
हिमालय के पर्वतीय तीर्थो की यात्राओं में कैलाश मानसरोवर (Kailash Mansarovar) यात्रा ही सबसे कठिन मानी जाती है | इसकी कठिनाई की तुलना केवल बद्रीनाथ से आगे स्वर्गारोहण की या मुक्तिनाथ की यात्रा से ही की जा सकती है | कैलाश-मानसरोवर (Kailash Mansarovar),अमरनाथ , गंगोत्री , स्वर्गारोहण जैसे क्षेत्रो की यात्रा में ,जहा यात्री को समुद्र स्तर से 12 हजार फुट उपर या उससे अधिक ऊँचाई पर जाना पड़ता है |
कैलाश मानसरोवर की धार्मिक पृष्टभूमि
हिमालय के तिब्बत प्रदेश में स्थित एक तीर्थ जिसे गण पर्वत और रजतगिरी भी कहते है | कैलाश के बर्फ से आच्छादित 22,028 फुट ऊँचे शिखर और उससे लगे मानसरोवर का यह तीर्थ मानस खंड भी कहलाता है | माना जाता है कि प्राचीन साहित्य में वर्णित “मेरु” भे यही है | पौराणिक अनुश्रुतियो के अनुसार शिव और ब्रह्मा आदि देवगण , मरीच आदि ऋषि एवं रावण ,भस्मासुर आदि ने यही तप किया था | पांडवो के दिग्विज प्रयास के समय अर्जुन ने इस प्रदेश पर विजय प्राप्त की थी | आदि शकंराचार्य ने इसी के आसपास कही अपना शरीर त्याग किया था |
तीर्थस्थल का महत्व | Kailash Mansarovar Sginificance
मानसरोवर (Kailash Mansarovar) धार्मिक महत्व के लिए विख्यात है | लोगो की यह धारणा है कि एक परिक्रमा करने से एक जन्म का , दस परिक्रमाए करने से एक कल्प का पाप नष्ट हो जाता है | जो 108 परिक्रमाए पुरी करते है उन्हें जन्म-तरण से मुक्ति मिल जाती है |
तीर्थ स्थल का दर्शनीय विवरण
पुरे हिमालय को पार करके तिब्बती पठार में लगभग 50 किमी जाने पर पर्वतों स घिरे दो पावन सरोवर मिलते है |
मानसरोवर – माँ सती के 51 शक्तिपीठो में एक पीठ मानसरोवर भी है | यह कहा जाता है कि माँ सती की दाहिनी हथेली इसी में गिरी थी | मानसरोवर का जल सामान्य शीतल है | उसमे मजे से स्नान किया जा सकता है | उसके तट पर रंग-बिरंगे पत्थर और कभी कभी स्फटिक के छोटे टुकड़े भी पाए जाते है | इसका जल अत्यंत स्वच्छ और अद्भुद नीलाभ है | इसका आकार लगभग गोल या अंडाकार है और इसका बाहरी घेरा लगभग 40 किमी का है |
राक्षस ताल – राक्षस ताल का क्षेत्रीय विस्तार काफी बड़ा है | वह गोल या चौकोर नही है |कहा जाता है कि किसी समय में राक्षसराज रावण ने यही खड़े होकर देवाधिदेव भगवान शंकर की आराधाना की थी |
कैलाश – मानसरोवर से लगभग 35 किमी दूर है | वैसे उसके दर्शन मानसरोवर पहुचने से बहुत पूर्व होने लगते है | तिब्बत के लोगो को कैलाश के प्रति अपार श्रुद्धा है | अनेक तिब्बती श्रुद्द्धालू पुरे कैलाश (Kailash Mansarovar) की परिक्रमा दंडवत प्रणिपात करते हुए पुरी करते है | शिवलिंगाकार कैलाश पर्वत आसपास के समस्त शिखरों से अधिक ऊँचा है | वह कसौटी के ठोस काले पत्थर का है और उपर से नीचे तक दुग्धोज्वल बर्फ से ढका रहता है किन्तु उससे लगे हुए पर्वत , जिनके शिखर कमलाकार हो रहे है कच्चे लाल मटमैले पत्थर के है | आसपास के सभी पर्वत इस प्रकार के कच्चे पत्थरों के है | कैलाश अकेला ही यहाँ ठोस काले पत्थर का शिखर है | कमलाकार शिखर क्योंकि कच्चे पत्थर है उनके शिखर गिरते रहते है | एक ओर के चार पंखुड़ियो जैसे शिखर इतने गिर गये है कि अब उनके शिखरों के भाग कदाचित कुछ वर्षो मर बराबर हो जाए |
