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हरिद्वार के प्रमुख दर्शनीय स्थल | Haridwar Tour Guide in Hindi

हरिद्वार के प्रमुख दर्शनीय स्थल | Haridwar Tour Guide in Hindi
हरिद्वार के प्रमुख दर्शनीय स्थल | Haridwar Tour Guide in Hindi

हरिद्वार (Haridwar) नवसृजित उत्तराखंड के 13 जनपदों में से एक है | हिमालय की गोद में बसे गोमुख से निकली गंगा नदी के दाहिने तट पर बसा यह नगर विश्वभर में एक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में ख्याति पाए हुए है | हरिद्वार (Haridwar) का प्राचीन नाम “मायापुरी” है | मायापुरी ,हरिद्वार , कनखल , ज्वालापुर और भीम गोडा इन पाँचो पुरियो को मिलाकर हरिद्वार कहा जाता है  वास्तव में प्रकृति का यह लोक मायालोक ही दिखता है | चारो ओर हरी-भरी पहाडियों से घिरा हरिद्वार नगर हिन्दुओ का प्रमुख धार्मिक स्थल है | उत्तराखंड के चारो धामों का प्रवेशद्वार हरिद्वार ही है | धार्मिक स्थल होने के कारण वर्षभर सैलानियों का ताँता लगा रहता है | यहाँ वर्ष भर देश-विदेश के संख्य पर्यटक घुमने के लिए आते है |

हरिद्वार की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पृष्टभूमि

पुराणो के अनुसार हरिद्वार (Haridwar) में ही ब्रह्माजी ने इस स्थान पर विशाल यज्ञ किया था | ब्रह्मकुंड में सभी यात्री स्नान करते है | ब्रह्मकुंड के पास पत्थर के एक मन्दिर में भगवान विष्णु के “चरण चिन्ह” है | उस मन्दिर के साथ लगा हुआ जो घाट है उसे हर की पैडी के नाम से जाना जाता है | हर की पैडी से थोड़ी दूर पर “भीमगौड़ा” नामा स्थान आता है | भीमगोडा के विषय में कहा जाता है कि महाभारत के समय भीमसेन गंगा की गति का निरिक्षण करने गया था | भीमसेन उसी स्थान पर अश्व पर चढने का प्रयास करने लगे | उसी समय उनके घोड़े के पैर फिसल जाने से उस स्थान पर एक कुंड का निर्माण हो गया | कालान्तर में यही कुंड “भीम गोडा” के नाम से प्रसिद्ध हुआ |
हरिद्वार (Haridwar) की प्राकृतिक संरचना ही इतनी खुबसुरत है कि यह बरबरा ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है | हरिद्वार (Haridwar) के एक ओर हिमालय पर्वत की पर्वतमाला है | पूर्व से पश्चिम की ओर से मिलती हुयी शिवालिक की दो शाखाए मनोहर दृश्य उपस्थित करती है | उन्ही शाखाओं से हरिद्वार के “द्वादेश” की रचना होती है | उपत्यका के बीच में भिन्न-भिन्न दिशाओं के सात धाराए उसमे आकार उस स्थान की सुन्दरता में वृद्धि करती है |

