ता भी रखता है | चम्बा नगर से इसकी दूरी 24 किमी है | इस स्थान का नाम खजियार कैसे पड़ा , इसके बारे में एक रोचक किंवदती प्रचलित है | कहा जाता है कि कालान्तर में यहाँ पर किसी सिद्ध देवता का वास था | एक बार कही से घूमते फिरते एक नाग यहाँ आ पहुचा | उसे यह स्थल बहुत भाया और वह यही बस गया | सिद्ध देवता को नाग की उपस्थिति अखरने लगी | अत: इस स्थान के आधिपत्य को लेकर दोनों में संघर्ष हो गया | काफी देर तक संघर्ष चलता रहा | अंतत: सिद्ध देवता ने अपनी हार मानते हुए यह स्थल नाग देवता के हवाले कर दिया और कहा “ले तू खा और जी” | तब से ही स्थल का नाम खाजी पड़ा जो बिगड़ते बिगड़ते खजियार बन गया |
खजियार (Khajjiar) में इसी नाग देवता की बड़ी मान्यता है जो उनका लकड़ी का एक मन्दिर भी है | ऐसी मान्यता है कि इस मन्दिर के निर्माण में एक ही विशाल पेड़ की लकड़ी का इस्तेमाल हुआ है | मन्दिर सात सौ वर्ष पुराना है | इसके काष्ट फलक पर हुयी नक्काशी देखते ही बनती है | मन्दिर के गर्भगृह सर्वाधिक दर्शनीय है | कहा जाता है कि जब सिद्ध देवता और नाग देवता में हुयी लड़ाई में सिद्ध देवता ने अपनी हार स्वीकार की थी तो नाग देवता ने वचन देते हुए कहा कि उनके साथ सिद्ध देवता की पूजा भी हुआ करेगी | शायद इसलिए नाग देवता के मन्दिर के बाहर उसकी पाषाण प्रतिमा विद्यमान है |
नाग देवता के प्रति चम्बा के राजाओं की भी अगाध श्रुधा थी | इस प्राचीन मन्दिर का पुनर्निर्माण भी चम्बा के राजा पृथ्वीसिंह की धर्मपरायण दाई श्रीमती बातलू द्वारा करवाया गया था | मन्दिर के भीतर नाग देवता की विशाल प्रतिमा स्थापित है | मन्दिर में हुयी नक्काशी देखकर श्रुधालू एवं सैलानी दंग रह जाते है \ भले ही वक्त के थपेडों से यहाँ की काष्ट कलाकृतिया मलिन हो उठी मगर शिल्प की जिन्दा तस्वीर आज भी इसमें झलकती है | खजियार स्थित ख्ज्जीनाग के मन्दिर में जयेष्ट मास में एक विशाल मेला लगता है | जहां आस-पास के इलाकों से हजारो श्रुधालू शामिल होते है |
खजियार (Khajjiar) जो कभी मिनी गुलमर्ग कहलाता था को अब मिनी स्विटजरलैंड के रूप में मान्यता मिल गयी है | 7 जुलाई 1992 को भारत में स्विट्जरलैंड के दूतावास के प्रमुख विली टी.बलेसर ने खजियार में एक पीले साइनबोर्ड की भी सरकारी तौर पर स्थापना की जिस पर खजियार की स्विस राजधानी बर्न से 6194 किमी की दूरी भी दर्शाई गयी है | अब तक विश्व के 160 देशो में ही मिनी स्विटजरलैंड स्थापित हुए है | मिनी स्विटजरलैंड के रूप में मान्यता प्राप्त इस पर्यटन स्थल का क्षेत्रफल 2,27,670 वर्ग मीटर है | खजियार से एक पत्थर भी स्विस राजधानी बर्न ले जाकर वहां संसद भवन के समक्ष स्थापित किया गया है |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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