
कुम्भ मेला (Kumbh Mela) हिन्दुओ की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है जहां पवित्र नदी में डुबकी लगाने के लिए लाखो हिन्दू एक स्थान पर एकत्रित होते है | पारम्परिक रूप से भारत एम् चार जगह पर कुम्भ मेलो का आयोजन होता है पहला प्रयाग कुम्भ मेला , दूसरा हरिद्वार कुम्भ मेला , तीसरा नासिक कुम्भ मेला और चौथा उज्जैन सिंहस्थ | इन चारो जगह पर हर 12 साल में कुम्भ मेले का आयोजन होता है आइये आज आपको कुम्भ मेले के इतिहास और महत्वपूर्ण तथ्यों से आपको अवगत कराते है |
#1 पौराणिक मान्यता है कुम्भ मेले की नींव
कुम्भ मेले का पौराणिक इतिहास समुद्र मंथन से शुरू होता है जब असुर और देवताओं के बीच अमृत को पाने के लिए समुद्र मंथन किया गया था | समुद्रमंथन से जब अमृत निकला तो उसे कुम्भ (घड़े) में रखा गया | उस कुम्भ को असुरो ने पहले ले लिया लेकिन भगवान विष्णु स्वरूप के मोहिनी स्वरूप ने अमृत कलश असुरो से छीन लिया और भागने लगे| भागते समय अमृत चार स्थानों पर गिरा इसी कारण इन चारो स्थान पर कुम्भ मेले का आयोजन होता है |
#2 ह्वेनसांग ने सबसे पहले जिक्र किया था कुम्भ मेले का
कुम्भ मेला (Kumbh Mela) कितने वर्षो से चल रहा है इसका कोई लिखित इतिहास नही है लेकिन चीनी यात्री ह्वेनसांग की भारत यात्रा के दौरान 644 ईस्वी में उसने इस मेले के बारे में लिखा था लेकिन उस समय उसे ये नही पता था कि इसका नाम कुम्भ मेला है लेकिन इसके बाद तवारीख (1695 ईस्वी)और चाहर गुलशन (1759 ई.) नामक पुस्तको में हरिद्वार ,प्रयाग और नासिक में लगने वाले कुम्भ मेलो का जिक्र किया था |
#3 तीन प्रकार के होते है कुम्भ मेले
हिन्दू पंचाग के अनुसार कुम्भ मेले को तीन प्रकारों में बांटा गया है
- महाकुम्भ – हर 144 वर्षो में (12 पूर्ण कुम्भो के पूर्ण होने पर)
- कुम्भ मेला – हर 12 सालो में आयोजित
- अर्द्ध कुम्भ – हर 6 साल में आयोजित (दो पूर्ण कुम्भ मेलो के बीच)
#4. कुम्भ में निकाली जाती है पेशवाई
कुम्भ में आयोजनों में पेशवाई का महत्वपूर्ण स्थान है | पेशवाई का अर्थ होता है प्रवेशाई यानि शोभायात्रा | ये शोभायात्रा दुनियाभर से आने वाले लोगो का स्वागत कर कुम्भ मेले के आयोजन को सूचित करने के लिए निकाली जाती है | पेशवाई में साधू-संत अपनी टोलियों के साथ बड़े धूमधाम के साथ प्रदर्शन करते हुए कुम्भ में पहुचते है | हाथी , घोड़ो , बग्घी ,बैंड-बाजो के साथ निकलने वाली पेशवाई का स्वागत एवं दर्शन करने के लिए मार्ग के दोनों तरफ भारी संख्या में श्रुद्धालू और सेवादार खड़े रहते है |
#5. राजाओं के शामिल होने पर शाही स्नान
कुम्भ (Kumbh Mela) में मकर सक्रांति के मौके पर पहला शाही स्नान होता है | संगम में डुबकी तो सन्यासी लगाते है मगर इसे शाही स्नान कहा जाता है | दरअसल पहले कुम्भ में पहले राजा-महाराजा भी आया करते थे और पहली डुबकी वही लगाते थे | उनके पीछे पीछे सन्यासी चलते थे | लेकिन अब राजा महाराजा तो रहे नही लेकिन अब शाही स्नान की परम्परा को सन्यासी निभाते है |
#7. शाही स्नान में पहली डुबकी संतो की
शाही स्नान की प्रक्रिया की शूरवात के रात्रि के तीसरे पहर से हो जाती है | लाखो की संख्या में सन्यासी , महंत और श्रुद्धालू संगम का रुख करते है लेकिन पहली डुबकी संत-सन्यासी ही लगाते है | श्रुधालुओ का नम्बर बाद में आता है | सन्यासियों का कौनसा अखाड़ा पहले डुबकी लगाएगा और कौनसा बाद में इसके नियम भी निर्धारित होते है |
#8. कुम्भ में होते है 6 शाही स्नान
तकरीबन दो महीने तक चलने वाले कुम्भ महापर्व के दौरान स्नान की कुछ विशेष तीथिया सुनिश्चित है |
- 15 जनवरी – मकर सक्रांति
- 21 जनवरी – पौष पूर्णिमा
