
भारतवर्ष में प्रमुख रूप से चार धाम है जो इस प्रकार है पहला द्वारा धाम , दूसरा बद्रीनाथ धाम (Badrinath) , तीसरा रामेश्वरम धाम और चौथा जगन्नाथ धाम | इन चार धामों में से सबसे प्रमुख धाम बद्रीनाथ धाम है | पुराणों के अनुसार बद्रीनाथ (Badrinath) भारत का सबसे प्राचीन क्षेत्र है इसकी स्थापना सतयुग की मानी जाती है |
बदरी अर्थात बेर के घने वन होने के कारण इस क्षेत्र का नाम “बदरी-वन” पड़ा | आदि युग में नर और नारायण , त्रेता में भगवान राम , द्वापर में भगवान वेदव्यास और कलियुग में शंकराचार्य ने बद्रीनाथ में ही शान्ति अर्जित कर धर्म और संस्कृति के सूत्र पिरोये | शंकराचार्य जी के समय से यह क्षेत्र बद्रीनाथ के नाम से प्रसिद्ध है |
बदरिकाश्रम (Badrinath) इसलिए भी प्रसिद्ध है क्योंकि वहां व्यास मुनि का आश्रम था | “बररी-वन” में जन्म होने के कारण ही उन्हें “बादरायण” कहा गया | उन्होंने वेदों का पूर्ण प्रबंध किया इसलिए वेदव्यास कहलाये | बद्रीनाथ की यात्रा पहले बहुत कठिन मानी जाती थी | पांच-छसौ से अधिक यात्री बद्रीनाथ अत्यंत कठिनाई से पहुच पाते थे इसलिए भी बद्रीनाथ दर्शन का महत्व अधिक और परमपूण्य कार्य माना जाता था |
पर्यटन की धार्मिक एवं सांस्कृतिक अवधारणा
कहा जाता है कि नर और नारायण नाम के दो ऋषियों ने जो धर्म और कला के पुत्र थे और भगवान विष्णु के चतुर्थ अवतार थे , बदरिकाश्रम में अध्यात्मिक शान्ति प्रपात करने के लिए कठोर तपस्या की | उनकी कठोर तपस्या को देखकर इंद्र डर गये और उनकी तपस्या भंग करने के लिए कुछ अप्सराये भेजी | इससे नारायण इतने क्रुद्ध हुए कि इंद्र को श्राप देने लगे , पर उन्हें नर ने शांत कर दिया |
फिर नारायण ने उर्वशी की सृष्टि की , जो उन अप्सराओं से कही अधिक सुंदर थी | उर्वशी को उन्होंने इंद्र की सेवा में भेंट कर दिया | अप्सराओं ने जब नारायण से विवाह करने का विशेष अनुरोध किया तो उन्होंने अपने अगले (श्रीकृष्ण) जन्म में उनके साथ विवाह करने का वचन दिया | अपने अगले अवतार में नर और नारायण अर्जुन और कृष्ण हुए |
धर्म , संस्कृति , साहित्य और इतिहास की साधना के लिए प्रसिद्ध बद्रीनाथ धाम आदिकाल से भारत-तिब्बत सीमा का प्रहरी भी रहा है | शंकराचार्य ने इसे सुनियोजित सैनिक शिविर का रूप दिया | इस स्थान का सैनिक महत्व भी है क्योंकि हिमालय के दो दर्रे माना और निति यही आकर मिलते है | अब तिब्बत पर चीन का आधिपत्य हो जाने के कारण इस क्षेत्र का सैनिक महत्व ओर भी बढ़ गया है |
ऐसा कहा जाता है कि बौद्ध धर्म की स्थापना हो चुकी थी | तिब्बतियों ने उसके बाद भारत पर चढाई या आक्रमण करके बद्रीनाथ धाम को तहसनहस कर दिया और भगवान विष्णु की प्रतिमा को नारद कुंड में फेंकवा दिया | शंकराचार्य ने जब फिर से हिन्दू धर्म का प्रचार किया तब नारद कुंड से उस प्रतिमा को निकलवाकर वही स्थित गरुड़गुफा में स्थापित कर दिया | आगे चलकर चन्द्रवंशी गढ़वाल नरेश ने यहाँ के मन्दिर का निर्माण करा दिया जिस पर इंदौर की महारानी ने सोने का शिखर चढाया जो आज भी दमकता है |
