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बैजनाथ मन्दिर , जहां रावण ने की थी घोर तपस्या | Baijnath Temple History in Hindi

बैजनाथ मन्दिर , जहां रावण ने तपस्या कर शिवजी को किये शीश अर्पित | Baijnath Temple History in Hindi
बैजनाथ मन्दिर , जहां रावण ने तपस्या कर शिवजी को किये शीश अर्पित | Baijnath Temple History in Hindi

बैजनाथ में बैधनाथ शिव का प्रसिद्ध मन्दिर है | वैधनाथ में 16 ओर प्राचीन मन्दिर है जिनकी कला अत्यधिक आकर्षक है | मंडी-पठानकोट राष्ट्रीय मार्ग संख्या 20 पर एक कस्बा बैजनाथ , धर्मशाला से 56 किमी , पालमपुर से 16 किमी , पठानकोट से 132 किमी और कांगड़ा से लगभग 40 किमी दूर और समुद्रतल से 3200 फुट ऊँचाई पर स्थित वैधनाथ नामक एक पूण्य स्थान है |
यहाँ एक बहुत प्राचीन और इतिहास प्रसिद्ध देव मन्दिर है | स्थानीय लोग इसके शिवलिंग को द्वादस ज्योतिर्लिंगो अर्थात 12 प्राचीन विशेष पवित्र शिवलिंगों में से एक मानते है | इसके उत्तर की ओर दूर दिखाई देने वाला बर्फ से ढकी हिमालय की चोटी , दक्षिण में विशाल फैले हुए खेत उस स्थान को सुंदर बना देते है | धौलाधार के आधार में नीली बिनवा नदी के किनारे अद्वितीय शिव मन्दिर जो उत्तर भारत में वास्तुकला का अद्भुत नमूना है |
प्रतिहार शैली का यह मन्दिर अपनी बेजोड़ कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध है | शिव मन्दिर तक कोई आक्रमणकारी नही पहुच पाया जबकि यहाँ से मात्र 30 किमी दूर नगरकोट मन्दिर गजनवी के द्वारा लुटा गया | 1905 में हिमाचल में आये भूकम्प में भी शिव मन्दिर खड़ा रहा | आज भे यह मन्दिर अपना पुरातन गौरव लिए खड़ा है | इस स्थान को वास्तविक वैद्यनाथ धाम भी कहा जाता है |
एक किंवदती के अनुसार यहाँ लंकापति रावण ने तपस्या की और अपने दस शीश शिव को समर्पित किये | शिव भगवान ने जब रावण को दर्शन दिए तो वरदान मांगने को कहा | इस पर उन्होंने शिव से लंका में साथ चलने का आग्रह किया | भगवान शिव ने आग्रह स्वीकार तो कर लिया लेकिन लिंग रूप में और साथ में शर्त रखी कि रावण रास्ते में इस लिंग को धरती पर नही छोडेगा |
उसने यह बात मान ली और शिव को लिंग रूप में उठाकर अपने देश चल दिया | ज्योही इस वरदान के लिए जाने की भनक देवताओं को पड़ी , देवलोक में हडकम्प मच गया | देवताओं को लगा कि जब असुरी शक्तियाँ प्रबल हो उठेगी तो देवलोक का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा | बस फिर क्या था | सारा देव समाज भगवान विष्णु के श्री चरणों में उपस्थित हुआ और अपनी व्यथा-कथा कही |
परिणामत:  भगवान विष्णु देवताओं की सहायता करने का वचन देकर रावण की राह में बाधा बनने के लिए उपस्थित हो गये | प्राचीन त्रिगर्त के करीग्राम अर्थात वर्तमान वैधनाथ में जब वह पहुचा तो उसे तेज शौच लगा | तभी एक वृद्ध सामने से आता हुआ दिखाई दिया | उसने वह लिंग कुछ देर के लिए उसके पास थमा दिया लेकिन जब वह वापस आया उसे धरती पड़ा मिला |वह वृद्ध वहां से कही चला गया था | इस पर उसको बहुत गुस्सा तो आया लेकिन निरर्थक था | शिवलिंग को पुन:उठाने का प्रयास किया लेकिन वह तो जैसे धरती में गड गया हो | मजबूरन रावण को यही उसकी स्थापना करनी पड़ी | बताया जाता है कि उसने यहाँ बैठकर कई वर्षो तक तपस्या की और तभी से यहाँ लिंग स्थापित माना जाता है |
बैजनाथ मन्दिर की वास्तुकला की दृष्टि से उडीसा के प्रख्यात मन्दिरों से पर्याप्त समानता है क्योंकि इन दोनों ही स्थानों पर स्थापत्य निर्माण लगभग एक ही काल में हुआ है | यह केंद्र कालान्तर में शैव प्रधान रहा है | आज भी इसका महत्व दूर-दूर तक है और मन्दिर के कारण एक प्रसिद्ध तीर्थ और प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण भ्रमणय है | श्रावण मास में सोमवार के दिन मन्दिर में शिवलिंग के दर्शन विशेष महत्वूर्ण माने जाते है | यहाँ का शिवरात्रि पर्व भी धूमधाम से मनाया जाता है |

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