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केदारनाथ का इतिहास एवं दर्शनीय स्थल | Kedarnath History in Hindi

Kedarnath History in Hindi | केदारनाथ का इतिहास एवं दर्शनीय स्थल
Kedarnath History in Hindi | केदारनाथ का इतिहास एवं दर्शनीय स्थल

श्री केदारनाथ जी (Kedarnath) द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है | इनको केदारेश्वर भी कहा जाता है और केदार नामक पहाड़ पर स्थित है | सतयुग में उपमन्यु जी ने यहाँ भगवान शंकर की आराधना की थी | द्वापर में पांड्वो ने यहाँ तपस्या की | यह केदारनाथ क्षेत्र (Kedarnath) अनादि है | महिषरूपधारी भगवान शंकर के विभिन्न अंग पांच स्थानों में प्रतिष्टित हुए , जो पंचकेदार माने जाते है | उनमे से (तृतीय केदार) तुंगनाथ में बाहु , (चतुर्थ केदार) रुद्रनाथ में मुख , (द्वितीय केदार) मदमाहेश्वर में नाभि , (पंचम केदार) क्लेपेश्वर में जटा तथा केदानाथ में पृष्टभूमि और पशुपतिनाथ (नेपाल) में सिर माना जाता है | केदारनाथ (Kedarnath) में भगवान शंकर का नित्य सानिद्ध्य बताया गया है |

केदारनाथ की पृष्टभूमि | Kedarnath History in Hindi

शिवपुराण में कथा है कि नर और नारायण नामक दो अवतार बदरिकाश्रम नामक तीर्थ स्थान में तपस्या करते थे | उन दोनों ने पार्थिव शिवलिंग बनाक उसमे स्थित हो पूजा ग्रहण करने के लिए शम्भु से प्रार्थना की | शिवजी प्रतिदिन पार्थिवलिंग में पूजित होने आया करते थे | बहुत दिनों बाद शिव ने प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा | नर और नारायण ने मनुष्य जन के हित में उन्हें वही प्रतिष्टित होने को कहा तो कल्याणकारी माहेश्वर केदारतीर्थ में ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हो गये | स्कन्दपुराण के माहेश्वर खंड में केदारधाम का सबसे पहले उल्लेख है इसलिए इस क्षेत्र की यात्रा में सबसे पहले केदार आकर रुद्रप्रयाग लौटे और फिर बद्रीनाथ आदि स्थानों की यात्रा करे |

तीर्थस्थल का महत्व | Importance of Kedarnath

जो भी व्यक्ति भाव से केदारेश्वर का पूजन करता है उसके लिए स्वप्न में भी दुःख दुर्लभ है | जो भगवान शिव अ प्रिय भक्त शिवलिंग के निकट शिव के रूप में अंकित कड़ा चढाता है वह वलययुक्त स्वरूप के दर्शन कर समस्त पापो से मुक्त हो जाता है | केदार तीर्थ (Kedarnath) में पहुचकर पूजा कर वहा के जल पी लेने के बाद मनुष्य का फिर जन्म नही होता |

तीर्थस्थल का विवरण

केदारनाथ मन्दिर (Kedarnath) में कोई निर्मित मूर्ति नही है | एक बहुत बड़ा त्रिकोण पर्वतखंड है | यात्री स्वयं जाकर पूजा करते है और अंकमाल देते है | मन्दिर प्राचीन साधारण शिव मन्दिर सा है | पवित्र मन्दाकिनी नदी की मनोरम घाटी का मुकुट जैसा दिखता मन्दिर केदारनाथ है और यहाँ का सम्पूर्ण स्थल केदारधाम कहलाता है | वैदिक धर्म को नये सिरे से प्रतिष्टित करने वाले श्री आदि शंकराचार्य इसी क्षेत्र से थे | उनकी एक समाधि मन्दिर के पीछे बनी है |
ऐसा विश्वास किया जाता है कि वे 32 वर्ष की अवस्था में केदार आये और सदेह कैलाश जाकर शिवत्व में लीन हो गये | पांडव भी उसी राह प्राण त्याग करने हिम शिखरों की ओर गये थे | यहाँ पांच पांड्वो की मुर्तिया है | श्री केदारनाथ मन्दिर में उषा , अनिरुद्ध , पंच-पांडव , श्रीकृष्ण और शिव-पार्वती की मुर्तिया है | मन्दिर के बाहर परिक्रमा के पास अमृतकुंड ,ईशानकुंड , हंसकुंड ,रेतस’कुंड आदि तीर्थ है |पास ही मधुगंगा ,क्षीरगंगा ,वसुतिकाल आदि स्थान भी है |

अन्य दर्शनीय स्थल | Other Tourist Places

उषीमठ – जाड़ो में केदार-क्षेत्र हिमाच्छादित हो जाता है | उस समय केदारनाथ जी के चलमूर्ति यहाँ ले आयी जाती है | यही शीतकाल भर उनकी पूजा होती है | मन्दिर के भीतर बद्रीनाथ , तुंगनाथ , ओंकारेश्वर , केदारनाथ , उषा ,अनिरुद्ध , मान्धाता तथा सतयुग , त्रेता ,द्वापर की एवं अन्य कई मुर्तिया है |
कालीमठ – मन्दाकिनी के उस पार काली मन्दिर अति प्राचीन प्रसिद्ध मन्दिर है उषीमठ से ही मार्ग है | यहाँ महाकाली , महालक्ष्मी ,महासरस्वती के मन्दिर है | यह सिद्धपीठ माना जाता है | कहते है रक्तबीज दैत्य के वध के लिए यहाँ देवताओं ने आराधना की और उन्हें महाकाली ने दर्शन दिया था | यह स्थान वन तथा बर्फीली चट्टानों के बीच में है | यहाँ एक ओर कुंड है जो शिला से ढका रहता है | वह केवल दोनों नवरात्रों में खोला जाता है |
तुंगनाथ– तुंगनाथ पंचकेदार में से तृतीय केदार है | इस मन्दिर में शिवलिंग तथा अन्य कई मुर्तिया है | यहाँ पातालगंगा नामक अत्यंत शीतल जल की धारा है | तुंगनाथ-शिखर पर से पूर्व की ओर नंदादेवी , पंचकुली तथा द्रोनाचल शिखर दीखते है | उत्तर की ओर गंगोत्री , यमुनोत्री , केदारनाथ च्तुश्त्म्भ बद्रीनाथ और रुद्रनाथ के शिखर दिख पड़ते है |

यात्रा मार्ग | How to Reach

ऋषिकेश से केदारनाथ (Kedarnath) लगभग 216 किमी दूर है | रुद्रप्रयाग से होते हुए सोनप्रयाग जो करीब 194 किमी दूर है बस से पहुचा जा सकता है | सोनप्रयाग के पास करीब 8 किमी पर गौरीकुंड है | यहाँ भी बस द्वारा पहुचा जा सकता है | गौरीकुंड से लगभग 13-14 किमी तक का मार्ग पैदल तय करना पड़ता है |

ठहरने के स्थान | Places to Stay

केदारनाथ (Kedarnath) में ठहरने के लिए धर्मशालाये और पर्यटक-लॉज आदि है जहां भोजन की भी उचित व्यव्व्स्था है |

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