
हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना के मुख्यालय से लगभग 70 किमी दूर माता चिन्तपुर्णी का मन्दिर है | शिव पार्वती का शव उठाये हुए पहाड़ो पर विचर रहे थे | उस समय भगवान विष्णु के चक्र से कटकर सती का हृदय इसी जगह पर गिरा था | यह भगवती छिन्नमस्ता देवी का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है | ऐसी मान्यता है कि यहाँ दर्शन पूजन और साधना करने से कामनाये पूर्ण होती है तथा बाधाये दूर होती है |
माता चिन्तपुर्णी की पौराणिक कथा
एक कथा के अनुसार एक बार माँ भवानी अपने दो सहचरियो सहित मन्दाकिनी नदी में स्नान करने गयी | वहा सहचरियो को बहुत भूख लगी | उन द्वारा अधिक भूख जताने पर मान भवानी ने खड्ग से अपना सिर काट डाला | कटे सर से निकली लहू की दो धाराए दोनों सहचरियो के मुख में गिरी | मध्य धारा भवानी ने बांये हाथ में पकड़ी और स्वयं पान किया |
चिंतपुर्णी माँ छिन्नमस्तक के इस पवित्र धाम का संबध एक ओर पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है | कथानुसार देव-दानव संग्राम में राक्षसराज महाबली शुम्भ और निशुम्भ नाक अजेय दैत्यों ने आदिशक्ति माँ चण्डिका और काली रूप का सामना करते समय अपने सेनापतियो चंड और मुंड के माँ के हाथो मारे जाने पर रक्त बीज नाम से प्रसिद्ध राक्षसों के दल को अपनी सेना में शामिल कर लिया |
इन राक्षसों को उनकी तपस्या से यह विचित्र वरदान प्राप्त था कि युद्ध में उनके रक्त के जितने भी कतरे बह क्र जमीन पर गिरते थे उनमे से उन्ही की क्षमता वाले उतने ही रक्त बीज पैदा हो जाते थे | रण-भूमि में उत्पन्न इस विचित्र स्थिति से निपटने के लिए माँ जगदम्बा ने अपनी दो योगिनियो जया और विजया को यह आदेश दिया कि वे इन असुरो का रक्त धरा पर गिरने से पहले ही उसे पी जाए ताकि इन असुरो की छल-माया का नाश सम्भव हो सके | तत्पश्चात आदि शक्ति माँ ने नव-शक्ति रूपों में अदम्य संग्राम किया |
पुरी रण-भूमि ,दैत्यों के शवो से पट गयी , रणचंडी नाच उठी , सियारों के झुण्ड रणक्षेत्र की तरफ दौड़ पड़े | आदिशक्ति की सहचरी जया और विजया ने इतनी तेजी से राक्षसों का लहू पीना शुरू किया कि वे ये भूल गयी कि देव-दानव संग्राम समाप्त हो चूका है | दैत्यों का दूर दूर तक नामोनिशान नही है | रक्त-बीज का समूल नष्ट हो चूका है फिर भी वे अपनी रक्त पिपाशा को शांत न कर सकी और रक्त की मांग करने लगी |
रक्त न मिलने से परेशान होकर जया और विजया ने अपनी बैचैनी के बारे में माँ से कहा तो ममतामयी माँ भगवती अपनी प्रिय सहचरियो के त्रास को सह न सकी और चामुंडा महाशक्ति ने त्याग की वह मिसाल कायम की जो शायद ही कही ओर ढूंढी जा सके | माँ भगवती ने स्वयं अपनी गर्दन धड से काट डाली और उनमे से रक्त की दो धाराए फुट पड़ी , जो दोनों योगिनियो के मुख में जा गिरी | बीच में से एक तीसरी अमृतमयी रक्त की धारा माँ के कांतिमय मुख में प्रवाहित होने लगी | यह दिव्य साक्षी है कि माँ ने अपने भक्तो का कष्ट दूर करने के लिए स्वयं का बलिदान तक दे दिया किन्तु अन्य जीव की तर्कहीन बलि नही दी | तभी से माँ भवानी छिन्नमस्तिका कहलाई और विभिन्न स्थानों में स्थापित हुयी |
एक किंवदती के अनुसार माइदास नामक एक व्यक्ति भक्त था जिसे ससुराल जाते समय चिन्तपुर्णी के पास घने जंगल में एक विशाल वट के नीचे माँ ने दिव्य बाला के रूप में दर्शन दिए | दिव्य बाला ने माइदास को अपनी सेवा के आदेश दिया | ससुराल वापसी पर भी उसी वट वृक्ष के नीचे ध्यान लगाने पर माँ ने दर्शन दिए | माइदास ने देवी द्वारा बताये स्थान से पत्थर हटाया तो वहां जल की धारा फुट निकली और देवी पिंडी के रूप में प्रतिष्टित हुयी |
मन्दिर में माँ की पिंडी फूलो से लदी रहती है | पिंडी के उपर छत्र है और गुम्बदाकार मन्दिर है | अग्र भाग में प्रवेश द्वार भी गुम्बदाकार है जहां हनुमान और भैरव की मुर्तिया है | वट-वृक्ष के नीचे हनुमान ,भैरव , गणपति की पाषाण मुर्तिया है | मन्दिर प्रात: साढ़े पांच से रात नौ बजे तक खुलता है | माता के स्नान के लिए उसी कुंड से पानी निकाला जाता है जहां पहले कभी धारा फूटी थी | चिंतपुर्णी मन्दिर में चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में मेले लगते है | इन मेलो में पंजाब ,हरियाणा ,उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश से लाखो श्रुधालू दर्शनार्थ आते है |
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