
मल्लिकार्जुन (Mallikarjuna) द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है | यह ज्योतिर्लिंग श्रीशैल पर है | वहां 51 शक्तिपीठो में से एक शक्तिपीठ भी है | सती की देह का ग्रीवा भाग ज्हा गिरा वहा भ्रमरामभा देवी का मन्दिर है | वीर-शैवमत के पंचाचार्यो में एक जगद्गुरु श्रीपति पंडिताराध्य की उत्पति मल्लिकार्जुन लिंग से ही मानी जाती है |
मल्लिकार्जुन (Mallikarjuna) मन्दिर की धार्मिक पृष्टभूमि
पहले विवाह किसका हो , इस बात को लेकर कार्तिकेय और गणेश जी में आपस में विवाद हो गया | गणेशजी ने पृथ्वी प्रदक्षिणा का प्रसंग आने पर माता-पिता की प्रदक्षिणा कर ली अतएव उनका विवाह पहले हो गया | इससे कार्तिकेय रुष्ट होकर कैलाश छोडकर श्रीशैल पर आ गये | पुत्र के वियोग से माता-पार्वती को बड़ा दुःख हुआ | वे स्कन्द से मिलने चली |
भगवान शंकर भी उनके साथ श्रीशैल पधारे , किन्तु कार्तिकेय माता-पिता से मिलना नही चाहते थे | वे उमा-महेश्वर के पहुचते ही श्रीशैल से तीन योजन दूर कुमार पर्वत पर जा विराजे | वह स्थान कुमार-स्वामी कहा जाता है | भगवान शंकर तथा पार्वतीजी श्रीशैल पर स्थित हुए | यहाँ शिवजी का नाम अर्जुन तथा पार्वतीदेवी का नाम मल्लिका है | दोनों नाम मिलकर मल्लिकार्जुन होता है |
तीर्थ स्थल का महत्व
मल्लिकार्जुन लिंग में पार्वती और शिव दोनों ही ज्योतियाँ प्रतिष्टित है और कहा जाता है कि इस लिंग के दर्शनमात्र से सम्पूर्ण मनोकामना की पूर्ति होती है | इसका दर्शन सब प्रकार के सुख देने वाला बताया गया है |
तीर्थ स्थल का दर्शनीय विवरण
आंध्रप्रदेश के कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नमक पर्वत मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग प्रतिष्टित है | श्रीशैल को दक्षिण का कैलाश भी कहते है | श्रीशैल के शिखर पर वृक्ष नही है | दक्षिणी मन्दिरों के ढंग का पुराना मन्दिर है | एक ऊँची पत्थर की चाहरदीवारी है जिस पर हाथी-घोड़े बने है | इस परकोटे के चारो ओर द्वार है | द्वार पर गोपुर बने है | इस प्राकार के भीतर एक प्राकार ओर है |
दुसरे प्राकार के भीतर मल्लिकार्जुन का निज मन्दिर है | यह मन्दिर बहुत बड़ा नही है | मन्दिर में मल्लिकार्जुन शिवलिंग है | यह शिवलिंग मूर्ति लगबग आठ अंगुल ऊँची है और पाषाण के अनगढ़ अरघे में विराजमान है | मन्दिर के बाहर एक पीपल पाकर का सम्मिलित वृक्ष है | इसके चारो ओर पक्का चबूतरा है | मेले के समय यहाँ ठहरने के स्थान पर बड़ा कष्ट रहता है | आसपास 20-25 छोटे-छोटे शिव मन्दिर है | उनमे ही यात्री किराया देकर ठहरते है | मन्दिर के चारो बावडिया है और दो छोटे सरोवर भी है |
श्री मल्लिकार्जुन मन्दिर (Mallikarjuna) के पीछे पार्वती देवी का मन्दिर है | यहाँ उनका नाम मल्लिकादेवी है | मल्लिकार्जुन मन्दिर (Mallikarjuna) का द्वार पूर्व की ओर है | द्वार के सम्मुख सभामंडप है | उसमे नन्दी की विशाल मूर्ति है | मन्दिर के द्वार के भीतर नन्दी के एक छोटी मूर्ति ओर है | शिवरात्रि को यहाँ शिव-पार्वती विवाहोत्सव होता है |
अन्य दर्शनीय स्थल
शिखरेश्वर – मल्लिकार्जुन (Mallikarjuna) से छह मील दूर शिखरेश्वर तथा हाटकेश्वर मन्दिर है | मार्ग कठिन है | कुछ यात्री शिवरात्रि के पूर्व वहां तक जाते है | शिखरेश्वर से मल्लिकार्जुन मन्दिर के कलशदर्शन का भी महत्व माना जाता है | कहते है श्रीशैल के शिखर का दर्शन करने से पुनर्जन्म नही होता |
अम्बाजी – मल्लिकार्जुन मन्दिर (Mallikarjuna) से पश्चिम में लगभग 3 किमी पर भ्रमराम्बादेवी का मन्दिर है | यह 51 शक्तिपीठो में से एक है | अम्बाजी की मूर्ति भव्य है | आसपास प्राचीन मठादि के अवशेष है |
बिल्बवन – शिखरेश्वर से लगभग 6 मील आगे यह स्थान है | यहाँ एकमा देवी का मन्दिर है किन्तु दिन में यहाँ हिसंक पशु घूमते है | बिना मार्ग दर्शक और आवश्यक सुरक्षा के इधर नही आना चाहिए |
यात्रा मार्ग
मनमाड-काचीपुड़ा लाइन के सिकन्दराबाद स्टेशन से एक लाइन द्रोणाचलम तक जाती है | इस लाइन पर कुर्नुल टाउन स्टेशन है वहा से श्रीशैल 200 किमी कुछ दूर तक जाती है | कुर्नुल टाउन में धर्मशाला है | म्सुलीपसम -हुबली लाइन पर द्रोणाचलम से लगभग 80 किमी पहले नन्दयाल स्टेशन है |इस स्टेशन पर श्रीशैल लगभग 120 किमी दूर है | तमिलनाडु के प्रसिद्ध गुंटूर से भी बसे जाती है | यहाँ से दूरी 215 किमी है | तिरुपति से भी बसे जाती है |
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