एक बात ओर ध्यान देने योग्य है कि कैलाश के शिखर के चारो कोनो में ऐसी मंदराकृति प्राकृतिक रूप से बनी हुयी है जैसी बहुत से मन्दिरों के शिखरों के चारो ओर बनी होती है | कैलाश के द्ढ़सं करते ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि वह असामान्य पर्वत है देखे हुए समस्त शिखरों से सर्वथा भिन्न और दिव्य |
परिक्रमा – यात्रियों को कैलाश (Kailash Mansarovar) की परिक्रमा करने के लिए लगभग 50 किमी की दूरी तय करनी पडती है |यह दूरी यात्रियों द्वारा प्राय: तीन दिनों में पुरी की जाती है | यह परिक्रमा कैलाश शिखर की उसके चारो ओर के कमलाकार शिखरों के साथ देनी है | क्योंकि कैलाश शिखर तो अस्पृश्य है और उसका स्पर्श यात्रामार्ग से लगभग ढाई किमी सीधी चढाई करके ही किया जा सकत अहिया और यह चढाई पर्वतारोहण की विशिष्ट तैयारी के बिना सम्भव नही है | समुद्रतल से 22,000 फुट की ऊँचाई पर कैलाश शिखर स्थित है | कैलाश (Kailash Mansarovar) के दर्शन और परिक्रमा करने पर अद्भुत शांति एवं पवित्रता का अनुभव होता है |
परिक्रमा मार्ग
- तारचिन से लंडीफु (नन्दी गुफा) 6 किमी – मार्ग से परन्तु मार्ग से दो किमी और ओर सीधी चढाई करके उतर आना पड़ता है |
- डेरफू 14 किमी – यहाँ से सिंध नदी का उद्गम डेढ़ किमी ओर उपर है |
- गौरी कुंड 5 किमी – कड़ी चढाई ,बर्फ , समुद्र तल से 19,000 फुट उपर |
- जंडलफू 20 किमी – दो किमी उतराई
- तारचिन – 10 किमी |
यात्रा मार्ग | Kailash Mansarovar Tekk
यात्रा आरम्भ करने के लिए टनकपुर रेलवे स्टेशन पहुचकर पिथौरागढ़ पहुचते है जो लगभग 180 किमी दूर है | यहाँ से अस्स्कोट तक भी सडक मार्ग है | अल्मोड़ा से अगर यात्रा आरम्भ करे तो अल्मोड़ा से अस्स्कोट की दूरी 135 किमी है | अस्स्कोट से अगला पडाव बलवाकोट 22 किमी है | 18 किमी आगे धारचुला नामक स्थान है | यहाँ पर एक डाक बंगला है | यही पर कुली सवारी आदि भी बदलनी पडती है |
धारचूला से 22 किमी पर खेला नामक स्थान आता है | यहाँ से पांच हजार फुट तक सीधी चढाई है | काफी कठिनाई आती है | इस चढाई के बाद तिथीला नामक स्थान है | टीथिला से 8,000 फुट की उंचाई पर गालाधार पडाव आता है | गालाधार से निरपनी अत्यंत दुर्गम है | इस मार्ग में दो पडाव आते है मालपा एवं बुधी | यहाँ पर यात्री कुछ अधिक विश्राम करते है | इसके बाद के पडाव गरब्यांग है जो कि भारत में अंतिम पडाव है | यहाँ पर यात्री विश्राम करे और यात्रा के लिए आवश्यक सभी खरीददारिया यही कर ले |
गरब्यांग से कालापानी , संगचुन होते हुए 50 किमी तक तकलाकोट तिब्बत का पहला गाँव है | यहाँ प्रतिवर्ष जयेष्ट से कार्तिक तक बड़ा बाजार लगता है | चीन गणराज्य ने यह बाजार बंद करवा दिया है | सामान्य बाजार सब भी है लेकिन भारतीय सिक्के यहाँ नही चलते है | तकलाकोट से 16 किमी दूर एक ओर रास्ते से खोजरनाथ तीर्थ है | गरब्यांग से चढाई शुरू होती है लिपूलेख दर्रे तक , लिपुलेख तक उंचाई 1670 फुट है | यहाँ से हिमालय और तिब्बत के ऊँचे प्रदेशो का दृश्य बड़ा ही मनोहारी है |
तकलाकोट से लगभग 15,000 फुट ऊँचाई पर चढने के बाद बालढांक नाक पडाव आता है | यहाँ से दो रास्ते है एक रक्षताल को जाता है और दूसरा गुरला दर्रे को पार करते हुए मानसरोवर तक जाता है | मानसरोवर झील की परिक्रमा लगभग 80 किमी है | दुसरी ओर रक्षताल है | इन दोनों सरोवरों का जल जमता नही है क्योंकि इनके नीचे गर्म पानी के सोते है |
