
कोटिरूद्र संहिता का अनुसार महाकालेश्वर (Mahakaleshwar) शिप्रा नदी के तट पर उज्जैन नामक नगर में है | उज्जैन उन पवित्र सात नगरियो में से एक है जहां की यात्रा मोक्षदायिनी है | वे सात नगरीया है अयोध्या , मथुरा , हरिद्वार , काशी , साँची , उज्जैन और द्वारका | पुरानी उज्जैन नगरी वर्तमान नगर से एक किमी दूर है |
महाकालेश्वर (Mahakaleshwar) की धार्मिक पृष्टभूमि
शिवपुराण में वर्णित महाकाल की कथा इस प्रकार है अवन्ति नाम से प्रसाद नगरी , भगवान शिव को बहुत ही प्रिय है और समस्त देहधारियो को मोक्ष प्रदान करने वाली है | वही एक धर्मात्मा ब्राह्मण वास करता था | उसके चार पुत्र थे | रत्नमाला पर्वतवासी दूषण नाम के एक राक्षस ने नगर को घेर कर जनता को त्रस्त करना आरम्भ किया | जनता योग सिद्ध करने वाले उस ब्राह्मण की शरण में गयी |उसके तप से प्रसन्न होकर भगवान महाकाल पृथ्वी फाडकर प्रगट हुए और राक्षस का संहार किया |
भक्तो ने भगवान से प्रार्थना की “हमे पूजा की सुविधा देने के लिए ,आप यही निवास करने की कृपा कीजिये ” | भक्तो के आग्रह पर महाकाल ज्योतिर्लिंग के रूप में वही स्थित हो गये | स्कन्दपुराण में इस क्षेत्र को महाकाल वन कहा गया है | “अग्निपुराण” के अनुसार यह सर्वोत्तम तीर्थ है | कहते है महाकाल के दर्शन से भक्त की मुक्ति होती है और व्यक्ति की अकाल मृत्यु से रक्षा होती है |
महाकालेश्वर का एतेहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
मध्यप्रदेश में स्थित वर्तमान उज्जैन , मालवा की राजधानी थी और इसे “अवन्ती” के नाम से पुकारा जाता था | स्कन्दपुराण के अनुसार यह नगरी भिन्न-भिन्न कल्पो में भिन्न नामो से प्रसिद्ध थी | वे नाम है कनकश्रुंग , कुशस्थली , अवन्ती , उज्जियिनी , पद्मावती , कुमुदवती , अमरावती और विशाला | यह नगरी शिप्रा नदी के दाहिने तट पर स्थित है |
भगवान बुद्ध के कला में उज्जैन ,मगध साम्राज्य की राजधानी राजगृह से दक्षिण के प्रतिष्टान अथवा पैठन जाने वाले मार्ग का प्रमुख विश्रामस्थल था | महाभारत में लिखा है कि विंद और अनुविन्द नामक अवन्ती के दो राजकुमारों ने एक-एक अक्शोहिनी सेना लेकर कौरवो के पक्ष में युद्ध किया |
प्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी भी उज्जैन ही थी | भारतीय परम्परा के अनुसार वे इतिहास के अद्वितीय व्यक्ति थे | ईसा पूर्व 57 से आरम्भ होने वाला संवत उनके शासनकाल के प्रथम वर्ष से ही चला | राजनीति और सेना संबधी महान योग्यता रखने वाले महाराज विक्रमादित्य आदर्श शासक , न्यायशील , प्रजापालक ,शुरवीर ,कला ,साहित्य और संस्कृति के महासंरक्षक तथा परपीड़ा निवारक थे इसलिए भारतीय इतिहास के कई अन्य राजाओं ने भी बड़े गर्व के साथ विक्रमादित्य की पदवी से अपने को विभूषित किया था |
तीर्थस्थल का दर्शनीय विवरण
महाकालेश्वर मन्दिर – – उज्जैन का सुप्रसिद्ध स्थल है भगवान महाकाल का मन्दिर | भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंगों में से यहाँ एक लिंग है | यह मन्दिर झील के पास है और इसके पांच तल्लो में से एक तल्ला भूमग्न है | मुख्य मन्दिर के मार्ग में बड़ा अँधेरा रहता है अत:वहां निरंतर दीप जलते रहते है | ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव को जो भी सामग्री चढाई जाती है वह निर्माल्य बन जाती है जिससे उसका पुन: प्रयोग करना वर्जित है किन्तु यह बात ज्योतिर्लिंग के साथ नही है | यहाँ न केवल चढाया हुआ प्रसाद ही लिया जाता है अपितु एक बार चढाये गये विल्वपत्र भी धोकर पुन: चढाये जा सकते है |
हरीसिद्धि मन्दिर – उज्जैन का दूसरा प्रसिद्ध मन्दिर हरिसिद्धी है | स्कन्दपुराण की कथा का अनुसार भगवान शंकर एक बार कैलाश में अपनी पत्नी गौरी के साथ पांसा खेल रहे थे | चंड और प्रचंड नामक दो असुरो ने उनके खेले में बाधा डाली तथा नन्दी को घायल कर दिया , हर ने देवी का ध्यान किया और उन राक्षसों का संहार करने की प्रार्थना की | भगवती ने प्रकट होकर हर का कार्य सिद्ध किया | इसी कारण उन्हें हरसिद्धि कहा जाता है |वे भगवती दुर्गा के नौ मुख्य स्वरूपों में से एक है | कहा जाता है कि हरीसिद्धि सम्राट विक्रमादित्य की कुलदेवी थी |
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