
आजादी के बाद जब हिमाचल का गठन हुआ तो लाहौल-स्पीती (Lahaul Spiti) एक जिले एक रूप में सामने आया | भौगोलिक दृष्टि से लाहौल और स्पिति बिल्कुल अलग है | स्पीती ठंडा रेगिस्तान है जहां बारिश नाममात्र को होती है और लाहौल घाटी विशाल चट्टानी पर्वतों के मध्य बसी है | लाहौल-स्पीती (Lahaul Spiti) का मुख्यालय केलांग है |
यहा पर आने वाले पयर्टको का मानना है कि यह क्षेत्र बहुत ही रहस्यात्मक क्षेत्र है | यहाँ अनेक आश्चर्यचकित करने वाली चीजे है जो पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है | अंग्रेजो की घुमक्कड़ लेखिका पेनापोले चेटवुड ने तो इसे “रहने के योग्य” ऐसा संसार बताया है जिसमे भरपूर आनन्द के साथ घुमा फिरा जा सकता है लेकिन बसा नही जा सकता | वास्तव में यह यायावरो का संसार है |
रोहतांग दर्रे की 3980 मीटर उंचाई के पर की उस दुनिया को देखने के लिए सैलानी शिमला से हिन्दुस्तान तिब्बत मार्ग से भी आते है | वास्तव में लाहुल के लिए मनाली और स्पीती के लिए शिमला से मुख्य रास्ते जाते है | लाहुल स्पीती जिले का मुख्यालय केलांग मनाली के रस्ते के निकट पड़ता है जबकि सह मुख्यालय किन्नौर के रास्ते के पास पड़ता है |
लाहुल स्पीती के प्रमुख स्थलों केलांग , खाक्सर , लोसर ,काजा और ताम्बो के लिए गर्मियों में रोज बसे चलती है | यहाँ पर सर्दियों के मौसम में दिसम्बर से मार्च तक बहुत भारी हिमपात होता है जिस वजह से इधर जाने वाले सभी मार्ग बंद हो जाते है | रोहतांग दर्रा अप्रैल मई में प्राय: बंद रहता है | चन्द्र और भागा नदियों के किनारे बसी यहाँ की आबादी इलाके के विस्तार को देखते हुए बहुत कम है | शिमला , कुफरी , नारकुंडा , राम पुरबू शहर , टापरी , पुहु और नाको के बाद समदो नामक स्थान आता है | यही से हम स्पीती में प्रवेश करते है | आगे विश्वप्रसिद्ध ताम्बो बौद्ध विहार दर्शनीय है |
लाहौल स्पीती के दर्शनीय स्थल
ताबो प्राचीन बौद्ध मठ – ताबो समुद्रतल से 3050 मीटर की ऊँचाई पर स्पीती नदी के बाई ओर बसा है | यह 10वी शताब्दी में बना था | इसका कार्य 46 वर्ष चलता रहा | इसका निर्माण तिब्बत के एक शासक शहोद ने कराया था | यह मठ गेलकुम्पा सम्प्रदाय से संबधित है | इस मठ के चारो ओर ऊँची दीवार है | इस परिसर के 9 प्रमुख पक्ष है जिनमे बुद्ध की विशाल प्रतिमाये है | इसके भित्तिचित्र अद्भुद और दुर्लभ है | यह मठ सरंक्षित स्मारक घोषित है |
काजा -काजा समुद्रतल से 3660 मीटर की ऊँचाई पर स्पीती नदी के बांयी तरफ बसा है | काजा का त्रिमूर्ति मन्दिर और बौद्धमठ देखने लायक है | काजा में ऑक्सीजन की कमी के कारण आपको सांस लेने में तकलीफ हो सकती है |
की गोम्पा – की गोम्पा काजा से 8 किमी उपर की ओर है | गेलुग्पा सम्प्रदाय से संबधित गोम्पा विश्व भर में प्रसिद्ध है | इसमें थंकचित्रों का वृहद भंडार है | इसमें 100 से अधिक आवासीय कक्ष है जिनमे 300 से अधिक लामा रहते है | सभी कक्षों में कंज्यूर और तंज्युर ग्रंथो का संग्रह है | इसके कई दुर्लभ वाध्ययंत्र है | यहाँ का छम्म नृत्य प्रसिद्ध है | इसे मुखौटा नृत्य भी कहा जाता है |
कुंजम दर्रा – समुद्रतल से 4551 मीटर की उंचाई पर कुंजम दर्रा है | यहाँ से आप छोटा शिगडी और बड़ा शिगडी ग्लेशियरो को देख सकते है | बड़ा शिगडी ग्लेशियर एशिया में सबसे विशाल माना जाता है | 12 किमी नीचे उतरकर आप बातल नामक जगह पहुचते है | चन्द्रा नदी पर पुल है आगे छोटा दर्रा और बड़ा दर्रा नामक स्थान है | रास्ता विशाल चट्टानों चट्टानों के बीच से है |
