
सन 1883 ई. में निपकाऊ के ध्यान में दूर वीक्षण की एक मूल कल्पना आयी जिसमे बिजली द्वारा दृश्यों को प्रेषित किया जा सके | उसने एक उपकरण का अविष्कार इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया | उसने दफ्ती या धातु के एक ऐसी गोल चकती बनाई जिसमे किनारों की ओर एक सर्पिल नमूने पर छोटे छोटे छेदों की पंक्ति थी | उसने दूरवीक्षण की सब बातो की कल्पना कर ली |
यदि किसी वस्तु का चित्र प्रेषित करना तो उसके सामने एक फोटो कैमरा रखा जाए और उसके कैमरे में ही छिद्रों वाली चकती भी लगा दी जाए तो नचाई जा सकती है | उसी समय एक लैम्प द्वारा तीव्र प्रकाश की किरनावली चकती के घूमते छेदों के मार्ग में उस वस्तु पर डाली जाती रहे | इस तरह उस वस्तु को अधिक चमकीले या धूमिल भागो के रूप में अंशत: या खंडश: अवलोकित किया जा सकता है | इस क्रिया वस्तु को अंशेक्षण करना कहते है |
रेडियो का आविष्कार हो जाने पर बड़े बड़े वैज्ञानिक इस बात का प्रयत्न करने लगे कि कोई ऐसा यंत्र बनाया जाए जिसके द्वारा आवाज तो सुनाई ही पड़े बोलने वालो की शक्ले भी दिखाई पड़े | कई वैज्ञानिक जी-जान से परिश्रम करने लगे | आखिर बेयर्ड ने एक ऐसे यंत्र को बनाने में प्रशंशनीय सफलता प्राप्त की | बेयर्ड इंग्लैंड के निवासी थे | उन्होंने सर्वप्रथम 1926 में एक ऐसा यंत्र बनाकर संसार के सामने रखा जिसके द्वारा आवाज तो सुनाई ही पडती थी बोलने वालो की शकले भी दिखाई पडती थी | बेयर्ड के उसी यंत्र को टेलीविजन कहते है |
बेयर्ड ने जो यंत्र बनाया था उससे केवल कुछ की मील दूर की , बोलने वालो की शकले दिखाई पडती थी | कुछ वैज्ञानिको ने बेयर्ड के यंत्र में महत्वपूर्ण सुधार किये | उन सुधारो का परिणाम हुआ कि अब हम टेलीविजन पर हजारो मील दूर बोलने वालो की शकले भी देख सकते है धीरे धीरे यह दूरी ओर भी अधिक बढती जा रही है | जिस प्रकार रेडियो स्टेशन स्थापित किये गये है उसी प्रकार प्रत्येक देश के प्रत्येक बड़े-बड़े नगर में टीवी केंद्र खोले गये है | हमारे देश में भी कह बड़े बड़े नगरो में भी टीवी के केंद्र स्थापित किये गये |
जिस प्रकार रेडियो पर सुनाई पड़ने वाला सारा कार्यक्रम रेडियो-स्टेशन के स्टूडियो से प्रसारित किया जाता है उसी प्रकार टीवी के पर्दे पर दिखाई पड़ने वाले सम्पूर्ण कार्यक्रमों का प्रसारण टेलीविजन केन्द्रों के स्टूडियो के द्वारा होता है | जिस प्रकार रेडियो में आवाज दूर-सुदूर पहुचाने के लिए रेडियो लहर काम में लाई जाती है उसी प्रकार शक्लो को दूर-सुदूर ले जाने के लिए भी रेडियो लहरों से काम लिया जाता है |
जिस आदमी की शक्ल को टेलीविजन के पर्दे पर दिखाना होता है उसके चेहरे पर तेज रोशनी की किरने डाली जाती है | इसके पश्चात उसके चेहरे की परछाई , फोटो-कैमरे के द्वारा एक फोटो इलेक्ट्रिक सेल पर डाली जाती है | चेहरे पर रोशनी पड़ने के कारण उसके उतार-चढाव के अनुसार इलेक्ट्रिक सेल में बिजले की एक धारा उत्पन्न होती है | उस धारा को रेडियो लहरों पर चढा दिया जाता है | वे लहरे बड़ी तेजी से आकाश के चारो ओर फ़ैल जाती है और टीवी के उन रिसीविंग सेटों में जा पहुचती है जो दूर-सुदूर पर घरो में रहते है |
दूर-सुदूर पर रखे हुए टेलिविज़न यंत्रो में कुछ विशेष प्रकार के वाल्व लगे रहते है | वे वाल्व बिजली की धारा को रेडियो लहरों से अलग कर देते है | इस प्रकार अलग होने से रिसीविंग सेटों में एक तरह के पर्दे पैदा होते है | बिजली की धारा उन जर्रो की गति को बढाती-घटाती है | जर्रे एक जैसे पर्दे पर पड़ते है जो कांच का बना होता है और जिस पर एक विशेष प्रकार का मसाला लगा रहता है | जर्रे पर्दे पर जहां जहां गिरते है मसाला चमक उठता है और हमे बोलने वालो की वह शक्ल दिखाई पड़ जाती है जिसकी परछाई दूर-सदूर के टीवी केंद्र से बिजली की धरा ,रेडियो लहरों की सहायता से आती है |
टीवी का प्रचार दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है | इसका कारण यह है कि इससे भरपूर मनोरंजन तो होता ही है ज्ञानवर्द्धन भी होता है | कुछ वैज्ञानिको का कहना है कि जब टेलिविज़न सर्वव्यापी हो जायेगा , तो स्कूलों-कॉलेजों में शिक्षको की आवश्यकता नही रहेगी | आज जो काम शिक्षक करते है उस दिन वही काम टेलिविज़न करेंगे | आज भी स्कूलों में कुछ समय टीवी से पढाई आरम्भ हो गयी है और वह दिन आएगा या नही | इस सबंध में हम कुछ ही कहेंगे | पर हम यह अवश्य कहेंगे कि यह एक महान अविष्कार है |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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