
कुल्लू से लगभग दस किमी नीचे भुंतर से लगभग 35 किमी की दूरी पर स्थित है मणिकरण (Manikaran) | वर्तमान में तो यहाँ तक सीधी बस सेवा की सुविधा है किन्तु पुराने समय में लोग कई दिनों का सफर तय कर दूर दूर से इस घाट के दुर्गम मार्गो से होते हुए आते थे | सड़क सिंगल रूट है | सर्पीले रस्ते में तिब्बती लोग खूब मिलते है | इसी रास्ते पर शाट गाँव बहे है जहां कभी बादल फटा था और प्रकृति के कहर ने बस्ती की जगह उफनता नाला बना दिया था |
समुद्रतल से 6000 फुट की उंचाई पर बसे मणिकरण (Manikaran) में गुरूद्वारे की विशाल इमारत के पास से पार्वती नदी पुरे वेग के साथ बहती है | मणिकरण वह स्थान है जहां शिवप्रिया पार्वती की मणि खोयी थी | समय और सभ्यता की दौड़ के साथ मणिकरण तक बस जाने लगी है | हिमालय की ओर आने वाले साधू-सन्यासी मणिकर्ण और मणि महेश की यात्राओं का उल्लेख बड़े गर्व से करते है | पुराने समय में ये दो यात्राये पवित्र किन्तु कठिन मानी जाती थी |
पर्वत पुत्र पार्वती के बर्फानी पानी में एक ऐसा स्थल है जहां एक ओर बर्फ का पानी बह रहा है तो किनारे पर धरती से उबलता हुआ पानी फुट रहा है | एक ओर पानी में बर्फ सी छुअन . दुसरी ओर उंगली लगे तो जलकर खाल उतर जाए | उनके अनुसार पानी में रेडियम है मगर श्रुधा के सामने यह तर्क भाप बनकर उडन छू हो जाता है | ऐसा अद्बुत स्थल है मणि कर्ण | आस-पास ऊँचे पर्वत , बीच में पार्वती नदी दो बड़ी चट्टानों के बीच संकरे मार्ग में वेग से बहती हुए अपने प्राकृतिक सौन्दर्य से मन मोह लेती है |
एक किंवदती के अनुसार किसी समय मणि कर्ण के अडोस-पडोस की हरी-भरी स्वच्छ पर्यावरण वाली सुंदर पहाडियों पर शिव-पार्वती टहलते हुए आये | जगह अच्छी शांत लगी , वातावरण भा गया तो शिव तपस्या करने लगे | उधर पार्वती तो उकताहट होने लगी तो पडोस की नदी में वे जलक्रीडा से मन बहलाने के लिए नदी में उतरी | जल क्रीडा के दौरान उनके कान की एक मणि पानी में गिर गयी और शेषनाग के पास पहुच गयी | पार्वती ने भरसक प्रयास किया मगर मणि नही मिली | शिव के गण भी मणि ढूंढने लगे मगर वे असफल रहे | अब शिव को क्रोध आ गया , आँखों से चिनगारियाँ निकलने लगी | नदी का पानी उबलने लगा , फव्वारे फूटने लगे | शेषनाग ने शिव को प्रसन्न करने के लिए फुंकार भरी तो मणि बाहर आ गयी | जगह का नाम मणिकर्ण और नदी का नाम पार्वती हो गया |
इस समय मणि कर्ण (Manikaran) में एक छोटा सा शिव मन्दिर है | इसी के पास यात्री उबलते हुए पानी में चावलों की पोटली बांधकर छोड़ देते है तो पन्द्रह मिनट में पक जाते है | रोटियाँ फेंकी जाती है जो पककर उपर तैर आती है | दाल सबजिया पक जाती है | उपर रघुनाथ जी का मंदिर है नीचे पुराना मन्दिर धंस गया है और इसकी मुर्तिया भी उपर के मन्दिर में रख दी गयी है | रघुनाथ मन्दिर के नीचे छोटे से मैदान में एक रथ खड़ा रहता है |
पार्वती नदी के पार यहाँ एक भव्य गुरुद्वारा है | यहाँ यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था के साथ साथ हर समय लंगर लगा रहता है | कोई भी व्यक्ति पंगत में बैठकर प्रसाद खा सकता है | गुरूद्वारे के उपर मन्दिर भी है | पहले सीधे मन्दिर में जाने के रास्ता पुल से था यहाँ पार्वती बहुत संकरी होकर दो चट्टानों के बीच से निकलती है | अब झूलने वाले रस्सो का पुल सीधा गुरूद्वारे में प्रवेश करता है |
सर्वधर्म समभाव से प्रेरित एक ख़ास बात यह जो इस गुरूद्वारे में देखने को मिलती है कि यह अनेक धर्मो के अवतार देवी-देवताओं के चित्र जो प्रशंशा उगाहते है | यहाँ सिक्खों और हिन्दुओ की मिली-जुली शुर्द्धा है | वही इस क्षेत्र में चारो ओर फ़ैली प्राकृतिक सुन्दरता ने लाखो पर्यटकों को दीवाना कर रखा है | मणिकर्ण (Manikaran) में खूब बर्फ पडती है मगर ठंडे मौसम में भेई गुरुद्वारा परिसर में बनाये गये विशाल स्नान स्थल में आराम से जितनी देर नहा सकते है | विशेष रूप से ऐसे पर्यटकों को जो गठिया या चर्मरोगकी गिरफ्त में है ऐसा माना जाता है कि गंधक युक्त पानी में कुछ दिन स्नान कर यह रोग ठीक हो जाते है | मणिकर्ण (Manikaran) के गंधकयुक्त उबलते पानी के स्त्रोत की यहाँ दिलचस्प एवं अचम्भित करने वाला आकर्षण है | पर्यटकों का अधिकांश प्रतिशत इन्ही चश्मों के आकर्षण में खिंचा चला जाता है |
Pythagoras Biography in Hindi पाईथागोरस (Pythagoras) को महान दार्शनिक और गणितज्ञ माना गया है | इनका जन्म ईसा से भी 500 वर्ष पूर्व यूनान के सामोस नामक टापू में हुआ था | यह मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्राचीनकाल में लोग अपने विषय में किसी प्रकार की कोई सुचना लिखित रूप में प्रस्तुत करके नही रखा करते थे अत: उनके विषय में विस्तार से कुछ मिल पाना बड़ा असम्भव सा होता था | यही स्थिति पाईथागोरस की भी है | उस समय लिखने और संचार के साधनों का उतना विकास भी नही हुआ था और न ही शायद छपाई आदि की कोई व्यवस्था उस समय रही थी | पाईथागोरस (Pythagoras) के समय में तो कदाचित भोज-पत्र पर भी लिखने की प्रक्रिया चल पड़ी थी अथवा नही , कहना कठिन है | बाद के लेखको को पूर्ववर्ती पीढियों द्वारा कहा सूनी के आधार पर जो कुछ सूचनाये प्राप्त हो जाया करती थी उनके आधार पर ही उन महान पुरुषो के बारे में कुछ जानकारी मिलने लगी है | पाईथागोरस उस समय उत्पन्न हुए थे जब गणित अपनी आरम्भिक अवस्था में ही था किन्तु अपनी विद्वता के कारण इस महान दार्शनिक ने एक ऐसी प्रमेय का सूत्रपात किया जो विश्वभर में प्राथमिक कक्षाओ में ही व...
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