केलांग – केलांग लाहौल स्पीती जिले का मुख्यालय है | समुद्रतल से 3150 मीटर की उंचाई पर बसा यह स्थान प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के रूप में उभरा है | चारो तरफ से सुंदर दृश्य मन मोह लेते है | दक्षिण में डीलबुरी चोटी है | यहाँ बौद्ध और हिन्दू मिलकर रहते है | यह चोटी उनका तीर्थ है | वे इसकी परिक्रमा करके अपने को धन्य मानते है | पूरब की ओर लेडी ऑफ़ केलांग चोटी है | केलांग जिस शिखर की गोद में बसा है | उसे कियारकयोक्स के नाम से जाना जाता है | केलांग के आसपास अनेक बौद्ध मठ है 15 किमी दूर कारदंग बौद्ध मठ है | यह डुक्पा सम्प्रदाय से संबधित है | केलांग में आप इन गोपाओ के यहाँ के जनजीवन , धार्मिक महत्व एवं लाहौल स्पीती को बिल्कुल करीब से देख सकते है |
रोहतांग दर्रा – हालांकि यह दर्रा समुद्रतल से केवल 3050 मीटर की उंचाई पर है लेकिन इसे सबसे खतरनाक दर्रा माना जाता है यह दर्रा भारी हिमपात के कारण नवम्बर में बंद हो जाता है और फिर 8 महीने बाद जून में खुलता है | उस समय तक सम्पूर्ण लाहौल घाटी भारत के अन्य क्षेत्रो से कटी रहती है | इस दर्रे पर 20 से 40 फुट तक हिमपात होता है | जो पर्यटक मनाली आते है उनके लिए रोहतांग जून से अक्टूबर आकर्षण का केंद्र बना रहता है | मनाली से पर्यटन निगम लगातार दर्शनीय स्थलों के लिए टूर का आयोजन करता है | दर्रे की यात्रा का मौसम दोपहर से पूर्व ही उचित है | यहाँ लगातार बर्फीली हवाए चलती रहती है | यही से व्यास नदी का उद्गम माना जाता है | व्यासकुंड भी यही है जहा एक गोम्पाकार मन्दिर बना है | व्यास यहाँ से लड़ियों से निकलती है | जब आप मनाली आयेंगे तो इसके विराट रूप को देखकर आश्चर्यचकित हो जायेंगे |
की और किब्बर – काजा से 12 किमी दूर “की” नामक बौध विहार 4205 मीटर की ऊँचाई पर है | इन स्थानों को देखकर ऐसा लगता है कि मनुष्य चाहे तो माउंट एवेरेस्ट पर भी घर बना सकता है | किब्बर से आगे भी लोगो ने एक बस्ती बना ली है जिसे गते कहते है | असम्भव सी बात यह लगती है कि बिजली भी यहाँ पहुच गयी है | किब्बर गाँव में 400 लोग रहते है और यह प्रदेश की सबसे ऊँची जगह है जहां तक मोटर मार्ग बन चूका है और किब्बर पर्वतारोहियों और घुमक्कड़ो के लिए बहुत काम के स्थान है जहां कई रास्ते निकलते है |
लाहुल स्पीती पहुचने के विविध मार्ग
सडक मार्ग – लाहौल स्पीती के लिए उपरोक्त सडक मार्ग के अलावा मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 21 से भे पहुचा जा सकता है | यह मार्ग चंडीगढ़ से विलासपुर , मंडी और कुल्लू से होकर जाता है | मनाली से आगे यह मार्ग मनाली लेह रोड कहलाता है | यहाँ से दिल्ली एवं शिमला से सीधी बस सेवाए उपलब्ध है | पठानकोट से आने वाले पर्यटकों के लिए पठानकोट , पालमपुर , जोगिन्द्रनगर और मनाली वाला मार्ग है |मनाली से रोहतांग दर्रा होते हुए लाहौल पहुचा जा सकता है | मनाली से यहाँ के हिमाचल परिवहन निगम की बस सेवाए एवं टैक्सीया उपलब्ध है |
वायु मार्ग – लाहुल के मुख्यालय केलांग जाने के लिए कुल्लू का भुन्तुर हवाई अड्डा और मुख्यालय काजा जाने के लिए शिमला का हवाई अड्डा निकटतम है | चंडीगढ़ एवं शिमला से हेलीकाप्टर सेवा भी है |
रेल मार्ग – रेल द्वारा लाहुल जाने के लिए सीधा मार्ग नही है इसके लिए बड़ी रेल से कालका और वहां से छोटी रेल के द्वारा शिमला तक ही जाया जा सकता है |
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