बद्रीनाथ (Badrinath )तभी से पवित्र तीर्थ ही नही , वरन भारत की भावनात्मक एकता का आधार-पीठ बन गया और यह नियम बन गया कि दक्षिण में स्थित केरल के नम्बूदरीपाद “रावल” की इस प्रतिमा का स्पर्श कर सकते है |
पर्यटन स्थल का वर्णन
बद्रीनाथ मन्दिर (Badrinath) हिममंडित नर और नारायण पर्वतों के बीच में स्तिथ है | नारायण पर्वत से सदैव भारी भरकम हिमशिलाये खिसकती रहती है किन्तु आज तक मन्दिर को कोई क्षति नही हो पायी जो एक अद्भुद चमत्कार है | बद्रीनाथ में पांच तीर्थ है ऋषि गंगा , कुर्मधारा , प्रहलादधारा , तप्तकुंड और नारदकुंड | बद्रीनाथ में कुछ पवित्र शिलाए भी है जिनके नाम है नारदशिला , मार्कण्डेय शिला , नरसिंह शिला और गरुड़ शिला आदि | बद्रीनाथ से उत्तर अलकनंदा नदी के दाहिने किनारे पर प्रसिद्ध , ब्रह्मा का पाल है जहां तीर्थयात्री अवश्य ही जाते है | यहाँ पूर्वजो का श्राद्ध भी किया जाता है |
अलकनंदा के दांये तट पर नारायण का 45 फीट ऊँचा मन्दिर है पूर्व दिशा में इसका द्वार है | मन्दिर के उपर एक स्वर्ण कलश स्थापित है | मन्दिर के भीतर भगवान नारायण पद्मासन में बैठे है | उनके दोनों हाथ योगमुद्रा में है | प्रतिमा काली-शालिग्राम पत्थर की है जो लगभग तीन फीट ऊँची है | दाई ओर नर और नारायण की पत्थर की मुर्तिया है और बांयी तरफ गरुड़ तथा कुबेर की | बदरी से लगभग आठ मील की दूरी पर वसुंधरा तीर्थ है जहां पर आठ वसुओ ने तपस्या की थी | यहाँ जाना सबसे अधिक कठिन है | पहाड़ से जल गिरता रहता है | शास्त्रों में वर्णित पंच सरोवर में एक नारायण सरोवर भी बदरिकाश्रम में ही है |
बद्रीनाथ के प्रमुख दर्शनीय स्थल
गुप्त काशी – मन्दाकिनी नदी के किनारे गुप्तकाशी है जो रुद्रप्रयाग से 38 किमी दूर है | यहाँ पर चढाई इतनी विकट है कि लोग घोडा या डांडी से आते है | बहुत से भक्तगण पैदल भी जाते है | चढाई आरम्भ होने के स्थान को अगस्त्य मुनि कहते है यही पर अगस्त्य का मन्दिर भी है | सामने वणासुर की राजधानी के भग्नावशेष है | चढाई खत्म होने पर गुप्तकाशी के दर्शन होते है | गुप्तकाशी में एक कुंड है जिसका नाम है मणिकर्णिका कुंड | भक्त इस कुण्ड में स्नान करते है | कुंड में दो जल धाराए बराबर गिरती रहती है जो गंगा और यमुना नाम से जानी जाती है | कुंड के सामने विश्वनाथ का मन्दिर है उअर उसी से मिला हुआ अर्धनारीश्वर का मन्दिर है |
जोशीमठ – पीठाधीश जगतगुरु शंकराचार्य का उत्तरपीठ होने के कारण यह स्थान भी अत्यंत पवित्र माना जाता है | सर्दी के दिनों में बद्रीनाथ जी (Badrinath) की चलमूर्ति यहाँ आकर लगभग छह महीने रहती है | यहाँ पर ज्योतीश्वर शिव और भक्तवत्सल भगवान शाम के दो मन्दिर है |
