
भारत की आजादी की लड़ाई में लाखो ने बलिदान दिया परन्तु इस बलिदान से भी हमे स्वतंत्रता नही मिल सकती थी यदि हमे अपने स्वतंत्रता संग्राम में साहसी ,त्यागी और बुद्धिमान देशभक्तों का नेतृत्व प्राप्त न होता | इन नेताओं में पंडित मोतीलाल जी (Motilal Nehru) का प्रमुख स्थान है | भारत के इतिहास में उनका नाम चिरस्मरणीय रहेगा | जब कोई आदमी महान हो जाता है तो उसके इर्द गिर्द कहानियाँ खडी हो जाती है और किंवदंतीया चल निकलती है परन्तु उस वाक्य में भी कुछ सत्य है कि “होनहार बीरबान के होत चिकन पात” |
पंडित मोतीलाल नेहरु (Motilal Nehru) का जन्म 6 मई 1861 को आगरा में हुआ | इससे पहले नेहरु परिवार दिल्ली में बसा था | मोतीलाल नेहरु के दो ओर भाई थे नन्दलाल और बंशीधर | उनके पिता गंगाधर दिल्ली में कोतवाल थे | 12 वर्ष तक दिल्ली के मकतबो में ही उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और बाद में कानपुर के एक अंग्रेजी स्कूल में भर्ती हुए | उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की और उसके बाद म्योर सेंट्रल कॉलेज , इलाहाबाद में दाखिल हुए | बी.ए. की परीक्षा में एक पर्चा बिगड़ जाने की वजह से उन्होंने परीक्षा ही नही दी | इस कारण वह डिग्री न पा सके , परन्तु बाद में उन्होंने हाई कोर्ट के वकील की परीक्षा सम्मान के साथ पास की |
उन्होंने कानपुर में वकालत करना शुरू किया | फिर वह प्रयाग चले गये , जहां उनके बड़े भाई पहले से ही वकालत कर रहे थे | जब इलाहाबाद हाई कोर्ट में अधिवक्ता बनने का रिवाज चला तो वह पहले पहल चुने जाने वाले चारो में से एक थे और उनमे सबसे छोटे भी थे | इलाहाबाद हाई कोर्ट में उनकी वकालत खूब चमकी और उन्होंने इलाहाबद में एक राजा का बंगला खरीद लिया जो बाद में आनन्द भवन के नाम से मशहूर हुआ | आनन्द भवन का एक हिस्सा बाद में देशकार्य के लिए दे दिया गया और वह अब स्वराज्य भवन कहलाता है | वकालत में पंडित मोतीलाल नेहरु की तीक्ष्ण बुद्धि की मुक्तकंठ से प्रशंशा उस समय के चीफ जस्टिस सर ग्रीमवुड ने स्वयं की थी |
पंडित मोतीलाल नेहरु (Motilal Nehru) बड़े वाक्पट थे | किसी राजनितिक विषय पर बोलते हुए जब पंडित मदनमोहन मालवीय शुरूस इ उसके इतिहास की चर्चा करने लगे तो पंडित मोतीलाल ने व्यंग्य किया | जब मालवीय जी इस पर नाराज हुए तो उन्होंने उत्तर दिया “मालवीय जी मुझसे उम्र में छ: महीने छोटे है इसलिए उनका दृष्टिकोण भी मुझसे छ: महीना पिछड़ा रहता है” इसी प्रकार के अनेक उदाहरण है | एक चुनाव सभा में जब वह स्वराज्य पार्टी के एक उम्मीदवार के समर्थन में भाषण दे रहे थे तो विरोधी दल के एक समर्थक ने उनसे प्रश्न किया “क्या ब्राहमण होते भी आप अंडा और मांस खाते है ” | उन्होंने उत्तर दिया “मै दोनों चीजे खाता हु | मेरे दादा-परदादा भी खाते थे परन्तु आपके उम्मीदवार ने उन्हें गर्वनमेंट हाउस की मेज पर ही चखना शुरू किया”|
उनके व्यंग्य में न केवल बुद्धि की ही तीक्ष्णता होती थी बल्कि उससे साहस और निर्भीकता का परिचय मिलता था | साहस और निर्भीकता के साथ उदार देशभक्ति भे उनके चरित्र का एक विशेष गुण था | केन्द्रीय असेम्बली में पब्लिक सेफ्टी बिल का विरोध करना था परन्तु उस समय पंजाब के नेता लाला लाजपत रॉय की पार्टी से पृथक होकर अपनी अलग पार्टी बना ली थी और दोनों के सम्मिलित विरोध के बिना काम सफल नही हो सकता था | उस समय व्यक्तिगत भावनाओ को छोडकर वह स्वयं असेम्बली भवन के दरवाजे पर लालजी की प्रतीक्षा करते रहे और उनके आते ही उन्होंने उनमे सामने अपना प्रस्ताव रखा और उनको अपने साथ कर लिया |
1888 में पंडित मोतीलाल नेहरु (Motilal Nehru) कांग्रेस में शामिल हुए जबकि उस समय नरम दल का नेतृत्व था परन्तु गांधीजी के प्रभाव में आकर उन्होंने सत्याग्रह आन्दोलन में योगदान किया तब से लेकर मृत्युकाल तक उन्होंने ब्रिटिश शासन से डटकर विरोध किया | प्रयाग से अंग्रेजी दैनिक “लीडर” के निकालने में उनका बड़ा हाथ था | “लीडर” बाद की निति से मतभेद होने के कारण उन्होंने स्वयं अपना पत्र इंडिपेंडेंट निकाला | पंजाब में ब्रिटिश शासन के दमन की जांच कांग्रेस की ओर से पंडित मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में हुयी |
मोतीलाल जी (Motilal Nehru) दो बार कांग्रेस के सभापति चुने गये | भारत के लिए सुधारों के प्रस्ताव के निमित साइमन कमीशन में बायकॉट में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी | साथ ही अंग्रेजो को मुहतोड़ उत्तर देने के लिए उन्होंने एक सर्वदलीय कांफ्रेंस बुलाई जिसने नेहरु रिपोर्ट तैयार कर भारतीय शासन विधान का एक नमूना मसविदे के रूप में प्रस्तुत किया | जब लाहौर कांग्रेस में पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य की घोषणा की तब उन्हें बड़ी खुशी हुयी |
मोतीलाल नेहरु (Motilal Nehru) योद्धा थे और जब मुश्किलें पडती थी तो उनका यह रूप ओर ज्यादा निखरता था | देश के उद्दार के लिए पंडित मोतीलाल नेहरु ने अपना सारा वैभव त्यागर क्र एक तपस्वी का जीवन अपना लिया था | कई बार उन्हें जेल दंड भुगतना पड़ा| सन 1931 के प्रारम्भ में अधिक बीमार पड़ने के कारण वह कारागार से मुक्त किये गये | बीमार होने पर , उनके आग्रह करने पर , उन्ही के निवास स्थान पर प्रयाग में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गयी | उनकी बीमारी बढने लगी और वह इलाज के लिए लखनऊ ले जाए गये | वही 6 फरवरी 1931 को उनका देहांत हो गया तथा भारत-गगन का एक उज्ज्वल नक्षत्र टूट कर गिर गया |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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