
अमरनाथ की यात्रा पुरे भारत में प्रसिद्ध है | यहाँ की यात्रा अत्यधिक लाभदायक मानी जाती है | सम्पूर्ण भारत के लोग इस यात्रा के लिए अत्यधिक संख्या में श्रुद्धापूर्वक आया करते है | अमरनाथ गुफा में बर्फ से बने शिवलिंग की पूजा होती है | कुछ लोगो का विशवास है कि अमरनाथ द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है | इस गुफा की पहाड़िया लगभग 5000 फुट ऊँची है | कुछ चोटियाँ ऐसी है जो गर्मियों में भी सदा बर्फ से ढकी रहती है | अमरनाथ की पवित्र गुफा में कोई मानव निर्मित मन्दिर नही है औ न ही यह गुफा मनुष्य ने पहाडी काटकर बनाई है | यह एक खुली द्वारहीन उबड़-खाबड़ गुफा है जिसका निर्माण प्रकृति ने स्वयं किया है |
किंवदती है कि चातुर्मास की प्रतिपदा को हिम के लिंग का निर्माण अपने आप आरम्भ होता है और वह धीरे धीरे शिवलिंग के आकार का बन जाता है तथा पूर्णिमा को परिपूर्ण होकर दुसरे पक्ष में घटने लगता है | अमावस्या या शुक्ल-पक्ष को प्रतिप्रदा को यह लिंग पूर्णत: अदृश्य हो जाता है | दुसरे मास में फिर वही वृद्धि और लय का कार्यक्रम चलता है | कहा जाता है कि भगवान शिव इस गुफा से पहले-पहल श्रावण की पूर्णिमा को आये थे इसलिए उस दिन अमरनाथ की यात्रा के विशेष महत्व है | इस महीने तक अमरनाथ मार्ग में बर्फ छाई रहती है किन्तु यह यात्रा कठिन अवश्य है |श्रावण के बाद तो शीघ्र ही वहा ठंडा मौसम प्रारम्भ हो जाता है इसलिए यात्रा के लिए सुविधाजनक श्रावण का महीना ही है |
धार्मिक तीर्थ स्थल का वर्णन
दर्शनार्थियों का एक बड़ा जुलुस प्रतिवर्ष श्रीनगर से श्रावण सुदी पंचमी को रवाना होता है | इसका नेतृत्व कश्मीर शारदा पीठाधीश्वर श्री शंकराचार्य जी करते है | जुलुस के साथ एक रौप्य निर्मित दंड शिवजी के झंडे के साथ भी आगे चलता है | साधू , नागा , महंत , संत , वैरागी , सन्यासी और गृहस्थ आदि सभी तरह के लोग श्रुद्धापूर्वक भारत के सभी भागो से श्रीनगर में एकत्रित होने के बाद इस दिन प्रस्थान करते है | अमर’नाथ के लिए इस वार्षिक संघ को सभी प्रकार की सहायता कश्मीर राज्य के धर्मार्थ विभाग की ओर से मिलती है | राज्य के सरकारी कर्मचारी-पुलिस आदि का प्रबंध भी अच्छा ख़ास होता है | कपड़े , छोलदारी , दवाखाना आदि यात्री दल के साथ रहता है |
संघ श्रीनगर से जो 5260 फुट की ऊँचाई पर है रवाना होता है और पहले दिन दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित पामपुर (पद्मपुर) पहुचता है जो 15 किमी अंत पर है | पामपुर केसर की क्यारियों के लिए प्रसिद्ध है | आश्विन पूर्णिमा में यहाँ केसर फूलता है | दुसरे दिन यात्रियों का जुलुस अवन्ती पुर पहुचता है जो दक्षिण पूर्व में ही ओर आगे चलकर जाता है | तीसरा पड़ाव वृजविहार में पडता है यहाँ से यात्री अनंतनाग होकर गुजरती है जो 4300 फुट की ऊँचाई पर स्थित है | फिर गौतमनाग होते हुए वे भटन पहुचते है | यहाँ पहुचने के बाद यात्री सूर्य भगवान की पूजा एवं श्राद्ध करते है |
प्राचीन विख्यात सूर्य मन्दिर के ध्वंसावशेष यहाँ एक ऊँचे समतल पर है जो अनंतनाग से 8 किमी दूर है | यहाँ का दृश्य बड़ा ही सुंदर है | इसे कश्मीर की वास्तुकला का सिंह कहा जाता है | इस मन्दिर में एक आंगन है और बीच में मुख्य स्थान है जिसके चारो ओर स्तम्भ है | इस पर नक्काशी का सुंदर काम किया गया है | इसकी मेहराबे बड़ी सुंदर है इसका निर्माण कश्मीर के राजा ललितादित्य ने आठवी शताब्दी में कराया था |
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