
प्रभासपाटन , जहां सोमनाथ मन्दिर अवस्थित है भारत में प्राचीन तीर्थ स्थानों में से एक है | इस पवित्र तीर्थ स्थल का उल्लेख ऋग्वेद ,स्कन्दपुराण और महाभारत में भी आया है | देश के अन्य ग्यारह पवित्र शिव मन्दिरों में से सोमनाथ ही ऐसा मन्दिर है जहां परम पावन ज्योतिर्लिंग स्थापित है | यह मन्दिर तथा तीर्थस्थान अनेक शताब्दियों से भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बना हुआ है |
सोमनाथ की धार्मिक पृष्टभूमि
कहा जाता है कि सोमनाथ मन्दिर , जगतोउत्पति जितना ही प्राचीन है | पुराणों के अनुसार दक्ष-प्रजापति की 27 कन्याये थी और सभी का विवाह चन्द्र के साथ हुआ था | रोहिणी सभी बहनों में सुंदर थी और चन्द्र की उसके प्रति विशेष आसक्ति थी | यह जानकर शेष बहनों को बड़ी ईर्ष्या हुयी और उन्होंने इसकी शिकायत अपने पिता से की | उनके पिता ने चन्द्र को समझाया किन्तु चन्द्र ने उनकी एक न सूनी |
इस पर क्रुद्ध होकर दक्षप्रजापति ने चन्द्र को राजयक्ष्मा से पीड़ित होने का श्राप दे दिया फलस्वरूप चन्द्र की शक्ति दिन-प्रतिदिन क्षीण होती गयी | यह देखकर सब देवताओं ने मिलकर चन्द्र को दिए गये श्राप को वापस लेने के लिए ब्रह्मा से अनुरोध किया | ब्रह्मा ने कहा “मै दक्ष का दिया हुआ शाप तो नही वापस ले सकता लेकिन शाप-मुक्ति का उपाय बता सकता हु चन्द्र से कहो वह प्रभासक्षेत्र में जाए और शिवलिंग की प्रतिष्टा कर तपस्या करे “| चन्द्र ने लगातार 38 महीने तक तपस्या की और शिव के वरदान से शापमुक्त हुए और शिव वहा पर प्रतिष्टित होकर सोमेश्वर कहलाये |
सोमनाथ मन्दिर की एतेहासिक पृष्टभूमि
एतेहासिक तथ्यों के अनुसार यह कहा जा सकता है कि 406 ई. में सोमनाथ का मन्दिर विद्यमान था | व्हांगसांग नामक बौद्ध चीनी यात्री भारत में 630 से 644 ई. तक रहा | वह घूमता हुआ गिरनार भी गया था जो सोमनाथ से 52 मील दूर है किन्तु उसके यात्रा विवरण में सोमनाथ मन्दिर का उल्लेख नही है | सम्भवत: बौद्ध होने के कारण उसने वहां जाना पसंद नही किया |
इतिहासकारो के अनुसार सोमनाथ के देव स्थान का निर्माण 487 -767 के बीच शैव सम्प्रदायी वल्लभी शासको द्वारा किया गया होगा | परमारों के एक शिलालेख के अनुसार यह मन्दिर मालवा के भोज परमार द्वारा बनवाया गया था | चन्द्रग्रहण के अवसर पर यहाँ एक बहुत बड़ा मेला लगता है कहते है इस अवसर पर स्नान करने का बहुत अधिक महत्व है |
11वी शताब्दी के प्रमुख आक्रमणकारी महमूद गजनवी जिसने भारत के थानेश्वर ,कन्नौज , ग्वालियर , दिल्ली ,कालिंजर , नागरकोट और मथुरा को अपनी क्रूर दृष्टि से पराजित और ध्वस्त कर दिया था सन 1025 में उसकी गिद्ध दृष्टि , धन-सम्पति और प्रसिधी से समृद्ध सोमनाथ पर पड़ी | मन्दिर को लुटने और ध्वस्त करने के उद्देश्य इ महमूद गजनवी ने भारी सेना लेकर भारत पर आक्रमण किया और कई जगहों पर लूटपाट करने के पश्चात अंत में अनेक राजाओ के प्रतिरोध का मुकाबला करता हुआ महमूद गजनवी सोमान्थ के मन्दिर में प्रविष्ट हुआ | उसने शिवमूर्ति को तोड़ डाला | मन्दिर के हीरे-जवाहरात और स्वर्ण लुट लिए और मन्दिर म आग लगा दी |
मन्दिर का निर्माण उसी समय गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने कराया था | सन 1169 में गुजरात के शक्तिशाली राजा कुमारपाल ने पांचवा मन्दिर बनवाया ,जिसके खंडहर 1950 ई. तक अपनी गौरव गाथा सुनाते रहे | 1297 ई. दिल्ली के बादशाह अलाउदीन खिलजी के सेनापति अलफखा ने इस मन्दिर को विन्धव्स्त किया और उसके बाद चुडासभा वंश के राजा महिपाल ने मरम्मत करवाई |
इसके बाद 1390 ई. में मुज्जफरशाह प्रथम , 1490 ई. में मोहम्मद बेगडा , 1530 ई .में मुजफ्फर द्वितीय और 1701 ई. में औरंगजेब ने इस मन्दिर को विध्वंस किया परन्तु हर बार किसी न किसी हिन्दू राजा ने इसकी मरम्मत करवाई | 1783 ई. में महारानी अहिल्याबाई ने इसके पास नया मन्दिर बनवाया | अंत में शासकीय स्थापत्य विभाग की सहायता से खुदाई का काम आरम्भ हुआ और पुराने अवशेषों को एकदम हटाकर प्राचीन सोमनाथ के स्थान पर उसी के अनुरूप नये सोमनाथ मन्दिर के निर्माण का निर्णय हुआ |
11 मई 1951 ई. को सोमनाथ में ज्योतिर्लिंग की एक बार फिर स्थापना हुई | परम्परा के अनुसार विश्व में समस्त देशो की मिटटी , सारी पवित्र नदियों का जल और सारे समुद्रो का क्षारयुक्त पानी उस मुहूर्त के लिए सोमनाथ लाया गया | अन एक करोड़ रूपये से अधिक्त की लागत से सोमनाथ का मन्दिर बनकर फिर इतिहास के पृष्टो पर आ गया है जो भारत के प्राचीन सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक समझा जाता है |
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