
आधुनिक युग में हिंदी काव्य में पौरुष के प्रतीक और राष्ट्र की आत्मा का गौरव नायक जिस कवि को माना गया है उसी का नाम रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) है | वाणी में ओज , लेखनी में तेज और भाषा में अबाध प्रवाह का जो स्वामी था उसी का साकार रूप दिनकर कवि था | दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) का जन्म बिहार के सिमिरिया घाट स्थान पर सन 1908 में 3 सितम्बर को हुआ | मुंगेर जिले में यह छोटा सा ग्राम है | दिनकर के पिता का नाम रविसिंह था |
गाँव की पाठशाला में पढने के पश्चात रामधारी सिंह (Ramdhari Singh Dinkar) मोकामा घाट के हाई स्कूल में पढने गये | वहां ही मैट्रिक परीक्षा पास की और पटना विश्वविद्यालय से BA की परीक्षा उत्तीर्ण करके हेडमास्टर बन गये | तत्पश्चात बिहार सरकार में सब-रजिस्ट्रार के पद पर नियुक्त हो गये | सन 1947 में बिहार सरकार के प्रचार विभाग के उपनिदेशक रहे | सन 1950 में लंगटसिंह कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष बने परन्तु सन 1962 में राज्यसभा में मनोनीत होने के कारण नई दिल्ली आ गये और देशभर में अपने कवि ,आलोचक और राजनितिक रूप को संवारने लगे |
सन 1964 में भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति बनकर वहां चले गये तत्पश्चात केन्द्रीय सरकार की हिंदी सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बने और देशभर में हिंदी लागू करने के प्रयत्नों में रात-दिन जुटे रहे | उन्होंने अनेक बार विदेश यात्राये की थी | कवि दिनकर ने काव्य में कुरुक्षेत्र और उर्वशी जैसी म्हाकृतियो के अतिरिक्त रेणुका , रसवन्ती , सामधेनी , बापू , रश्मि-रथी , द्वंद गीत , नीलकुसुम , नये सुभाषित , परशुराम की प्रतीक्षा , कोयला और कविता ,आत्मा की आंखे आदि कृतिया प्रदान की है | प्रसाद ,पन्त और मैथिलीशरण गुप्त पर आपकी आलोचनात्मक कृति भी प्रसिद्ध है |
कवि दुन्क्र ने “हे राम !” नाटक भी लिखा है | “संस्कृति के चार अध्याय” ग्रन्थ से तो कवि दिनकर का नाम विदेशो में भी प्रसिद्ध हो गया | सन 1957 में काव्यप्रतिभा एवं राजनीती क्षेत्र में सेवा करने के कारण दिनकर जी को राष्ट्रपति ने पद्मभूषण की उपाधि से विभूषित किया था | इन्हें “संस्कृति के चार अध्याय” ग्रन्थ पर साहित्य अकादमी का पांच हजार रूपये का पुरुस्कार भी मिला था | सन 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर की उपाधि से भी दिनकर विभूषित हुए थे | नागरी प्रचारिणी सभा में इन्हें द्विवेदी पदक से सुशोभित किया था | दिनकर को उर्वशी कृति पर सन 1972 में ज्ञानपीठ पुरुस्कार दिया गया | नई कविता के दौर में इनकी शुद्ध कविता की खोज पुस्तक भी विख्यात हुयी |
कवि दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) ने राष्ट्रीय चेतना का काव्य प्रधानता से लिखा है | चीन से युद्ध के दिनों में दिनकर की “परशुराम की प्रतीक्षा” कविता अत्यंत प्रसिद्ध हुयी | इस कविता से देश के सैनिक अहिंसा त्यागकर पौरुष पुरुष बनने का आह्वान किया था | कविवर दिनकर के काव्य में अनेक स्वर उभरे है परन्तु सबसे प्रधान स्वर राष्ट्रीयता का रहा है | वैज्ञानिक युग में मानव की प्रवृति को उन्होंने खूब पहचाना है |
दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) के काव्य की भाषा में ओज गुण की प्रधानता थी | उनका काव्य पाठ तो श्रोताओं को मनोमुग्ध करने के अतिरिक्त साहस फूंक देता था | प्राणों में झंकार हो जाती थी | गीत लिखने में भी दिनकर जी पीछे नही रहे | समाज में सदा चेतना शक्ति को तपती हुयी रखने का काम दिनकर कवि का काव्य करता रहा है | विद्रोही प्रवृति दिनकर जी की कविता का आदिम स्वर है को कभी मंद नही पड़ा है | व्यक्ति और समाज को परस्पर संबध करके चलने की प्रेरणा देना दिनकर के काव्य का संदेश है |
कविवर दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar )पर अनेक आलोचनात्मक ग्रन्थ लिखे जा चुके है | “युगचारण दिनकर” ग्रन्थ स्वर्गीय डा.सावित्री सिन्हा ने लिखा है जो आलोचना साहित्य में प्रसिद्ध है | आधुनिक राष्ट्रीय कविता के जागरूक रचनाकार राष्ट्रीय कवि दिनकर का देहांत 24 अप्रैल 1974 को हृदयगति रुक जाने से सहसा हो गया | हिंदी साहित्य का प्रखर कवि , आलोचक और वक्ता साहस उठ गया | उनके काव्य की झंकार अभी भी कानो में सुनाई पडती है | लगता है कविवर दिनकर अब भी काव्य मंच से सिंहगर्जना कर रहे है कि भारतीयों ! जागो ! भारत के गौरव की रक्षा करो | “दिनकर” की वाणी में ओज का दर्प युगों तक देशवासियों को झकझोरता रहेगा |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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