तीर्थ स्थल का दर्शनीय विवरण

गंगाद्वार , कुशावर्त , बिल्केश्वर , नीलपर्वत तथा कनखल ये पांच प्रधान तीर्थ हरिद्वार में है | मान्यता है कि इनमे स्नान और दर्शन करने से पूर्वजन्म नही होता | इसके अतिरिक्त चीला एवं नील धारा पक्षी विहार , भारत माता मन्दिर , चंडी देवी , सप्त सरोवर , शान्ति कुन्ज , पवन धाम ,भूपतवाला आश्रम अन्य दर्शनीय स्थल है |
ब्रह्मकुंड या हर की पैडी – राजा भागीरथ के मर्त्यलोक में गंगा को लाने पर राजा श्वेत ने इसी स्थान पर ब्रह्माजी की बड़ी तपस्या की थी | उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने वर मांगने को कहा | राजा ने कहा कि यह स्थान आपने नाम से प्रसिद्ध हो और यहाँ आप , भगवान विष्णु तथ महेश एक साथ निवास करे तथा यहाँ सभे तीर्थो का वास हो | ब्रह्मा ने कहा “ऐसा ही  होगा | आज से यह कुंड हहमारे नाम से प्रसिद्ध होगा और इसमें स्नान करने वाले परम पद के अधिकारी होंगे” तभी इसका नाम ब्रह्मकुंड हुआ |
गौघाट – ब्रह्मकुंड के दक्षिण में एक घाट स्थित है जिसे गऊघाट के नाम से जाना जाता है | इस स्थान के विषय में मान्यता है कि यहाँ नहाने के पश्चात गौहत्या का पाप नष्ट हो जाता है |
कुशावर्त घाट – यह घाट गऊघाट से दक्षिण में पड़ता है | यहाँ दत्तात्रीय जी ने तप किया था | यहाँ पितरो का पिंडदान किया जाता है |
बिल्वकेश्वर – स्टेशन से हर की पौड़ी के रास्ते में जो ललतारो नदी का पक्का पुल पड़ता है वही से बिल्वकेश्वर महादेव का रास्ता जाता है | रेलवे लाइन के उस पार बिल्व पर्वत है उसी पर बिल्वकेश्वर महादेव है | मन्दिर तक जाने का रास्ता सुगम है | बिल्वकेश्वर महादेव की दो मुर्तिया है एक मन्दिर की अंदर और दुसरी मन्दिर के बाहर | बिल्वकेश्वर महादेव की बांयी ओर गुफा में देवी की मूर्ति है | दोनों मन्दिरों के बीच में एक नदी है | जिसका नाम शिवधरा है |
नीलधारा – नहर के उस पार नीलपर्वत के नीचे वाली गंगा की धारा को नील धारा कहते है | कहा जाता है कि शिवजी ने नील पर्वत के नील नामक एक गण ने यहाँ पर शंकर जी की प्रसन्नता के लिए घोर तपस्या की थी इसलिए इस पर्वत का नाम नीलपर्वत , नीचे की धारा का नाम नीलधारा तथा उसने जिस शिवलिंग की स्थापना की उसका नाम नीलेश्वर पड़ा |
कनखल – हरिद्वार (Haridwar) में ही कनखल एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है | इस स्थान के संबध में यह कथा प्रचलित है कि नीलधारा एवं गंगा की धारा वाले संगम स्थल पर स्नान के पश्चात एक (खल) राक्षस को मोक्ष की प्राप्ति हुयी थी तभी से यह स्थान कनखल कहलाता है |
दक्षेश्वर महादेव – मुख्य बाजार से दक्षप्रजापति मार्ग पर एक किमी आगे जाने पर दक्षप्रजापति का मन्दिर मिलता है |इस स्थान पर शिवरात्री में बड़ा मेला लगता है |
सतीकुंड – दक्षेश्वर से एक किमी दूर पश्चिम में सतीकुंड है | कहते है कि दक्ष प्रजापति ने एक बार इस स्थान पर यज्ञ का आयोजन किया था उस यज्ञ में शिवजी के अतिरिक्त सभी देवताओं को आमंत्रित किया था |सती अपने पति का अपमान सहन नही कर सकी और हवन कुंड में जलकर ही शरीर त्याग दिया था तभी से यह स्थान सतीकुंड कहलाता है | इस कुंड में स्नान करने का विशेष महात्म्य है |
भीमगोडा – हर की पैडी से पहाड़ के नीचे होकर जो सड़क ऋषिकेश को जाती है उस पर यह तीर्थ है | पहाडी के नीचे एक मन्दिर है उसके आगे एक चबूतरा तथा कुंड है | कुंड में पहाडी का स्त्रोत का पानी आता है | कहा जाता है कि भीमसेन ने यहाँ तपस्या की थी और उनके घोडा (पैर के घुटने) टेकने से यह कुंड बन गया था और इसी कारण इसका नाम भी यही पड़ गया | यहाँ स्नान का बड़ा महत्व है |
चंडी देवी मन्दिर एवं मनसा देवी – हरिद्वार मुख्यत: दो पहाडियों के बीच स्तिथ है | इन दोनों पहाडियों को चंडी पहाड़ और मनसा पहाड़ कहते है | इन दोनों पहाडियों पर ही एक एक देवी मन्दिर है | चंडी पहाड़ पर चंडी देवी और मनसा पहाड़ पर मनसा देवी मन्दिर है |

हरिद्वार पहुचने के मार्ग

हरीद्वार (Haridwar) वस्तुत: उत्तराखंड का प्रवेश-द्वार कहलाता है | इसे हिमालय का प्रवेश द्वार भी कहते है | दिल्ली से हरिद्वार (Haridwar) लगभग 262 किमी दूर है | दिल्ली में दिन में अनेक बसे हरिद्वार के लिए रवाना होती है | दिल्ली , मुम्बई , कोलकाता , पटियाला , उत्तर प्रदेश आदि बड़े शहरों से हरिद्वार सड़क एक रेल द्वारा जुड़ा हुआ है | अत: अनेक रेले एवं बसे यहाँ के लिए उपलब्ध है | यहाँ से ऋषिकेश केवल 24 किमी दूर है |
ऋषिकेश से देवप्रयाग ,कीर्तिनगर और श्रीनगर होती हुयी बस रूद्रप्रयाग जाती है | केदारनाथ को जाने वाले यात्री यही उतर जाते है | आगे बद्रीनाथ के मार्ग पर बस जाती है | गंगोत्री एवं यमुनोत्री के लिए ऋषिकेश से नरेंद्रनगर होती हुयी धरासू तक बस जाती है | यमुनोत्री जाने वाले यात्री धरासू से स्याना चटी तक बस द्वारा जा सकते है और गंगोत्री जाने वाले यात्री धरासू से दुसरी बस द्वारा लंका चट्टी तक जा सकते है |
हरिद्वार (Haridwar) शहर में घुमने के लिए सिटी बसों की अच्छी व्यवस्था है | इसके अतिरिक्त तांगे , रिक्शे ,स्कूटर आदि भी आसानी से मिल जाते है |

पयर्टन का उचित समय और ठहरने की व्यवस्था 

हरिद्वार (Haridwar) जाने के लिए अप्रैल से जून तथा सितम्बर से अक्टूबर का समय उचित माना जाता है |हरीद्वा में ठहरने और खाने पीने के लिए अनेक धर्मशालाये एवं होटल है अत: आवास और भोजन संबधी कोई भी कठिनाई नही है |

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