तारचीन नामक स्थान जोकि मानसरोवर से लगभग 18 किमी दूर स्तिथ है | यही से कैलाश पर्वत की परिक्रमा आरम्भ होती है | कैलाश की परिक्रमा में लगभग तीन दिन का समय लगता है | मानसरोवर तीन बड़ी नदियों सतलज ,सरयू और ब्रह्मपुत्र का उद्गम स्थान है |
आवास व्यवस्था
हर पडाव पर अपने साथ लाये गये तम्बुओ में ठहरना होता है | आजकल मानसरोवर के पास ही ठहरने की धर्मशाळा बन रही है और अन्य जगहों पर जल्द ही ठहरने खाने-पीने की सुविधाए होने की भी आशा है |
आवश्यक सामग्री
हिमालय क्षेत्र की उक्त सभी यात्राओं में प्राय: एक सी साम्रगी आवश्यक होती है |
- एक कोई ऐसा कपड़ा , जिसमे सब सामान लपेटा जा सके और वर्षा होएं पर भीगे नही |
- थोड़ी खटाई , इमली या सूखे आलूबुखारे , जो चढाई में जी मिचलाने पर खाए जा सके |
- कुछ दवाये जिनकी आपको आवश्यकता पड़ सकती है और चोट लगने पर मरहम |
- वैसलीन तथा धुप का चश्मा
- मोमबती , टोर्च ,अतिरिक्त सेल या लालटेन
- भोजन बनाने के हल्के बर्तन | स्टोव रखना सुविधाजनक रहता है |
- पुरे सूती और उनी कपड़े |
- सिर पर उनी टोपे (मंकी कैप)
- गुलबन्द , जिससे सिर और कान बांधे जा सके |
- उनी मोज़े और सादे मोज़े पहनने का अभ्यास हो |
- उनी दस्ताने
- छाता
- बरसाती कोट एवं टोपी
- ऐसे जूते जो बर्फ और पत्थरों पर भी काम दे सके | बाटा के मोटे रबर वाले स्नो शु सबसे अच्छे रहते है |
- बल्लम के समान नीचे लोहे से जड़ी सिर तक उंचाई की लाठी जिसके सहारे आश्यकता होने पर कूदा जा सके |
- दो अच्छे मोटे कम्बल |
अन्य महत्वपूर्ण आवश्यकताये
- मानसरोवर कैलाश यात्रा (Kailash Mansarovar) में जब आब तिब्बत की सीमा पर पहुचेंगे ,तब कम्युनिस्ट चीन के सैनिक आपकी तलाशी लेंगे | पूजा-पाठ की पुस्तको के अतिरिक्त अन्य कोई भी पुस्तक , नक्शे ,समाचार पत्र , दूरबीन , कैमरा , बंदूक ,पिस्तौल जैसे शस्त्र वे साथ नही ले जाने देते | यदि आपके पास ऐसी सामग्री हो तो भारतीय सीमा पर ही छोड़ दे या अंतिम डाकघर से अपने घर पार्सल भेज दे |
- जहां से बर्फ मिलना आरम्भ होता है वहां से भारतीय सीमा में लौटने तक प्रात: सांय दोनों समय पुरे मुख पर और हाथो में विशेषत:हथेली के पृष्ट भाग में वैसलीन अच्छी तरह लगाते रहिये | यदि आप ऐसा नही करेंगे तो आपके हाथ फट सकते है और मुख विशेषत: नाक पर हिमदंश के घाव हो सकते है |
- घाटी पार करने के दिन प्रात: सूर्योदय से जितना पहले चल सके , चल देना चाहिए | सूर्य की धुप तेज होने पर बर्फ नरम हो जाती है और उसमे पैर गड़ने लगेंगे | बर्फ में धुप पड़ने से जो चमक होती है उससे नेत्रों को बहुत पीड़ा होती है ऐसे समय में धुप का चश्मा लगाने से यह कष्ट नही होता |
- मार्ग में भारतीय सीमा का जो अंतिम बाजार है वहां से तिब्बती भाषा का जानकार एक गाइड अवश्य साथ ले जाना पड़ता है क्योंकि तिब्बत में कोई हिंदी या अंग्रेजी जानने वाला मिलना कठिन है | तिब्बत में पुरे समय तम्बू में ही रहना होता है इसलिए किराए का तम्बू भी उसी स्थान से लेना पड़ेगा |
- तिब्बत में दाल नही पकेगी कोई शाक भी नही मिलेगा | चावल या आटा तो बहुत महंगा मिलेगा | नमक को छोडकर कोई अन्य मसाला भी नही मिलेगा | कही कही दूध ,मक्खन ,दही और छाछ मिल सकता है लेकिन कही कही | इसलिए तिब्बत में जितने दिन रहना है उतने दिन की भोज्य साम्रगी अपने साथ रखकर चलना चाहिए |
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