पंचप्रयाग – गढवाल प्रांत में ऋषिकेश से बद्रीनाथ (Badrinath) के बीच पांच प्रसिद्ध प्रयाग है देवप्रयाग , रुद्रप्रयाग , कर्णप्रयाग , नन्दप्रयाग और विष्णुप्रयाग | देवप्रयाग , अलकनंदा और भागीरथी नदी का संगम स्थल है | यही पर से भागीरथी का नाम गंगा पड़ता है | यह स्थान सुदर्शन क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है | यहाँ श्री रघुनाथ जी का मन्दिर स्थापित है | मन्दिर दर्शन करने के लिए देश के कोने-कोने से भक्त आते है | भागीरथी संगम से पहले अलकनंदा तीन ओर नदियों से मिलती है | मन्दाकिनी नदी के संगम स्थल को रूद्रप्रयाग कहते है | यही से केदार यात्रा का मार्ग है | रूद्रप्रयाग के उपर अलकनंदा नदी से संगम करती है नन्दप्रयाग नामक स्थान पर और उससे पहले संगम होता है | कर्णप्रयाग पर पिंडर नामक नदी से एक ओर संगमस्थल विष्णुप्रयाग का मार्ग भे है | जो जोशीमठ से पांच किमी पर है |
तपोवन – जोशीमठ से नितिधारी की ओर जाने वाले मार्ग से लगभग 10 किमी की दूरी पर तपोवन नामक पवित्र स्थान है | यह गर्म पानी का एक कुंड है और वहां से पांच किमी पर विष्णु मन्दिर है | यही निकट की एक वृक्ष है जिसके नीचे प्राकृतिक रूप से विष्णु मूर्ति का निर्माण हो रहा है | कहा जाता है कि जोशीमठ के पास नरसिंह मन्दिर की मूर्ति की के बांह बहुत ही पतली है | जब यह टूटेगी तो बद्रीनाथ के दोनों ओर पहाड़ , नर और नारायण आपस में मिल जायेंगे और बद्रीनाथ मन्दिर हमेशा के लिए बंद हो जाएगा |
बद्रीनाथ पहुचने के विविध मार्ग
पहले बद्रीनाथ (Badrinath) की यात्रा अत्यंत कठिन समझी जाती थी और यात्री बद्रीनाथ की यात्रा से पहले ही अपना अंतिम संस्कार करा लिया करते थे |बद्रीनाथ और केदारनाथ जान का मुख्य मार्ग ऋषिकेश से आरम्भ होता है | ऋषिकेश से बद्रीनाथ की दूरी 295 किमी है | इन दोनों स्थानों के लिए बस यात्रा सुलभ है | पहले रास्ता उबड-खाबड़ होने के कारण , पैदल ही यात्रा करनी पडती थी परन्तु सडक मार्ग बन जाने से यह यात्रा बहुत ही आरामदेह हो गयी है |
बद्रीनाथ (Badrinath) और केदारनाथ कोटद्वार और काठगोदाम होकर भी जाया जा सकता है | कोटद्वार से श्रीनगर की दूरी लगभग 138 किमी है | यहाँ से बद्रीनाथ लगभग 230 किमी दूर है | काठगोदाम से रानीखेत होकर कर्णप्रयाग यदि आप पहुचे तो वहा से बद्रीनाथ लगभग 125 किमी दूर रह जाता है | ब्द्रीनात हरिद्वार से लगभग 318 किमी है | माना दर्रे से बद्रीनाथ की दूरी 50 किमी है | यह मन्दिर जैसी घाटी है जो पांच किमी लम्बी उअर लगभग दो किमी चौड़ी है | इसके अतिरिक्त दिल्ली ,लखनऊ , चंडीगढ़ ,सहारनपुर , नैनीताल , काठगोदाम ,बरेली से सीधी बस सेवा उपलब्ध हो गयी है |
पर्यटन का उचित समय
यदि प्राकृतिक सौन्दर्य का लुत्फ़ उठाना हो तो कभी भी जाया जा सकता है लेकिन दर्शनार्थियों के लिए बद्रीनाथ की यात्रा का सबसे उत्तम माह मई से नवम्बर तक रहता है | यहाँ पर ठहरने के लिए अनेको धर्मशालाये और होटल है जहां सस्ते में रहा जा सकता है |
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