- 4 फरवरी – मौनी अमावस्या
- 10 फरवरी – बसंत पंचमी
- 19 फरवरी – माघी पूर्णिमा
- 04 मार्च – महाशिवरात्रि
#9. मकर सक्रांति को पहला शाही स्नान
मकर सक्रांति से हर दिन कुम्भ का पवित्र माना जाता है | पर कुछ तिथि बेहद ख़ास होती है | इन्ही तिथियों को स्नान को शाही स्नान या राजयोगी स्नान कहते है | अलग अलग अखाड़ो के सदस्य ,संत-शिष्य शोभायात्राओ के साथ पहुचते है | आखाड़ो के शाही स्नान के बाद ही आम जनता को स्नान करने का मौका मिलता है |
#10. शंकराचार्य के अखाड़े
कुम्भ (Kumbh Mela) में अखाड़ो के शक्ल में हिन्दू धर्म के संगठित और विराट स्वरूप का दर्शन किया जा सकता है | ये स्वरूप आदिगुरु शंकराचार्य की देन है | उन्होंने संत-सन्यासियों को दशनामी परम्परा में बांटा था यानि दस अलग अलग समूहों में | अब इनकी संख्या 13 हो गयी है | जिन्हें अखाड़ा कहा जाता है | कुम्भ एक ऐसा मौका है जिसमे सभी अखाड़े एक साथ आ जाते है | 2015 कुम्भ में किन्नर अखाड़े का भी जन्म हुआ था जिसने उज्जैन कुम्भ में पहली बार पेशवाई निकाली थी |
#11. कुम्भ में अखाड़े होते है शामिल
सन्यासियों के साथ अखाड़े में सबसे पहले अवाहन अखाड़ा बना | 547 ईस्वी में आह्वान अखाड़े का पहला जिक्र मिलता है | जिसके बाद अटल , म्हानिर्वानी , हनन , निरंजनी और जुना अखाड़ा | सबसे आखिर में अग्नि अखाडा बना | सभी अखाड़ो में जुना अखाड़ा सबसे बड़ा माना जाता है | करीब साढ़े तीन लाख साधू जून अखाड़े में होते है |और कुम्भ में ये सभी अखाड़े में शामिल होते है |
#12. कुम्भ के रंग में रंगा प्रयागराज
कुम्भ के दौरान प्रयागराज आने वाले पर्यटकों और श्रुधालुओ के स्वागत के लिए PaintMyCity योजना तैयार की गयी | 27 करोड़ की लागत से शहर की दीवारों और प्रमुख इमारतो पर होने वाली पेंटिंग्स में देश के अलग अलग हिस्सों से आये 600 से ज्यादा कलाकार दिन-रातकाम कर रहे है | शहर में जगह जगह हो रही चित्रकारी में कही कुम्भ की भव्यता दिखाई जा रही है और कही भारतीय संस्कृति की झलक | कही पर महापुरुषों के चित्र उकेरे जा रहे है तो कही शहर के प्रमुख स्थलों के चित्र दीवारों पर बनाकर श्रुधलुओ को यादगार अनुभव के साथ विदा करने की कोशिश की जा रही है |
#13. कुम्भ में विश्व रिकॉर्ड बनाने की तैयारी
करीब 1 किमी लम्बी जेल की दीवार पर बनी समुद्र मंथन की चित्रकारी को गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराने की भी तैयारी है | इसके अलावा आम जनता भी अपने घरो को रंगकर इस अभियान में हिस्सा ले रहे है |
#14. कुम्भ में पाँच सितारा टेंट भी होंगे
इस बार श्रुधालुओ की सुविधाओं का ख्याल रखते हुए कुम्भ में पांच सितारा सुविधाओं से लेस टेंट सिटी भी बनाई गयी है इसमें श्रुधलुओ को Wi-Fi एवं अन्य तकनीकी सुविधाए भी मुहैया कराई जायेगी | इन लग्जरी टेंट हाउस का किराया सुविधा के हिसाब से अलग अलग है | यानी एक दिन का किराया करीब 12 हजार रूपये है जबकि लग्जरी केटेगरी का किराया 16 हजार से लेकर 35 हजार रूपये तक है | यही नही यहाँ ग्राहकों को अलग से GST भी देना होगा | टेंट सिटी के अपने स्नान घाट ,सुरक्षा व्यवस्था , रोड सर्विस , ट्रांसपोर्ट सर्विस , 24 घंटे रेस्तौरेंट की सुविधा उपलब्ध रहेगी |
#15. कुम्भ के लिए रेलवे की ख़ास तैयारियाँ
कुम्भ मेले (Kumbh Mela) के लिए लियरे रेलवे ने करीब 700 करोड़ का निवेश किया है | कुम्भ के लिए 41 परियोजनाए बनाई गयी है | इसके अलावा 800 विशेष ट्रेन इलाहबाद के लिए शुरू की गयी है | कुम्भ मेले के लिए रेलवे के यात्रियों के लिए नीला सरचार्ज न वसूलने का फैसला किया है |
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